राजा धन्यमाणिक को स्वप्नदृष्टांत देकर माताबरी (त्रिपुरा) में स्थानापन्न हुई श्रीत्रिपुरासुंदरीदेवी !

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दशमहाविद्याओं में एक हैं त्रिपुरासुंदरीदेवी ! शक्ति संप्रदाय में त्रिपुरासुंदरीदेवी का विलक्षण महत्त्व है । त्रिपुरासुंदरीदेवी के नाम पर ही त्रिपुरा राज्य का नाम प्रचलित हुआ है । त्रिपुरा राज्य के उदयपुर शहर के निकट माताबरी गांव में श्रीत्रिपुरासुंदरीदेवी का मंदिर है । यह ५१ शक्तिपीठों में से एक पीठ है । यहां सती के बाएं पैर की उंगलियां गिरी थीं । कलियुग में इस स्थान पर धन्यमाणिक नामक राजा ने मंदिर निर्माण किया और इस मंदिर में त्रिपुरासुंदरीदेवी की स्थापना की ।

१. वर्तमान के मंदिर के विषय में राजा धन्यमाणिक को हुआ दृष्टांत !

वर्ष १५०१ में त्रिपुर पर राजा धन्यमाणिक का राज्य था । एक रात राजा को मां त्रिपुरेश्वरी ने स्वप्नदृष्टांत दिया । देवी राजा से बाेली, ‘‘चट्टग्राम में उनकी एक मूर्ति है । उसे सवेरा होने से पहले लेकर आओ ।’’ तत्पश्चात राजा की नींद खुल गई । उन्होंने तुरंत सैनिकों को वह मूर्ति लेकर आने का आदेश दिया । सैनिकों के वह मूर्ति को लाते-लाते सूर्योदय हो गया । उस समय वह माताबरी गांव में थे । देवी के आदेशानुसार वहीं पर मूर्ति की स्थापना की गई । उस समय वहां राजा धन्यमाणिक को उस स्थान पर श्रीविष्णु के मंदिर का निर्माण करना था । वहां त्रिपुरेश्वरी की मूर्ति स्थापित होने से राजा सोच-विचार में पड गए । तभी आकाशवाणी हुई कि राजा उस स्थान पर त्रिपुरासुंदरीदेवी के ही मंदिर का निर्माण करे । तब राजा ने देवी के ही सुंदर मंदिर का निर्माण किया ।

२. दैवीय कछुओं का आश्रय है कल्याणसागर ताल !

दैवीय कछुओं का निवासस्थान कल्याणसागर ताल और उसके पीछे देवी का मंदिर

त्रिपुरासुंदरीदेवी के मंदिर के पीछे साढे छ: एकड भूमि में एक बडा ताल है । उसे ‘कल्याणसागर ताल’ कहते हैं । इस ताल में १०० वर्षों से भी अधिक आयु के कुछ कछुए हैं । इस ताल के कछुए उनकी मृत्यु समीप आने का भान होने पर स्वयं ही सीढियां चढकर मंदिर के प्रांगण में आते हैं । देवी की एक परिक्रमा करते हैं और फिर प्राणत्याग करते हैं । मंदिर के प्रांगण में ऐसे कछुओं की समाधि है । इस स्थान को ‘कूर्म पीठ’ भी कहते हैं; कारण इस मंदिर का आकार कूर्म (कछुए) समान है ।’

३. भांडासुर का वध कर देवताओं को भयमुक्त करनेवाली श्रीत्रिपुरासुंदरीदेवी !

‘श्रीत्रिपुरासुंदरीदेवी शांत मुद्रा में शयन करनेवाले सदाशिव की नाभि से उत्पन्न हुए कमल के आसन पर विराजमान हैं । वे चतुर्भुज हैं । उनके हाथ में पाश, अंकुश, धनुष्य और बाण आदि शस्त्र हैं । देवी का आसन ब्रह्मा, विष्णु, महेश और यमराज अपने मस्तक पर धारण करते हैं । देवी त्रिनेत्रा हैं । उन्होंने मस्तक पर अर्ध चंद्र धारण किया है । त्रिपुरासुंदरीदेवी की उत्पत्ती कैसे हुई, इसका पुराणों में वर्णन है ।

