नियमितरूप से प्राणायाम, व्यायाम एवं योगासन कर शरीर की प्रतिकार क्षमता बढाएं !

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शरीर की प्रतिकार क्षमता बढाएं और आनेवाले आपातकाल का सामना करने के लिए अपने शरीर और मन की तैयारी करें !

अनेक साधु-संतों ने कहा है कि आनेवाला काल भीषण है । इसलिए आनेवाले काल के लिए हम अपना शरीर और मन तैयार करेंगे । यदि हम अपनी शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक क्षमता बढाने के लिए गंभीरता से प्रयत्न करेंगे, तो आनेवाले भीषण आपातकाल में अपने साथ-साथ देश की भी रक्षा हो सकती है ।

१. शरीर अच्छा रहने के लिए ‘उसमें योग्य मात्रा में प्राणशक्ति (चेतनाशक्ति) प्रवाहित होना और उसका नियमन’ अत्यावश्यक है !

श्रीमती अक्षता रेडकर

हम दिनभर अर्थार्जन के लिए डटकर प्रयत्न करते हैं । उसके बिना हमारा घर नहीं चल सकता । व्यावहारिकदृष्टि से जैसे यह आवश्यक है, वैसे ही अपनी देह चलाने के लिए उसमें योग्य मात्रा में प्राणशक्ति (चेतनाशक्ति) प्रवाहित होना और उसका नियमन होना अत्यंत आवश्यक है । उसके लिए संतुलित आहार का सेवन, योग्य दिनचर्या का पालन और नियमित व्यायाम करना आवश्यक होता है । इससे चेतनाशक्ति कार्यरत रहने में सहायता होती है ।

२. शारीरिक क्षमता अच्छी रहने के लिए किए जानेवाले प्रयत्न

‘शारीरिक क्षमता अच्छी रहने के लिए हम कौनसे प्रयत्न कर सकते हैं ?’, इस विषय की जानकारी आगे दी है ।

२ अ. सूर्यप्रकाश में (कच्ची धूप में) बैठना

पृथ्वी पर सूर्यप्रकाश के बिना जीवसृष्टि के टिका रहना असंभव है । हम सूर्यनारायण को ‘जग के प्राणदाता’ संबोधित कर सकते हैं । ‘ऐसे सूर्यदेव की कृपा प्राप्त करना’, यह केवल आज ही नहीं, अपितु शरीर की दृष्टि से सदैव ही अत्यावश्यक है । सूर्यप्रकाश में बैठना अर्थात चैतन्य एवं प्राणऊर्जा के झरने का नीचे बैठने समान है । घर के बरामदे में अथवा घर में रहकर सवेरे ७.३० से ९ तक, १५ से २० मिनट कच्ची धूप में बैठें । जितना सहन हो, उतनी ही देर धूप में बैठें । उस समय सीधे सूर्य की ओर देखना टालें ।

२ अ १. सूर्यप्रकाश में बैठने से होनेवाले लाभ

अ. शरीर में ‘ड’ जीवनसत्त्व (विटामिन डी) निर्माण होने में सहायता होती है । इससे हड्डियां मजबूत होकर जोड एवं स्नायू सशक्त होते हैं ।

आ. मस्तिष्क में स्थित ‘पीनियल’ ग्रंथी के कार्य में सुधार होता है और रात को नींद अच्छी लगती है ।

इ. सूर्यप्रकाश में बैठने से सफेद पेशी त्वचा की सतह पर आने से त्वचा की अनेक संसर्गजन्य रोगों से रक्षा होती है । सूर्य से आनेवाली अल्ट्रावाॅयलेट किरणों के कारण मुंहासे (एक्ने), एक्जिमा एवं सोरियासिस जैसे त्वचा के रोगों का निवारण होने में सहायता होती है ।

ई. शरीर की रोग प्रतिकारक्षमता बढती है । शास्त्रज्ञों के मतानुसार सौरऊर्जा के कारण शरीर की सफेद रक्तपेशी कार्यान्वित होती है । इससे जंतुसंसर्ग से रक्षा होती है ।

उ. उच्च रक्तदाब न्यून होने में सहायता होती है ।

 

