सनातन संस्था के संस्थापक परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी का परिचय

परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी जैसे उच्च कोटि के संत पर आज अत्यंत हीन आरोप लग रहे हैं । इसलिए परात्पर गुरु डॉक्टर
जी की संक्षिप्त जानकारी तथा उनके द्वारा स्थापित या उनकी प्रेरणा से स्थापित संस्था, संगठन आदि के कार्य की जानकारी दी है । एक व्यक्ति अल्पावधि में केवल राष्ट्र और धर्म संबंधी ही नहीं, अपितु सूक्ष्म-जगत के संबंध में भी इतना सर्वव्यापी कार्य करे, यह असंभव ही है । इससे परात्पर गुरु डॉक्टरजी की असामान्यता व आध्यात्मिक क्षेत्र में उनका सर्वमान्य अधिकार भी ध्यान में आएगा । इस जानकारी से पाठकों में अध्यात्म समझने की जिज्ञासा निर्माण होगी और वे साधना करने हेतु प्रवृत्त होंगे ।

 

१. अंतरराष्ट्रीय ख्याति के सम्मोहन-उपचार विशेषज्ञ

१ अ. वर्ष १९७१ से वर्ष १९७८ की अवधि में ब्रिटेन में सम्मोहन-उपचार-पद्धति पर सफल शोधकार्य

१ अ १. सम्मोहन उपचार संबंधी अभिनव शोध

१ आ. वर्ष १९८२ में भारतीय वैद्यकीय सम्मोहन एवं संशोधन संस्था की स्थापना

१ इ. सम्मोहनशास्त्र और सम्मोहन-उपचार पर ६ ग्रंथ प्रकाशित !

 

२. साधना संबंधी मार्गदर्शन हेतु सनातन भारतीय संस्कृति संस्था की स्थापना (१.८.१९९१)

२ अ. वर्ष १९९५ तक महाराष्ट्र, गोवा एवं कर्नाटक राज्यों में अभ्यासवर्ग, गुरुपूर्णिमा महोत्सव आयोजित करना इत्यादि ।

२ आ. वर्ष १९९६ से वर्ष १९९८ की अवधि में परात्पर गुरु डॉ आठवलेजी का महाराष्ट्र, गोवा और कर्नाटक में ब्राह्मतेज एवं क्षात्रतेज जागृत करनेवाली साधना संबंधी सैकडों सभाएं लेना ।

 

३. शीघ्र ईश्‍वरप्राप्ति हेतु गुरुकृपायोग साधनामार्ग की निर्मिति

३. अ. इसमें सांप्रदायिक साधना की भांति सभी को एक ही साधना नहीं बताई जाती; अपितु जितने व्यक्ति उतनी प्रकृतियां, उतने साधनामार्ग इस सिद्धांत के अनुसार साधना बताई जाती है ।

३. आ. अष्टांगसाधना (स्वभावदोष-निर्मूलन, अहं-निर्मूलन, नामजप, सत्संग, सत्सेवा, भावजागृति हेतु प्रयास, सत् के लिए त्याग एवं प्रीति), ये इस साधनामार्ग की महत्त्वपूर्ण विशेषताएं हैं ।

४. साधना, राष्ट्ररक्षा, धर्मजागृति आदि
विविध विषयों पर विपुल ग्रंथ-निर्मिति एवं ग्रंथ-प्रकाशन

अध्यात्म, धर्म, देवता, धर्मजागृति, राष्ट्ररक्षा आदि विषयों पर अगस्त २०१८ तक सनातन के ३१० ग्रंथ-लघुग्रंथों की मराठी, हिन्दी, गुजराती, कन्नड, तमिल, तेलुगु, मलयालम, बांग्ला,ओडिया, असमिया एवं गुरुमुखी (पंजाबी), इन भारतीय, तथा अंग्रेजी आदि १७ भाषाआें में ७३ लाख १९ सहस्र से अधिक प्रतियां प्रकाशित हुई हैं ।

४ अ. सनातन के ग्रंथों की कुछ प्रमुख विशेषताएं

१. कालानुसार आवश्यक उचित साधना की शिक्षा !

२. साधना में आनेवाली समस्याएं दूर कर साधना को दिशा देनेवाला मार्गदर्शन !

३. अध्यात्म के प्रत्येक कृत्य के क्यों एवं कैसे का शास्त्रीय उत्तर !

४. वैज्ञानिक युग के पाठक सरलता से समझ सकें, ऐसी वैज्ञानिक परिभाषा में (उदा. सारणी, प्रतिशत) लेखन !

