गुरुकृपायोगानुसार साधना के प्रमुख तत्त्व

इस लेख में हम गुरुकृपायोगानुसार किए जानेवाले साधना के प्रमुख तत्त्व देखेंगे ।

अधिकांश लोगों को साधना के आधारभूत सिद्धांतों का ज्ञान न होने के कारण वे अनुचित साधना करने में जीवन व्यर्थ गंवाते हैं । ऐसा न हो, इस हेतु आगे दिए मार्गदर्शक सिद्धांतों को समझकर उनके अनुुसार साधना करना आवश्यक है –

१. रुचि एवं क्षमतानुसार साधना,
२. अनेक से एक की ओर जाना,
३. स्थूल से सूक्ष्म की ओर जाना,
४. स्तरानुसार साधना,
५. वर्णानुसार साधना,
६. आश्रमानुसार साधना,
७. कालानुसार साधना,
८. सगुण की अपेक्षा निर्गुण श्रेष्ठ; परंतु साधना हेतु निर्गुण उपासना की अपेक्षा सगुण उपासना श्रेष्ठ,
९. सिद्धांत अनुसार साधना
१०. व्यक्तिनिष्ठा नहीं, अपितु तत्त्वनिष्ठा चाहिए !

 

सिद्धांत क्र. १ : रुचि एवं क्षमता के अनुसार साधना

गुरुकृपायोगानुसार साधना का नियम, ‘जितने व्यक्ति, उतनी प्रकृतियां, उतने साधनामार्ग’ का पालन करना, इस सिद्धांत के कारण सुलभ होता है । यह नियम है कि हम जो कुछ कर सकते हैं, उसे ईश्‍वर के चरणों में अर्पित करना, अर्थात उस माध्यम से साधना करना । सनातन संस्था का प्रत्येक साधक इस सिद्धांत के अनुसार साधना करता है, उदा. कुछ साधक संस्था द्वारा प्रकाशित ग्रंथों के लेखन की सेवा करते हैं । कुछ साधक देवी-देवताओं के सात्त्विक चित्र एवं मूर्तियां बनाने की सेवा करते हैं । कुछ साधक समाज में जाकर सत्संग-प्रवचन-बालसंस्कारवर्ग लेते हैं, तो कुछ साधक संस्था के आश्रमों में ‘रसोई-विभाग’, ‘स्वच्छता-विभाग’ आदि में सेवा करते हैं । माध्यम कोई भी हो, अधिकांश साधकों की आध्यात्मिक उन्नति हो रही है ।

 

सिद्धांत क्र. २ : अनेक से एक की ओर जाना

ईश्‍वर एक हैं और इस जगत् में जो भी है, वह अनेक अनेक अनेक है । इस सबसे हमें एक ईश्‍वर की ओर जाना है, यह बात निरंतर ध्यान में रखें । अब देखते हैं कि यह साध्य कैसे करें ।

१. कुलदेवता की उपासना

जिस कुलदेवताकी उपासना (आराधना) आवश्यक होती है, उसी अनुसार व्यक्ति उस विशिष्ट कुल में जन्म लेता है । बडे रोग में (बीमारी में) हम अपने मन से औषधि नहीं लेते । इसके लिए उस क्षेत्र के अधिकारी व्यक्ति के पास, अर्थात डॉक्टर के पास जाकर उनके बताए अनुसार औषधि लेते हैं । वैसे ही भवसागर में फंसने का बडा रोग दूर करने के लिए अर्थात अपनी आध्यात्मिक उन्नति के लिए, आध्यात्मिक दृष्टि से उन्नत पुरुषों के मार्गदर्शन में साधना करना आवश्यक है, परंतु ऐसे उन्नत समाज में अत्यल्प होते हैं । ऐसे में प्रश्‍न यह उठता है कि कौन-से देवता का नामजप करें । भगवान ने हमारी यह समस्या दूर की है । प्रत्येक की उन्नति हेतु आवश्यक कुल में ही भगवान ने उसे जन्म दिया है ।