श्री. निमिष म्हात्रे

२ आ. प्राणायाम करना

शरीर के चयापचय की क्रिया ठीक से होने के लिए प्राणवायु अग्नि बढाने का कार्य करती है । जैसे प्राणवायु बिना (ऑक्सीजन के बिना) दीप की ज्योत प्रज्वलित नहीं होती, वैसे ही प्राणवायु की कमी से शरीर की अग्नि मंद हो जाती है । प्राणायाम से शरीर में प्राणवायु अधिक मात्रा में कार्यरत होकर, शरीर के सभी अवयवों के कार्य में सुधार होता है । प्राणवायु के साथ ही प्राणशक्ति ग्रहण कर उसे शरीर में फैलाने का महत्वपूर्ण कार्य प्राणायाम के माध्यम से होता है ।

२ आ १. प्राणायाम से होनेवाले कुछ चुनिंदा लाभ

अनुलोम-विलोम, कपालभाती, उज्जयी, भ्रामरी और शीतली, ये प्राणायाम करने से आगे दिए लाभ हो सकते हैं ।

अ. ‘प्राणायाम में ‘कुंभक’के कारण शरीर की रोगप्रतिकारक्षमता बढती है’, ऐसा अनेक शोधकार्यों के माध्यम से सिद्ध हो रहा है । प्राणायाम के कारण मानसिक तनाव न्यून होता है । इसलिए भी शरीर की रोग प्रतिकारक्षमता बढने में सहायता होती है ।

आ. फेफडों की क्षमता बढती है ।

इ. हृदय की क्षमता बढती है और रक्ताभिसरण में भी सुधार होता है । इसके साथ ही शरीर की प्राणवायु के संक्रमण में सुधार होता है ।

ई. प्राणायाम करते समय किए गए उच्छ्वास के माध्यम से शरीर में विद्यमान समस्त विष वायुरूप में शरीर के बाहर फेंके जाते हैं । इससे शरीर स्वच्छ और शुद्ध होता है ।

उ. मस्तिष्क को प्राणवायु अधिक मात्रा में उपलब्ध होने से एकाग्रता बढती है । अनावश्यक विचार कम होेने में सहायता होती है ।

ऊ. अच्छी नींद लगती है ।

ए. ढलती आयु में उत्पन्न होनेवाला भुलक्कडपन कम होता है ।

ऐ. पचनशक्ति में सुधार होता है ।

ओ. त्वचा की गुणवत्ता बढती है ।

२ आ २. प्राणायाम, सूर्यनमस्कार और योगासन करने की रूपरेखा

शरीर द्वारा ग्रहण की गई प्राणशक्ति को शरीर में सर्वत्र ठीक से फैलाने का उत्तम कार्य सूर्यनमस्कार और योगासन करते हैं । इसलिए अकड गए स्नायु खुल जाते हैं और उनका बल भी बढता है । व्यायाम अथवा आसन करने से पहले शरीर में उत्साह निर्माण होने के लिए (warm up के लिए) सूर्यनमस्कार एक उत्तम माध्यम है । प्रतिदिन कम से कम ३० मिनट व्यायाम अथवा योगासन और १० से १२ मिनट प्राणायाम करने के लिए समय दें । इसकी रूपरेखा नीचे दिए समान रख सकते हैं ।

अ. प्राणायाम – १० मिनट

आ. शरीर का तापमान बढानेवाले व्यायाम (warm up exercises – इसमें ८ से १० सूर्यनमस्कार अथवा एक ही स्थान पर कूदने अथवा दौडने का समावेश कर सकते हैं ।) – ५ से ७ मिनट

उपरोक्त दोनों धूप में बैठकर और खडे रहकर कर सकते हैं ।

इ. योगासन करने की आदत न हो, तो आरंभ में वह १० मिनट करें और बाद में कुछ दिनों में अवधि बढाते जाएं । प्रतिदिन ३० मिनट योगासन अथवा व्यायाम प्रकार करें । उसमें स्नायु सुदृढ होने के लिए और शरीर का लचीलापन बढाने के व्यायाम करें । आजकल इंटरनेट पर विविध आसन और व्यायामप्रकार के संदर्भ में जानकारी उपलब्ध है । हमारे पहचान के योगतज्ञ, वैद्य अथवा भौतिकोपचार विशेषज्ञ की सहायता से उनमें से कुछ चुनिंदा व्यायाम प्रकार अदल-बदल कर किए जा सकते हैं ।

ई. ५ मिनट स्नायुयों को विश्राम देनेवाले व्यायाम अथवा आसन (cool down exercises), उदा. शवासन इत्यादि का समावेश कर सकते हैं ।

इसके अतिरिक्त घर के घर ही में शरीर की गतिविधि होने के लिए जानबूझकर लगभग ५ मिनट आगे, ५ मिनट पीछे और ५ मिनट बाजू से (साइड से) इसप्रकार चलें । ऐसा दिन में २ – ३ बार  करने से शरीर की गतिविधियां सहजता से होने में सहायता होती है ।

२ आ ३. दूरचित्रवाणी के कार्यक्रम देखना और वीडियो गेम खेलो से छोटे बच्चों के शरीर और मन की हानि टालने के लिए उनसे विविध व्यायामप्रकार करवा लें !