वर्तमान वैज्ञानिक युग के पाठक वैज्ञानिक परिभाषा में लिखा लेखन शीघ्र समझते हैं, इसलिए परात्पर गुरु डॉक्टरजी वैज्ञानिक परिभाषा में ग्रंथ लिखते हैं । इनमें विषय स्पष्ट होने हेतु आकृतियां, सारणियां, प्रतिशत, सूक्ष्म संबंधी प्रयोग आदि होते हैं, साथ ही लेखन सूत्रबद्ध पद्धति से होता है ।

५. सैद्धांतिक विवेचन ही नहीं, साधना जीवन में उतारने संबंधी मार्गदर्शन !

६. व्यक्ति के साधना करने पर उसके अच्छे परिणाम; अंग्रेजी अक्षर नहीं, देवनागरी अक्षर सात्त्विक होना; तीर्थक्षेत्रों की महिमा आदि के विषय में वैज्ञानिक उपकरणों द्वारा किए गए शोध का अंतर्भाव !

७. सात्त्विक वेशभूषा, आहार इत्यादि का व्यक्ति पर होनेवाला अच्छा परिणाम आदि के संदर्भ में सूक्ष्म स्तरीय प्रक्रिया दर्शानेवाले चित्र एवं लेखन !

८. सनातन के अधिकांश ग्रंथों का २० प्रतिशत ज्ञान, अभी तक पृथ्वी पर कहीं भी उपलब्ध नहीं, इतना अद्वितीय है !

 

५. व्यापक अध्यात्मप्रसार हेतु सनातन संस्था की स्थापना (२२.३.१९९९)

५ अ. शारीरिक, मानसिक व आध्यात्मिक पीडा के मूल कारण प्रारब्ध और अनिष्ट शक्ति हैं, यह समझाना, तथा इनका
स्थायी उपाय साधना बताना

५ आ. जिज्ञासुआें और साधकों को सकाम साधना में न उलझने देना एवं निष्काम साधना सिखाकर ईश्‍वरप्राप्ति की दिशा दिखाना

५ आ १. व्यावहारिक लाभ अथवा समस्याआें के लिए मार्गदर्शन न कर, केवल साधना के संदर्भ में आध्यात्मिक स्तर पर मार्गदर्शन करना

५ इ. साधना संबंधी समस्याआें एवं पीडा की कारक शारीरिक, मानसिक एवं आध्यात्मिक बाधाएं खोजकर तदनुसार उपाय बताना

५ ई. सत्संग, व्याख्यान आदि का आयोजन करना; कुंभमेलों में अध्यात्मप्रसार करना; धर्मप्रसार कार्य की बाधाएं दूर होने हेतु यज्ञयाग, धार्मिक विधियां आदि करना; दूरदर्शनवाहिनियों पर हिन्दू धर्म का पक्ष रखना और उसके लिए वक्ता प्रशिक्षण कार्यशाला आयोजित करना इ.

५ उ. बुद्धि से समझ में आनेवाले ज्ञान के परे जाकर ज्ञान प्राप्त करना (From Known to UnKnown), उदा. किसी मूर्ति में देवता का तत्त्व कितना है, इस विषय में ध्यान या सूक्ष्म स्तरीय ज्ञान प्राप्त करना

५ ऊ. सनातन संस्था के जालस्थल – Sanatan.org 

प्रतिमास १ लाख २५ सहस्र से अधिक पाठकसंख्या रखनेवाला यह जालस्थल मराठी, हिन्दी, गुजराती, तमिल, कन्नड एवं अंग्रेजी इन छह भाषाआें में कार्यरत है और १८० देशों में देखा जाता है । अध्यात्मशास्त्र, हिन्दू धर्म, साधना, आचारपालन इ. जानकारी इस जालस्थल पर दी है ।

६. ईश्‍वरप्राप्ति हेतु, तथा राष्ट्र एवं धर्म के कार्य हेतु तन, मन धन का त्याग करनेवाले सहस्रों साधक निर्माण करना

७. परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी से मिले साधना के उचित मार्गदर्शन के कारण साधकों की आध्यात्मिक क्षमता बढकर कुछ साधक संतपद (गुरुपद) एवं सद्गुरुपद पर आरूढ होना

७ अ. साधकों की आध्यात्मिक क्षमता बढना

कुछ साधकों को अध्यात्म के विविध विषयों पर पृथ्वी पर कहीं भी उपलब्ध न रहनेवाला सूक्ष्म स्तरीय ज्ञान मिलता है । कुछ साधक किसी वस्तु अथवा घटना का सूक्ष्म परीक्षण करते हैं । (इस समय उन साधकों को उस वस्तु अथवा घटना के विषय में सूक्ष्म स्तरीय ज्ञान मिलता है ।) कुछ साधक अन्यों का आध्यात्मिक स्तर समझ सकते हैं ।