सती के वियोग के पश्चात भगवान शिव सदैव ध्यानमग्न रहने लगे । उसी समय संपूर्ण सृष्टि को त्रस्त करनेवाले तारकासुर ने ब्रह्मा से वर प्राप्त कर लिया था कि उसकी मृत्यु केवल शिवजी के पुत्र से ही हो सकती है । इसलिए सभी देवताओं ने भगवान शिव को ध्यान से जागृत करने के लिए कामदेव और उनकी पत्नी रती को कैलाश पर्वत पर भेजा । कामदेव ने अपने कुसुम नामक बाण से भगवान शिव का ध्यान भंग किया । ध्यान भंग होने से क्रोधित शिवजी ने तीसरा नेत्र खोलकर कामदेव को भस्म किया । शिवजी के एक गण ने कामदेव की भस्म से एक मूर्ति बनाई । उस मूर्ति से एक पुरुष निर्माण हुआ । उस पुरुष ने भगवान शिव की स्तुति की और शिवजी ने उसका नाम ‘भांड’ रख दिया  । शिवजी के क्रोध से निर्माण होने से भांड तमोगुणी था । उसने तीनों लोकों में भयंकर उत्पात मचा दिया । उसने स्वर्ग पर आक्रमण कर सभी देवताओं को त्रस्त किया । तब देवराज इंद्र ने महर्षि नारद से इस पर उपाय पूछा । महर्षि नारद ने इंद्रदेवता को अपने रक्त और मांस से आदिशक्ति की आराधना करने के लिए कहा । उस अनुसार इंद्रदेवता ने देवी की उपासना करने पर देवी ने त्रिपुरासुंदरी के रूप में प्रकट होकर भांडासुर का वध किया और देवताओं को भयमुक्त किया !’

४. सनातन की श्रीचित्‌‌शक्ति (श्रीमती) अंजली गाडगीळ द्वारा श्रीत्रिपुरासुंदरीदेवी के दर्शन !

श्रीत्रिपुरासुंदरीदेवी को भावपूर्ण नमस्कार एवं हिन्दू राष्ट्र की स्थापना के लिए प्रार्थना करती हुई श्रीचित्‌‌शक्ति (श्रीमती) अंजली गाडगीळ

१०.१२.२०१८ को सनातन की श्रीचित्‌‌शक्ति (श्रीमती) अंजली गाडगीळ ने इस मंदिर में जाकर श्रीत्रिपुरासुंदरीदेवी के दर्शन किए । उन्होंने इस स्थान पर हिन्दू राष्ट्र की स्थापना के लिए यज्ञ किया और वहां कछुए की समाधि के दर्शन लेकर वहां प्रार्थना भी की ।

विशेष

यहां के कल्याणसागर ताल के कछुओं को खाद्यसामग्री देने पर वे पानी की सतह पर आकर दर्शन देते हैं । इसके साथ ही इस ताल के सभी कछुए देवी की आरती के समय ताल में एक स्थान पर एकत्र हो जाते हैं । जिस दिन श्रीचित्‌‌शक्ति (श्रीमती) अंजली गाडगीळ उस स्थान पर गईं थीं, उस दिन ताल में एक औषधि डालने के कारण कछुओं को खाद्य नहीं दे पाए । उस दिन किसी कछुए के पानी पर न आने से उनके दर्शन भी नहीं हुए । देवी के दर्शन और यज्ञ होने के पश्चात उस मंदिर से निकलते समय श्रीचित्‌‌शक्ति (श्रीमती) अंजली गाडगीळ के मन में विचार आया कि कम से कम एक कछुए का दर्शन हो जाता । उसी क्षण एक बडा कछुआ ऊपर आया और उसने उन्हें दर्शन दिए ।’

–  श्री. विनायक शानभाग (१७.१०.२०२०)

भांडासुर का वध कर देवताओं को भयमुक्त करनेवाली श्रीत्रिपुरासुंदरीदेवी की कृपा सभी भक्तों पर हो और उसकी कृपा से कलियुग की दुष्प्रवृत्तियों का नाश होकर हिन्दू राष्ट्र की स्थापना शीघ्र हो, ऐसी उनके चरणों में प्रार्थना है !

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