वर्तमान में छोटे बच्चे काफी देर तक दूरचित्रवाणी पर (टी.वी.) कार्यक्रम देखते हैं और वीडियो गेम खेलते हैं । माता-पिता अपने छोटे बच्चों से ‘घर के कामों में सहायता लेना, उन्हें रस्सी कूदना, ऊठक-बैठक मारना, एक जगह पर दौडना, लंगडी डालते हुए एक कक्ष से दूसरे कक्ष में जाना, मेढक-कूद लगाना (frog jump) इत्यादि व्यायामप्रकार बीच-बीच में करवाएं । इससे दूरचित्रवाणी पर कार्यक्रम देखना और वीडियो गेम खेलने से बच्चों के शरीर और मन की होनेवाली हानि टल जाएगी ।

२ इ. बिंदूदाबन (रोग प्रतिकारक्षमता बढाने के लिए)

शरीर के कुछ विशिष्ट बिंदू दाबने से चेतनाशक्ति विशिष्ट अवयवों के पास कार्यरत कर सकते हैं । आजकल अत्यावश्यक  रोगप्रतिकारक शक्ति बढाने के लिए आगे बताई गई बिंदू दिन में ३ बार और प्रत्येक समय पर एक मिनट दबाएं ।

अ. कोहनी मोडने पर उसकी जहां घडी समाप्त होती है, वहीं बाहर की ओर

आ. घुटनों के जोड से ४ उंगली नीचे और हड्डी के १ उंगली बाहर की ओर

इ. पैरों के अंदर की ओर घुटनों की हड्डी से ४ उंगली ऊपर और हड्डी के पीछे

 

ई. अंगूठे और तर्जनी के बीच की खांच में तर्जनी की हड्डी के मध्य पर मांसल भाग में दाबना

 

ये सभी बिंदू अंगूठे से दाब देकर १ मिनट घडी के कांटे की दिशा में गोलाकार घुमाएं ।

३. मनुष्य का चलना-फिरना कम होकर एक स्थान पर खडे रहना और बैठना बढ जाने से उसका परिणाम शरीर पर होकर समय बीतने पर विविध कष्ट होना

शरीर के अवयवों के उपयोग के अनुसार शरीर को मिलनेवाली चेतनाशक्ति और प्राणवायु उन-उन अवयवों में कार्यरत होती है । हमारा चलना-फिरना अधिक होगा, तो स्नायू एवं मांसपेशी में अधिक मात्रा में चेतनाशक्ति कार्यरत होने से उनकी क्षमता बढती है । जब हमारा चलना-फिरना कम होता है और एक जगह पर ही खडे रहना एवं बैठने का भाग बढता है, तब उसका परिणाम हमारी रक्ताभिसरण संस्था, श्वसन संस्था, जोडों और स्नायुओं पर होने से उसकी क्षमता कम होने लगती है । व्यायाम के अभाव के कारण ‘स्नायु अकडना, स्नायुओं की कमजोरी, कंधों पर तनाव बढने से उनका क्षरण होने से क्षमता कम होना और वेदना होने की मात्रा बढने लगती है । शारीरिक स्थिति दुर्बल होने से कालांतर में अनेक चोटें और हड्डियों के रोग उत्पन्न हो जाते हैं । कोई भी काम करते समय शरीर की अयोग्य स्थिति (posture) एवं कृति के कारण स्नायुयों को एकाएक झटका लगना, उन्हें चोट लगना, रीढ की हड्डी की डिस्क सरकना और इससे नसों पर दाब पडना, हाथ-पैरों में वेदना होना, सुन्न होना (numbness) इत्यादि कष्ट बढने लगते हैं ।

३ अ. उपरोक्त कष्ट टालने के लिए काम करते समय कुछ नियम और व्यायाम

योग्य व्यायाम और उसके साथ काम करने की पद्धति के नियमों का पालन, हम ऊपर दिए गए कष्ट टाल सकते हैं । ‘हम कौन से काम करते समय किन नियमोंका पालन कर सकते हैं ?’, इस संदर्भ की जानकारी आगे दी है ।