कुछ साधक सूक्ष्म स्तरीय सकारात्मक अथवा नकारात्मक स्पंदन पहचान पाते हैं । साथ ही इष्ट और अनिष्ट शक्तियों के प्रकटीकरण (इष्ट अथवा अनिष्ट शक्तियों के कारण होनेवाली व्यक्ति की गतिविधियां, हावभाव, हंसना, बोलना इत्यादि) पहचान पाते हैं, जबकि कुछ साधक अनिष्ट शक्तियों के प्रकटीकरण का उपाय भी (उदा. कौन सा नामजप करें ?) बता सकते हैं ।

७ आ. साधकों की शीघ्र आध्यात्मिक उन्नति होना

अगस्त २०१८ तक ८५ साधक संतपद पर आरूढ हुए, जबकि ६० प्रतिशत अथवा उससे अधिक आध्यात्मिक स्तर के १,१६३ साधक संतत्व की दिशा में बढ रहे हैं ।

अन्य संप्रदाय एवं सनातन में भेद !

अधिकांश संप्रदायों में केवल उनके प्रमुखों के बारे में जानकारी दी जाती है, शिष्यों के बारे में नहीं । परात्पर गुरु डॉक्टरजी ने अनेक लोगों में संतत्व एवं साधकत्व निर्माण किया है, जिस कारण सनातन के संत तथा साधक द्वारा किया मार्गदर्शन, उनके विचार, उनके द्वारा लिखी कविताएं, उनके विषय में अन्य साधकों को हुई अनुभूतियां इत्यादि विपुल लेखन सनातन प्रभात में प्रकाशित होता है । परात्पर गुरु डॉक्टरजी अब सनातन के संतों के चरित्र भी प्रकाशित करेंगे ।

८. महर्षि अध्यात्म विश्‍वविद्यालय के प्रेरणास्थान (न्यास की स्थापना : २२.३.२०१४)

८ अ. प्राचीन काल में पूरे विश्‍व में फैली हिन्दू संस्कृति की खोज करने हेतु अध्ययन दौरे करना

विश्‍वविद्यालय द्वारा प्राचीन काल से देश-विदेश में फैली हिन्दू संस्कृति के पदचिन्हों की खोज (उदा. श्रीलंका के रामायणकालीन स्थलों के संदर्भों का अध्ययन, अंकोर वाट (कंबोडिया) मंदिर जैसे प्राचीन मंदिरों का अवलोकन), इनका चित्रीकरण अथवा जानकार लोगों से चर्चा आदि माध्यम से हिन्दू संस्कृति की प्राचीनता और महिमा का अध्ययन करने का अमूल्य कार्य किया जा रहा है ।

८ आ. भव्य ग्रंथालय की निर्मिति

इस ग्रंथालय हेतु अब तक इतिहास, संस्कृति, कला, ज्योतिष, आयुर्वेद, विविध साधनामार्ग आदि विषयों के २० सहस्र से अधिक शोधपरक एवं विशेषतापूर्ण ग्रंथ हैं ।

८ इ. अंग्रेजी भाषा का जालस्थल

Spiritual.University (इस विश्‍वविद्यालय का भवन आगामी कुछ वर्षों में बन जाएगा ।)

८ ई. आध्यात्मिक, सांस्कृतिक एवं ऐतिहासिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण सहस्रों वस्तुआें का संरक्षण करनेवाले विश्‍व के
एकमेवाद्वितीय संग्रहालय की निर्मिति का कार्य

इस संग्रहालय के लिए भारत के तीर्थक्षेत्र, देवालय, संतों के मठ, संतों के समाधि स्थल, ऐतिहासिक स्थल इत्यादि स्थान की अध्यात्मशास्त्र की दृष्टि से विशेषतापूर्ण वस्तुएं, मिट्टी, जल आदि, तथा इष्ट एवं अनिष्ट शक्तियों का परिणाम दर्शानेवाली १५ सहस्र से अधिक वस्तुएं,सहस्रों छायाचित्र एवं २७ सहस्र से अधिक दृश्यश्रव्य-चक्रिकाएं बनें, इतना चित्रीकरण (कुल ३४३ टेराबाइट) आज तक संरक्षित किया गया है ।

९. अनिष्ट शक्तियों के विषय में विविधांगी शोध

९ अ. अनिष्ट शक्तियों की योनियों में से पाताल के मांत्रिक इस बलवान अनिष्ट शक्ति से संसार का परिचय कराना