जब ब्रह्मांड के सभी तत्त्व पिंड में लाए जाते हैं, तब साधना पूर्ण होती है । प्राणियों में से केवल गाय में ब्रह्मांड के सभी देवताओं के स्पंदन आकर्षित करने का सामर्थ्य होता है, इसलिए कहा जाता है कि ‘गाय के उदर में तैंतीस करोड देवता वास करते हैं ।’ ब्रह्मांड के सर्व तत्त्वों को आकर्षित कर, उनमें ३० प्रतिशत वृद्धि करने की क्षमता केवल कुलदेवता के नामजप में है । इसके विपरीत, श्रीविष्णु, शिव, श्री गणपति और श्री लक्ष्मी देवताओं के नामजप में से केवल उस देवता का मूलतः अल्प, विशिष्ट तत्त्व बढता है, जैसे शक्तिवर्धक जीवनसत्त्व विटामिन ए, बी इत्यादि लेने से होता है । यदि किसी में ‘बी’ जीवनसत्त्व अल्प है, और वह ‘ए’ जीवनसत्त्व ले रहा हो, तो उसका कोई उपयोग नहीं होता । उसी प्रकार किसी व्यक्ति में शिवतत्त्व अल्प होगा और वह विष्णुतत्त्व की उपासना करता होगा, तो उसका कोई उपयोग नहीं होता । उसका मनुष्य जन्म व्यर्थ जाता है । व्यक्ति में ए, बी, सी, डी अथवा जीवनसत्त्वों में से कौन-सा जीवनसत्त्व हममें अल्प है, वह डॉक्टर ही बता सकता है । इसी प्रकार हममें कौन-सा तत्त्व कम है, यह हमें संत ही बता सकते हैं । परंतु तन-मन-धन का त्याग हुए बिना संत हमें पास भी नहीं आने देंगे । इसलिए ए, बी, सी, डी में से कौन-सा जीवनसत्त्व कम है, यह ज्ञात न होने पर हम कोई बलवर्धक टॉनिक ले लेते हैं । इससे शरीर के सर्व जीवनसत्त्व बढने लगते हैं । कुलदेवता का नाम सर्व जीवनसत्त्व युक्त बलवर्धक (जनरल टॉनिक) है । इससे हममें जो तत्त्व हैं, वह बढते हैं । दूसरी बात यह है कि अध्यात्म में अपनी रुचि-अरुचि का महत्त्व नहीं है । मान लीजिए किसी व्यक्ति को क्षयरोग हो गया है और उसने कहा कि मुझे सल्फा की गोलियां पसंद हैं, पेनिसिलीन का इंजेक्शन पसंद है, इसलिए मैं वह लूंगा, तोउसका कोई उपयोग नहीं; क्योंकि उससे क्षयरोग के जंतु नहीं मरते । उसके लिए आयसोनेक्स ही लेनी पडती है । यह भी वैसा ही है । ‘मुझे गणपति प्रिय है’ अथवा ‘साईंबाबा प्रिय हैं’, इस रुचि-अरुचि का कोई उपयोग नहीं । इसके परे जाकर शास्त्रानुसार साधना करनेपर ही आध्यात्मिक उन्नति शीघ्र होती है ।

२. पूजाघर

अधिकांश लोगों के पूजाघर में आठ-दस अथवा उससे भी अधिक देवी-देवता होते हैं । मूलतः इतने देवी-देवताओं की आवश्यकता नहीं होती । देवताओं की संख्या घटाएं, उनका नियोजन करें । पूजाघर में कुलदेवता, श्री गणपति, कुलाचारानुसार बालगोपाल, हनुमान एवं श्री अन्नपूर्णा रखें । अन्य देवता जैसे शिव, दुर्गा समान किसी उच्चदेवता की उपासना करते हों, तो वह रखें । इतने ही देवता पर्याप्त हैं । अतिरिक्त देवताओं के चित्र तथा मूर्तियों का विसर्जन करें अथवा उन्हें किसी देवालय में दे दीजिए । हम मनुष्यप्राणी जो बोेलते हैं, वह सब शब्दों में होता है । वह नादभाषा होती है, जबकि देवताओं की प्रकाशभाषा होती है । हमारी नादभाषा का देवताओं की प्रकाशभाषा में और देवताओं की प्रकाशभाषा का हमारी नादभाषा में रूपांतरण का कार्य गणपति करते हैं; इसलिए पूजाघर में गणपति होने आवश्यक हैं ।

