प्रभु श्रीरामजीका नामजप

श्रीविष्णु, श्रीराम एवं श्रीकृष्ण, अनेक श्रद्धालुओंके आस्थाकेंद्र हैं । कुछ हिंदुओंके ये सांप्रदायिक उपास्यदेवता हैं । बहुतांश उपासकोंको देवतासंबंधी जो थोडी-बहुत जानकारी रहती है, वह अधिकतर पढी-सुनी कथाओंसे होती है । ऐसी अल्प जानकारीके कारण देवताओंपर उनका विश्वास भी अल्प ही होता है । देवताओंकी अध्यात्मशास्त्रीय जानकारीसे उनके प्रति श्रद्धा निर्माण होती है एवं श्रद्धासे भावपूर्ण उपासना होती है । भावपूर्ण उपासनासे ईश्वरकी अनुकंपा शीघ्र होती है ।

 

प्रभु श्रीरामजीका नामजप

देवता के ‘तारक’ और ‘मारक’ नामजप का महत्त्व जानने हेतु अवश्य पढें

देवता के ‘तारक’ और ‘मारक’ नामजप का महत्त्व

श्रीरामजीका तारक नामजप

 

श्रीरामजीका मारक नामजप

 

श्रीरामके कुछ प्रचलित नामजप हैं । उनमेंसे ‘श्रीराम जय राम जय जय राम । ’ यह त्रयोदशाक्षरी जप सबसे अधिक प्रचलित है । श्रीराम जय राम जयजय राम । इसमें श्रीराम : यह श्रीरामका आवाहन है । जय राम : यह स्तुतिवाचक है । जयजय राम: ‘नमः’ समान यह शरणागतिका दर्शक है ।

 

श्रीरामजीके नामजपसे हुई अनुभूती

यह अनुभूती है, अमरावतीके श्री. धैवत वाघमारेकी । वे कहते हैं, प्रभु श्रीरामके अति विशाल रूपके दर्शन हुए तथा श्रीरामजीके चरणोंके निकट बैठकर नामजप कर रहा हूं, ऐसा अनुभव हुआ । ३० मार्च २००४ को दिनमें ढाई बजे मैं श्रीरामजीका नामजप कर रहा था । मेरा नामजप एकाग्रतासे होने लगा । कुछही क्षणोंमें मुझे एक बहुत बडे राजसिंहासनपर प्रभु श्रीराम अति विशाल रूप धारण कर बैठे हुए दिखाई दिए । इतना विशाल रूप मैं नहीं देख पाया । मैंने उनके चरणोंपर फूलोंका हार अर्पित किया एवं उनके चरणोंके निकट बैठकर नामजप करने लगा । आगे धीरे धीरे मुझे ऐसा अनुभव हुआ, की मैं प्रभु रामजीका दास हूं । वे मेरे स्वामी हैं । प्रभु रामजीके दास्यत्वको मैं बहुत समयतक अनुभव करता रहा । मुझे उसमें आनंद आने लगा ।

श्री. धैवतको प्रभु श्रीरामजीके दास्यत्वका अनुभव हुआ और उसमें उन्हें आनंद आने लगा । यथार्थ ही तो है । प्रभु श्रीरामजीके स्वामित्वका एवं अपने दास्यत्वका अनुभव करनेमें जितना आनंद है, उतना अन्य किसीभी बातमें नहीं । इस प्रकार नामजपका आनंद आपभी ले सकते हैं।

संदर्भ : सनातन-निर्मित ग्रंथ ‘श्रीविष्णु, श्रीराम एवं श्रीकृष्ण’

1 thought on “प्रभु श्रीरामजीका नामजप”

  1. Namaskar Naveenji,

    Yes, we can install idols of Deities. However, Deity Shiva is worshipped in the form of a Shivaling. Nataraj, one of the forms of Deity Shiva, is only worshipped in the form of an idol. Shaligrams are also used by Shiva devotees as Shivaling for worship.

    The sattva-predominance of an idol can be measured by undertaking spiritual experiment. If one gets a spiritual experience due to the idol, then we can conclude that the idol is sattvik.

    The sattvikta of the idol depends on various factors. Like bhav, spiritual level, spiritual practice of the sculptor. Else, generally the sattvikta of an idol is 0%. After a devotee worships and consecration of the idol is performed, it’s sattvikta increases. The sattvikta of the idol is maintained depending upon the bhav of the devotee and the atmosphere at home.

    Also, while one tries to perform the spiritual experiment, the accuracy of the answer depends on the sattvikta of the individual performing it. More the sattvikta of the individual more is the percentage of the accuracy in the answer.

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