९ आ. अनिष्ट शक्तियों की शक्ति प्रतिशत में मापने की पद्धति

९ इ. आध्यात्मिक पीडा से ग्रस्त साधकों की पीडा घटाने के लिए विविध आध्यात्मिक प्रयोग करना, उदा. गायन, वादन, नृत्य इत्यादि

९ ई. साधकों को कष्ट देनेवाली अनिष्ट शक्तियों के ज्ञान का उपयोग समष्टि के कल्याण हेतु करना

१०. शारीरिक, मानसिक तथा अनिष्ट शक्तियों की पीडा पर उपचार पद्धतियों के विषय में शोध

१० अ. आध्यात्मिक उपचारों की नई-नई पद्धतियां खोजना

१. नामजप उपचारों की विविध पद्धतियों की खोज, उदा. बारी- बारी से दो नामजप करना

२. देवताआें की सात्त्विक नामजप-पट्टियों के उपचार (देहशुद्धि, वास्तुशुद्धि एवं वाहनशुद्धि करने की पद्धतियों के साथ)

३. शरीर पर कुंडलिनीचक्र के ऊपर देवताआें के सात्त्विक चित्र अथवा नामजप-पट्टियां लगाना

४. सनातन-निर्मित सात्त्विक गणेशमूर्ति की परिक्रमा करना

५. संतों द्वारा लंबे समय तक निवास किए वास्तु अथवा कक्ष में बैठकर नामजप करना

६. संतों द्वारा लंबे समय तक उपयोग की वस्तुआें का आध्यात्मिक उपचारों के लिए प्रयोग करना

७. पंचतत्त्वों के अनुसार (पंचमहाभूतों के अनुसार) उपचार 

उदाहरण पृथ्वीतत्त्व का उपचार : माथे पर सात्त्विक कुमकुम लगाना,

आपतत्त्व का उपचार : तीर्थ प्राशन करना,

तेजतत्त्व का उपचार : विभूति लगाना,

वायुतत्त्व का उपचार : विभूति फूंकना

एवं आकाशतत्त्व का उपचार : संतों की आवाज में भजन सुनना

१० आ. विकार-निर्मूलन एवं आध्यात्मिक पीडा निवारण हेतु विविध उपचार पद्धतियों की खोज

१. स्पर्शरहित बिन्दुदाब (एक्यूप्रेशर)

इस पद्धति के अनुसार अच्छे आध्यात्मिक स्तर का साधक, रोगी को स्पर्श किए बिना (थोडी दूर से) रोगी पर अधिक प्रभावी बिन्दुदाब उपचार करता है ।

२. रिक्त बक्सों से उपचार

बक्से के रिक्त स्थान में आकाशतत्त्व होता है । इस आकाशतत्त्व के कारण उच्च स्तर के आध्यात्मिक उपचार होते हैं ।

३. प्राणशक्ति (चेतना) प्रणाली उपचार

हाथ की उंगलियों से निकलनेवाली प्राणशक्ति की सहायता से उपचार करने की यह सरल पद्धति है, इस पद्धति से स्वयं पर, तथा सुदूर स्थित रोगी पर भी उपचार किए जा सकते हैं ।

११. अपने (परात्पर गुरु डॉक्टरजी के) देह (नख, केश एवं त्वचा), तथा प्रयुक्त वस्तुआें में हुए दैवी परिवर्तनों संबंधी खोज

१२. अपने (परात्पर गुरु डॉक्टरजी के) महामृत्युयोग का खोजपरक अध्ययन

१३. सूक्ष्म पंचमहाभूतों के कारण होनेवाली बुद्धिअगम्य घटनाआें का अध्ययन, आधुनिक वैज्ञानिक उपकरण (उदा. यूनिवर्सल थर्मो स्कैनर) तथा प्रणाली (उदा. पॉलीकॉन्ट्रास्ट इंटरफेरन्स फोटोग्राफी) द्वारा खोज

१४. कला के लिए कला नहीं, ईश्‍वरप्राप्ति के लिए कला

१४ अ. साधकों को कला में निपुणता बढाने के साथ साधना संबंधी प्रगति पर भी मार्गदर्शन

परात्पर गुरु डॉक्टरजी चित्रकला, मूर्तिकला, संगीत, नृत्य, चित्रीकरण इत्यादि विषयों पर साधकों का केवल उस क्षेत्र में प्रवीणता बढाने हेतु मार्गदर्शन नहीं करते; अपितु उस माध्यम से साधकों की साधना में उन्नति हो, इसके लिए भी मार्गदर्शन करते हैं ।