३. देवालय जाना

कुछ लोग प्रत्येक दिन अलग-अलग देवताआें के मंदिर में जाते हैं । अध्यात्मशास्त्रानुसार ऐसा करना अनुचित है; क्योंकि अध्यात्म में एकनिष्ठा चाहिए । इसलिए अपने कुलदेवता के ही मंदिर जाएं । यदि निकट ही कुलदेवता का मंदिर न हो, तो किसी भी एक देवी अथवा देवता को कुलदेवी अथवा कुलदेव का रूप मानकर, उसी भाव से श्रद्धापूर्वक उसी एक मंदिर में जाते रहें । यहां यह ध्यान रखें कि ‘जहां भाव, वहां भगवान’ होते हैं ।

४. पोथीपाठ

अपनी कुलदेवता अथवा उपास्यदेवता की ही पोथी पढें । यदि उनकी पोथी न हो, तो किसी भी एक देवता अथवा देवी की पोथी पढें । उस समय यह श्रद्धा एवं भाव रहे कि वे देवता अथवा देवी आपके कुलदेव अथवा उपास्यदेवी का ही एक रूप हैं । पोथी में भी सहस्र शब्द होते हैं । कुछ लोग कहते हैं, ‘‘मैंने भागवत के इतने पाठ किए ।’’ केवल पारायण करने में क्या अर्थ है ?
संत कबीर ने कहा है,

पोथी पढि-पढि जग मुआ, पंडित भया न कोय ।
ढाई आखर प्रेम के पढे सो पंडित होय ॥

केवल पाठ करने की अपेक्षा ग्रंथ में जो बताया है, उसे आचरण में लाएं । पोथी में सहस्रों शब्द होते हैं । उसकी अपेक्षा एक नामजप पर आना आवश्यक है

५. तीर्थयात्रा

तीर्थयात्रा के विषय में भी यही नियम है । जहां आपके कुलदेव अथवा कुलदेवी हैं, केवल वहीं जाएं ।

६. भजन गाना

हमारे यहां गांव-गांव में भजन मंडलियां होती हैं । भजन में बताया जाता है कि भगवान का नाम लो, सत्संग में जाओ, सत्सेवा करो, ईश्‍वरप्राप्ति के लिए कुछ त्याग करो, ईश्‍वरप्राप्ति की लगन बनाए रखो; परंतु उसे आचरण में लाने की अपेक्षा लोग क्या करते हैं, केवल ऊंचे स्वर में भजन ही गाते रहते हैं । सिनेमा के गीतों की अपेक्षा भजन निश्‍चित ही श्रेष्ठ हैं ! अनेक भजनों की अपेक्षा अपने कुलदेवता के ही भजन गाएं ।

७. आरतियां

हनुमान मंदिर में आरती के समय देवी-देवताओं की तीन-चार आरतियां गाते हैं । ‘पडोसी की आरती यदि आधे घंटे चलती है, तो हम एक घंटे गाते हैं’, और इस बात पर लोग गर्व अनुभव करते हैं ! यह अनुचित है । नवरात्रि में देवीतत्त्व अधिक कार्यरत होता है, इसलिए देवी की ही आरती गाना अधिक श्रेयस्कर है । (‘ॐ जय जगदीश हरे’ आरती जो हम अधिकतर गाते हैं, उसमें जगदीश का (श्रीविष्णुका) नाम केवल १०-११ बार आया है । श्रीविष्णु की शक्ति अधिक किसमें है, तो वह है ‘जगदीश’ शब्द में । ‘तुम करुणा के सागर’, इन शब्दों में श्रीविष्णु का वर्णन एवं प्रशंसा है, उसमें विष्णुतत्त्व नहीं है । इसीलिए आरती गाने में जो तीन-चार मिनट लगते हैं, उसकी अपेक्षा ‘श्री विष्णवे नमः’ इस प्रकार नामजप करने से निश्‍चित ही अधिक लाभ होता है ।) अर्थात अनेक आरतियों से एक आरती की ओर, एक आरती से एक नाम की ओर, हमारा मार्गक्रमण निरंतर ऐसा होना चाहिए । शिवरात्रि जैसा विशेष दिन न हो, तो अपने कुलदेवता अथवा उपास्यदेवता की ही आरती गाएं ।