३ अ १. निरंतर खडे रहकर काम करते समय

बर्तन धोना, भोजन बनाना, कपडे धोना, इस्त्री करना इत्यादि काम निरंतर खडे रहकर करने पडते हैं । उस समय आगे दिए नियमों का पालन करें ।

अ. निरंतर खडे रहकर काम करते समय दोनों पैरों में थोडा अंतर रखकर खडे हों । थोडे समय दोनों पैरों पर समान वजन डालें और बीच-बीच में एक पैर पर वजन न्यून कर दूसरे पैर पर अधिक वजन डालें । इसप्रकार अदल-बदलकर करें । इसके लिए एक पैर भूमि पर और दूसरा पैर थोडी ऊंचाई पर पटे अथवा थोडी ऊंचाईवाले स्टूल पर रखें । ऐसा अदल-बदल कर करें । इसके लिए इसके लिए एक पैर भूमिपर और दूसरा पैर थोडे से ऊंचे पाट अथवा छोटे स्टूल पर रखकर एक के बाद एक पैर बदल कर खडे हों ।

आ. ओटा (किचन प्लैटफॉर्म) अथवा पटल की ऊंचाई व्यक्ति की कोहनी तक आए, इतनी हो । ओटा की ऊंचाई अधिक होगी, तो पाट पर खडे रहें ।

इ. २० से २५ बार ऐडियाें को उठाकर पंजों के बल खडे रहें, यह व्यायाम दिन में २ – ३ बार करें । इससे ऐडी की वेदना और पैरों की वेदना कम होगी ।

ई. कोई भी काम करते समय सदैव लगनेवाली वस्तु पास ही रखें । इससे उसके लिए झुकना नहीं पडेगा, उदा. छुरी, साबुन इत्यादि ।

उ. कुछ समय झुककर काम करना पड रहा हो, तो बीच-बीच में कमर से पीछे झुकें ।

ऊ. नीचे झुककर कुछ करना हो, तो घुटनों से झुकें ।

३ अ २. निरंतर बैठकर काम करते समय जैसे संगणकीय काम करना, सब्जी काटना, आटा गूंदना, दूरदर्शन के कार्यक्रम देखना, ये काम निरंतर बैठकर करने होते हैं । उस समय आगे दिए नियमों का पालन करें ।

अ. गर्दन अधिक आगे न झुकाते हुए शरीर की सीध में रखें ।

आ. कंधे आगे न झुकाते हुए पीछे और नीचे रखें । कंधे अपने कानों की सीध में रखना आदर्श है ।

इ. पीठ सीधी रखें । जिससे अपने कान, कंधे और कमर एक ही रेखा में आएगी ।

उपरोक्त स्थिति दूरदर्शन पर कार्यक्रम देखते समय और संगणकीय काम करते समय रखने से शरीर की होनेवाली हानि टल सकती है ।

उ. ‘अधिक नीचे झुकना न पडे’, इसके लिए उपकरणों का उपयोग करें । उदा. सब्जी काटते समय नीचे पाट लेना, लिखते समय नीचे स्टूल लेना ।

ऊ. बैठे-बैठे बीच-बीच में आगे दिए व्यायामप्रकार करें ।

१. गर्दन आगे, पीछे और अपने दाएं-बांए ओर मोडना, दाएं से बाएं और बाएं से दाएं घुमाना

२. कंधे आगे और पीछे गोलाकार में घुमाना

३. कलाई और टखना गोलाकार में घुमाना

४. पैर घुटने से सीधे कर मोडना

भारी काम करने हों तो अन्यों की सहायता लें । काम आपस में बांट कर और बारी-बारी से करें । उपरोक्त सूचना सर्वसामान्यों के लिए है । जिन्हें विशिष्ट बीमारी है, उदा. तीव्र कटीवेदना (कमरदर्द), उन्हें सूर्यनमस्कार करने से पहले अथवा व्यायाम करने से पहले वैद्यों के परामर्श से ही उपरोक्त सूचनाओं का पालन करें ।

ये सभी नियम एवं व्यायामप्रकार अपनी दिनचर्या में अंतर्भूत कर उनमें खंड नहीं पडने दें । उन्हें नियमितरूप से करने का प्रयत्न करें ।’

– श्रीमती अक्षता रेडकर एवं श्री. निमिष म्हात्रे, भौतिकोपचार विशेषज्ञ, सनातन आश्रम, रामनाथी, गोवा. (५.४.२०२०)

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