१४ आ. चित्रकला एवं मूर्तिकला

परात्पर गुरु डॉक्टरजी के मार्गदर्शन में बनाए देवताआें के चित्रों में २७ से ३१.३ प्रतिशत, जबकि श्री गणेशमूर्ति में २८.३ प्रतिशत उस विशिष्ट देवता का तत्त्व आकृष्ट हुआ है । (कलियुग में देवता के चित्र अथवा मूर्ति में अधिकाधिक ३० प्रतिशत ही उस विशिष्ट देवता का तत्त्व आकृष्ट हो सकता है ।)

१४ आ १. सूक्ष्म चित्रकला

कुछ साधकों को किसी विषय से संबंधित जो सूक्ष्म स्तरीय प्रतीति होती है अथवा अंतर्दृष्टि से जो दिखाई देता है, उससे संबंधित कागद पर बनाए चित्र को सूक्ष्म ज्ञान संबंधी चित्र कहते हैं । सूक्ष्म ज्ञान संबंधी चित्रांकन का अर्थ है सूक्ष्म चित्रकला । चित्रकला की यह अभिनव शाखा परात्पर गुरु डॉक्टरजी ने खोजी है और सूक्ष्म चित्रांकन करने की क्षमता से युक्त साधकों को वह सिखाई है । परात्पर गुरु डॉक्टरजी ने इन चित्रों के विविध प्रकार भी (उदा. भासमान चित्र, काल्पनिक चित्र, कलात्मक चित्र, मायावी चित्र आदि प्रकार भी) खोजे हैं ।

१४ इ. अक्षरों और अंकों का लेखन

परात्पर गुरु डॉक्टरजी के मार्गदर्शन में बने देवनागरी अक्षरों और अंकों में ३१ प्रतिशत सात्त्विकता है । (कलियुग में अक्षरों अथवा अंकों में अधिकाधिक ३० प्रतशित सात्त्विकता ही हो सकती है ।)

१४ ई. सात्त्विक रंगोलियां

परात्पर गुरु डॉक्टरजी के मार्गदर्शन में बनी उन विशिष्ट रंगोलियों में विशिष्ट देवताआें के अनुमानित ३ से ४ प्रतिशत तत्त्व एवं चैतन्य, आनंद आदि स्पंदन आकृष्ट हुए हैं । एक रंगोली में तो १० प्रतिशत गणेशतत्त्व आकृष्ट हुआ है । (कलियुग की रंगोलियों में अधिकाधिक १० प्रतिशत देवतातत्त्व एवं शक्ति,भाव, चैतन्य, आनंद एवं शांति के स्पंदन आकर्षित हो सकते हैं ।)

१४ उ. सात्त्विक मेहंदी

परात्पर गुरु डॉक्टरजी के मार्गदर्शन में श्री सरस्वती, श्रीकृष्ण एवं श्री लक्ष्मी के २ से ४ प्रतिशत तक तत्त्व युक्त मेहंदी की कलाकृतियां बनाई गई हैं । (कलियुग में मेहंदी की कलाकृति में ५ प्रतिशत ही देवतातत्त्व आकर्षित हो सकता है ।)

१४ ऊ. संगीत

१४ ऊ १. गायन

परात्पर गुरु डॉक्टरजी के मार्गदर्शन में शास्त्रीय संगीत से विविध दैवी नादों तक का अध्यात्मशास्त्रीय अध्ययन, पश्‍चिमी संगीत तथा भारतीय संगीत का सात्त्विकता की दृष्टि से तुलनात्मक अध्ययन, तथा संगीत का व्यक्ति, प्राणी एवं वनस्पति पर होनेवाले परिणामों का अध्ययन किया जा रहा है । साथ ही संगीत-उपचारों का मनुष्य की शारीरिक, मानसिक एवं आध्यात्मिक पीडा पर होनेवाला परिणाम इस विषय में भी शोध किया जा रहा है ।

१४ ए. नृत्य

परात्पर गुरु डॉक्टरजी के मार्गदर्शन में भारतीय नृत्य शैली एवं पश्‍चिमी नृत्य शैली का सात्त्विकता की दृष्टि से तुलनात्मक अध्ययन, तथा नृत्य की विविध शारीरिक स्थितियां एवं मुद्राआें का आध्यात्मिक दृष्टि से शोध किया जा रहा है ।

१५. उच्च स्वर्गलोक, महर्लोक एवं जनलोक से पृथ्वी पर जन्मे दैवी (सात्त्विक) बालकों की पहचान एवं तत्संबंधी शोधकार्य