 

सिद्धांत क्र. ३ : स्थूल से सूक्ष्म की ओर

हम देवता के स्थूल चित्र अथवा मूर्ति की पूजा करते हैं; परंतु ईश्‍वरतत्त्व तो सूक्ष्मतम है । ऐसे में हम जीवनभर उस स्थूल मूर्ति की पूजा कर सूक्ष्मतम तत्त्व तक कब पहुंचेंगे ? उसके लिए स्थूल पूजा की अपेक्षा मानसपूजा करें, शरीर से देवालय अथवा तीर्थयात्रा पर जाने की अपेक्षा मन से जाने का प्रयत्न करें । इस प्रकार सूक्ष्म साधना की आदत पड जाए, तो एक दिन हम उस सूक्ष्मतम तत्त्व तक निश्‍चित ही पहुंच पाएंगे । नामजप भी ऊंचे स्वर में करने की अपेक्षा मन में करने का प्रयत्न करें ।

 

सिद्धांत क्र. ४ : स्तरानुसार साधना

स्तर अर्थात अधिकार । संत तुकाराम महाराजजीने कहा है, ‘साधना करनेकी जिसकी जैसी क्षमता होगी, वैसा ही उसे उपदेश मिलेगा ।’ आप जितनी कर पाएं, उतनी ही साधना करने का प्रयत्न करें, तो ही प्रगति होगी । जो संभव न हो, उसे बलपूर्वक करने का प्रयत्न न करें । स्तरानुसार आगे दी गई साधना कर सकते हैं । इसका अर्थ यह है कि अमुक स्तर को साध्य करने के लिए अमुक साधना करें । यदि मानें कि निर्जीव वस्तुओं का स्तर ० प्रतिशत एवं मोक्षप्राप्त व्यक्ति का १०० प्रतिशत है, तो कलियुग में सर्वसामान्य व्यक्ति का स्तर २० प्रतिशत होता है ।

आध्यात्मिक स्तर (प्रतिशत)    साधना
२०  नहीं
 ३०  पूजा, देवालय जाना, पोथीवाचन
 ४०  नामस्मरण
 ५०   सत्संग
 ५५  सत्सेवा एवं गुरुप्राप्ति
६० त्याग

सिद्धांत क्र. ५ : वर्णानुसार साधना

भगवान श्रीकृष्ण ने कहा है, ‘चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागशः ।’ (श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय ४, श्‍लोक १३) इसका अर्थ है – ‘मैंने गुणकर्म अनुसार चार वर्णों की निर्मिति की है । जिसकी जैसी साधना करने की क्षमता होगी अथवा जिसके लिए जो साधना आवश्यक होगी, उसके अनुसार विशिष्ट वर्ण में प्रत्येक व्यक्ति जन्म लेता है । अंत में तो अपना तन-मन-धन ही क्या, प्राण भी ईश्‍वर को अर्पण करने हैं । अपने पास जो भी है, उसे ईश्‍वर को अर्पण करने से, अर्थात वर्णानुसार साधना करने से प्रत्येक व्यक्ति शीघ्र आध्यात्मिक उन्नति कर सकता है ।

 