१६. ज्योतिषशास्त्र (फलज्योतिष, हस्तसामुद्रिक एवं पादसामुद्रिक शास्त्र) तथा नाडीभविष्य (नाडीपट्टिकाआें पर लिखा भविष्य) द्वारा विविधांगी शोधकार्य

१७. स्वभाषारक्षा, भाषा की सूक्ष्म अभिव्यक्तियों के विषय में शोधकार्य तथा भाषा की विशेषताआें का संग्रह

१८. प्राणियों तथा वनस्पतियों का सात्त्विकता की दृष्टि से अध्ययन

१९. साधना तथा राष्ट्र एवं धर्म के संदर्भ में जागृति करनेवाले सनातन पंचांग, संस्कार वही, धर्मशिक्षा फलक आदि प्रसार
सामग्री की निर्मिति

२०. सात्त्विक पूजनोपयोगी (उदा. कुमकुम, अष्टगंध, इत्र, कर्पूर, अगरबत्ती) एवं नित्योपयोगी (उदा. दंतमंजन, उबटन, शिकाकाई,साबुन, केश तेल) उत्पाद की निर्मिति हेतु मार्गदर्शन

२१. धर्माधिष्ठित हिन्दू राष्ट्र की (ईश्‍वरीय राज्य की) स्थापना हेतु कटिबद्ध प्रखर हिन्दुत्ववादी नियतकालिक सनातन प्रभात के संस्थापक एवं प्रथम संपादक (आरंभ ४.४.१९९८)

२१ अ. नियतकालिक सनातन प्रभात समूह 

दैनिक – मराठी (४ संस्करण)

साप्ताहिक – मराठी एवं कन्नड  पाक्षिक – हिन्दी एवं अंग्रेजी  मासिक – गुजराती  जालस्थल : SanatanPrabhat.org

२१ आ. विशेषताएं

१. आज तक किसी भी संप्रदाय अथवा धार्मिक संस्था ने राष्ट्र एवं धर्म जागृति हेतु दैनिक समाचार पत्र, साप्ताहिक, पाक्षिक एवं मासिक नियतकालिक विविध भाषाआें में आरंभ नहीं किए हैं ।

२. समाचारों पर राष्ट्राभिमानी एवं धर्माभिमानी पाठकों का दृष्टिकोण क्या हो, यह समझ में आए इसलिए समाचारों पर
टिप्पणियां लिखना आरंभ किया । ऐसा करनेवाली सनातन प्रभात एकमात्र पत्रिका है ।

२१ इ. इंटरनेट की हिन्दू वार्ता समाचार वाहिनी के संकल्पक

२९.१२.२०१४ से २९.१.२०१६ की कालावधि में हिन्दू वार्ता उपक्रम द्वारा हिन्दुआें की समाचार वाहिनी की नींव रखी ।

२२. धर्माधिष्ठित हिन्दू राष्ट्र की स्थापना हेतु कार्य

२२ अ. लोकतंत्र की दुष्प्रवृत्तियों के निर्मूलन हेतु वैध मार्ग से कार्य

२२ आ. हिन्दू राष्ट्र-स्थापना संबंधी ग्रंथमाला की निर्मिति, तथा नियतकालिक एवं जालस्थल द्वारा मार्गदर्शन

२२ इ. संत, संप्रदाय, हिन्दुत्ववादी, देशभक्त एवं सामाजिक कार्यकर्ताआें का संगठन एवं उन्हें आध्यात्मिक स्तर पर दिशादर्शन

२२ ई. आध्यात्मिक स्तर का कार्य

२२ ई १. परात्पर गुरु डॉक्टरजी के अस्तित्व से कार्य होना

अत्यंत उच्च कोटि के संतों के केवल अस्तित्व से भी कार्य होता है । इसीलिए अस्वस्थता के कारण वर्ष २००७ से परात्पर गुरु डॉक्टरजी कहीं भी बाहर न जा सकते हों, तब भी उनके अस्तित्व से हिन्दू राष्ट्र-स्थापना का कार्य वृद्धिंगत हो रहा है, उदा. कार्य को अनेक संतों के आशीर्वाद मिल रहे हैं, अनेक राष्ट्रप्रेमी एवं धर्मप्रेमी हिन्दू राष्ट्र-स्थापना हेतु संगठित एवं सक्रिय हो रहे हैं ।

२२ ई २. हिन्दू राष्ट्र-स्थापना हेतु १०० संत निर्माण करना 

आज पृथ्वी पर हिन्दू राष्ट्र-स्थापना हेतु चल रहे सूक्ष्म स्तरीय युद्ध में देवता और संत भुवर्लोक से लेकर छठे पाताल तक की आसुरी शक्तियों को पराजित कर चुके हैं । अब ७वें पाताल की आसुरी शक्तियों को पराजित कर सकें, ऐसे ब्राह्मतेज
(आध्यात्मिक बल) युक्त १०० संतों की आवश्यकता है । ऐसे संत निर्मित होने हेतु परात्पर गुरु डॉक्टरजी स्वयं कार्यरत हैं ।

अगस्त २०१८ तक उनके मार्गदर्शन में ऐसे ८५ संत तैयार हो चुके हैं । आगामी १-२ वर्षों में यह संख्या १०० हो जाएगी । इन १०० संतों के माध्यम से ७वें पाताल की आसुरी शक्तियों के पराजित होने पर ही हिन्दू राष्ट्र की स्थापना होगी ।

२३. परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी के राष्ट्र और धर्म संबंधी कार्य से प्रेरणा लेकर आरंभ हुआ कार्य (संगठन एवं उपक्रम)

२३ अ. हिन्दू राष्ट्र-स्थापना हेतु हिन्दू जनजागृति समिति (स्थापना ७.१०.२००२)

२३ अ १. हिन्दू जनजागृति समिति का कार्य

अ. हिन्दुआें को धर्मशिक्षा देना

इसके लिए जुलाई २०१८ तक गांव-गांव में ४४६ निशुल्क धर्मशिक्षावर्ग कार्यरत

आ. हिन्दू धर्मजागृति सभाआें का आयोजन

जुलाई २०१८ तक आयोजित की १,४२५ से अधिक हिन्दू धर्मजागृति सभाआें के कारण लगभग १७ लाख ६० सहस्र से अधिक हिन्दुआें में राष्ट्र एवं धर्म संबंधी जागृति

इ. अखिल भारतीय हिन्दू अधिवेशन एवं अन्य हिन्दू अधिवेशनों का आयोजन

इन अधिवेशनों से २५० से भी अधिक राष्ट्रप्रेमी एवं धर्मप्रेमी संगठन एकजुट ।

ई. राष्ट्रप्रेमी एवं धर्मप्रेमी व्यक्तियों की कानूनी सहायता करनेवाले धर्मप्रेमी अधिवक्ताआें का संगठन हिन्दू विधिज्ञ परिषद (स्थापना १४.६.२०१२) ।

उ. उद्योगपति परिषद (स्थापना ४.६.२०१८)

ऊ. आरोग्य सहायता समिति (स्थापना ४.६.२०१८) ।

ए. निशुल्क प्रथमोपचार एवं स्वरक्षा प्रशिक्षणवर्ग लेना ।

ऐ. महिला शाखा – रणरागिनी (स्थापना ३.६.२००९)

२३ अ २. जालस्थल – Hindujagruti.org :

हिन्दुआें को धर्मशिक्षा देना, हिन्दुआें में धर्मजागृति करना, हिन्दू राष्ट्र-स्थापना के विषय में मार्गदर्शन करना आदि के लिए यह जालस्थल कार्यरत है ।

२३ आ. आदर्श व संस्कारी पीढी की रचना हेतु Balsanskar.com

२३ इ. प्रचारमाध्यमों में हिन्दू धर्म का पक्ष रखने हेतु वक्ता तैयार करनेवाला सनातन अध्ययन केंद्र

२३ ई. सात्त्विक पुरोहित तैयार करने हेतु सनातन पुरोहित पाठशाला

२३ उ. अखिल मानवजाति को अध्यात्म सिखाने हेतु स्पिरिच्युअल साइन्स रिसर्च फाउंडेशन (एसएसआरएफ)
(स्थापना १५.१२.२००५ (ऑस्ट्रेलिया))

२३ उ १. उद्देश्य

अ. अध्यात्म का वैज्ञानिक परिभाषा में पूरे विश्‍व में प्रसार करना

आ. आध्यात्मिक शोध करना इत्यादि विविध पंथों एवं योगमार्गों के अनुसार साधना करनेवालों का आध्यात्मिक उन्नति हेतु मार्गदर्शन

इ. मानव जीवन की आध्यात्मिक समस्याआें के निवारण हेतु आध्यात्मिक उपचारों का प्रसार करना

२३ उ २. एसएसआरएफ जालस्थल – SSRF.org (निर्मिति १४.१.२००६) 

इस जालस्थल पर विविधांगी आध्यात्मिक शोध (उदा. विदेशी आचार तामसिक, जबकि हिन्दू आचार सात्त्विक होना, इस संदर्भ में शोधकार्य), कालानुसार आवश्यक साधना, व्यक्तित्त्व-विकास हेतु स्वभावदोष एवं अहं निर्मूलन का महत्त्व, अनिष्ट शक्तियों की पीडा पर उपचार आदि संबंधी जानकारी एवं लेख रखे गए हैं । यह जालस्थल २२ भाषाआें में (अंग्रेजी, चीनी, फ्रांसीसी, जर्मन, स्पैनिश आदि) उपलब्ध है । लगभग ५ लाख दर्शकसंख्या रखनेवाला यह जालस्थल संसार के १९६ देशों में देखा जाता है ।

२४. आगामी भीषण आपातकाल की दृष्टि से कार्य

२४ अ. अपनी दूरदर्शिता से अनेक वर्ष पूर्व ही आगामी भीषण संकटकाल का विचार कर जब डॉक्टर, वैद्य, औषधियां आदि उपलब्ध नहीं रहेंगी, तब प्राणरक्षा के लिए संजीवनी समान उपयुक्त होनेवाली विविध उपचार-पद्धतियों के विषय में विपुल जानकारी संग्रहित करना और आगे उस विषय में ग्रंथ भी प्रकाशित करना

२४ आ. प्रथमोपचार प्रशिक्षण, आपातकालीन सहायता प्रशिक्षण एवं अग्निशमन प्रशिक्षण के विषय में जनजागृति करना

२४ इ. आगामी भीषण संकटकाल में प्राणों की रक्षा हेतु अभी से साधना करने के अतिरिक्त अन्य कोई विकल्प नहीं, यह जनमानस पर अंकित करना

२५. परात्पर गुरु डॉक्टरजी का कार्य विश्‍व में फैलेगा, ऐसे नाडीपट्टिका-वाचक एवं ज्योतिषियों के गौरवोद्गार

अ. तमिलनाडु के पू. डॉ. ॐ उलगनाथन्, पुणे के श्री. मुदलियार गुरुजी आदि ५ – ६ नाडीपट्टिका-वाचकों ने परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी राष्ट्र एवं धर्म का महान कार्य कर रहे हैं और यह कार्य आगे अनेक गुना बढेगा, इस आशय के उद्गार व्यक्त किए हैं ।

आ. परात्पर गुरु डॉक्टरजी की जन्मपत्रिका और हाथ-पैरों की छाप देखकर वे किसकी हैं, यह ज्ञात न होते हुए भी कल्याण की श्रीमती इंदिरा सोनवणे, डोंबिवली स्थित डॉ. उदयकुमार पाध्ये आदि ७ – ८ ज्योतिषियों ने भी उपरोक्तानुसार गौरवोद्गार व्यक्त किए हैं ।

२६. परात्पर गुरु डॉक्टरजी का महामृत्युयोग टल जाए और उनके राष्ट्र एवं धर्म संबंधी कार्य की बाधाएं दूर हों, इस हेतु कुछ संत, नाडीपट्टिका-वाचक एवं ज्योतिषी स्वप्रेरणा से अनुष्ठान, धार्मिक विधि आदि माध्यमों से सहायता कर रहे हैं ।

२७. भावी हिन्दू राष्ट्र का दायित्व तथा धर्मसत्ता की धुरा संभालने के लिए आगामी पीढियों को सक्षम बनाना

२७ अ. साधना के दृढ संस्कार से युक्त सैकडों धर्मप्रसारक एवं धर्मरक्षक-साधक तैयार करना

२७ आ. विविध सेवाक्षेत्रों के (आध्यात्मिक शोधकार्य, ग्रंथ- निर्मिति, कला, चित्रीकरण इ.) अनेक साधकों को सक्षम बनाना

२७ इ. दैवी (सात्त्विक) बालकों को आगामी हिन्दू राष्ट्र चलाने की दृष्टि से सक्षम बनाना

ईश्‍वर ने पिछले कुछ वर्षों में उच्च लोकों के सैकडों जीवों को पृथ्वी के अनेक देशों में जन्म दिया है । जन्मतः उच्च आध्यात्मिक स्तर युक्त ये बालक दैवी बालक हैं । उनके सुप्त गुण पहचानकर उन्हें विविध सेवा सिखाना और आगे के चरण की साधना बताकर उनका संतपद तक मार्गक्रमण करवा लेना ।, इससे उन्हें हिन्दू राष्ट्र चलाने की दृष्टि से सक्षम करने का कार्य कर रहे हैं ।

(संपूर्ण परिचय हेतु पढें – सनातन का ग्रंथ परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी के सर्वांगीण कार्य का संक्षिप्त परिचय)