सिद्धांत क्र. ६ : आश्रमानुसार साधना

हममेंसे अधिकांश लोग गृहस्थाश्रमी हैं । प्राचीन काल में धर्मग्रंथों का अध्ययन करनेवाले ब्रह्मचर्याश्रमियों, वानप्रस्थाश्रमियों एवं संन्यासियों की व्यवस्था राजा-महाराजा किया करते थे; परंतु वर्तमान धर्मनिरपेक्ष राजनीतिज्ञों से ऐसी अपेक्षा करना असंभव है ।

 

सिद्धांत क्र. ७ : कालानुसार साधना

काल अनंत होने के कारण इसे युग की भाषा में ही मापा जा सकता है । सत्य, त्रेता, द्वापर एवं कलि, इन चार युगों का एक चक्र होता है । ऐसे चक्र अनंत काल से चले आ रहे हैं और चलते रहेंगे । काल के अनुसार सब कुछ परिवर्तनशील है । कलियुग के लिए ‘यज्ञानां जपयज्ञोऽस्मि’, अर्थात ‘(सर्व) यज्ञों में मैं जपयज्ञ हूं’ (भावार्थ : विभिन्न प्रकार के यज्ञों में जपयज्ञ, नामजप ही श्रेष्ठ (साधना) है ।), ऐसा स्वयं भगवान ने श्रीमद्भगवद्गीता में (अध्याय १०, श्‍लोक २५) कहा है ।

 

सिद्धांत क्र. ८ : सगुण की अपेक्षा निर्गुण श्रेष्ठ परंतु
साधना के लिए निर्गुण उपासना की अपेक्षा सगुण उपासना श्रेष्ठ

‘सगुण की उत्पत्ति निर्गुण से होती है एवं लय भी निर्गुण में ही होता है । इस कारण, सगुण की अपेक्षा निर्गुण श्रेष्ठ होता है । यद्यपि ऐसा है, तब भी साधना का आरंभ सगुण से करते हुए धीरे-धीरे निर्गुण की ओर जाएं ।

 

सिद्धांत क्र. ९ : तत्त्व के अनुसार साधना

‘तत्त्वानुसार साधना’ का सिद्धांत अद्वैतवाद पर आधारित है ।

१. सैद्धांतिक कार्यकारणभाव

‘तत्त्व से उत्पत्ति एवं तत्त्व में ही लय’ इस सैद्धांतिक कार्यकारणभाव पर यह तत्त्व आधारित है । यह तत्त्व स्वयं ईश्‍वर-वाचक ही है । ‘गुरुकृपायोग’ निर्गुणवाद का समर्थक (पुरस्कर्ता) होने से उसका साधनारूपी कारणभाव, अर्थात तत्त्वस्वरूपता अथवा ईश्‍वरमयता प्राप्त करना

२. अनिष्ट से ईष्ट की प्राप्ति करना

‘तत्त्वानुसार साधना’ यह सिद्धांत मूलतत्त्व से, अर्थात ब्रह्मांडधारकता से संबंधित है । इसलिए कि अनिष्ट से अच्छे की प्राप्ति करने के लिए पूर्णत: ईश्‍वर पर श्रद्धा और उनके चरणों में समर्पण होना चाहिए ।

३. प्रत्येक बात का आध्यात्मीकरण

‘तत्त्व के अनुसार साधना’, अर्थात प्रत्येक बात का आध्यात्मीकरण कर उसमें चैतन्य ढूंढने के उपरांत उसे कार्यरत कर ‘चराचर में ईश्‍वरीय तत्त्व होने की अनुभूति लेना ।’

४. जो कुछ सामने दिखाई दे, उसे कर्तव्य मानकर करना

इस भाव से कृत्य करने से प्रत्येक जीव निर्गुण ईश्‍वरवाद की ओर बढता है तथा शाश्‍वत तत्त्व को प्राप्त करता है । अर्थात जीवन के प्रसंगों में वह कर्तव्य से एकरूप होकर मोक्ष का अधिकारी बनता है ।

 

सिद्धांत क्र. १० : व्यक्तिनिष्ठा नहीं, तत्त्वनिष्ठा होनी चाहिए !

अ. व्यक्तिनिष्ठा के कारण किसी व्यक्ति के मोह में फंस सकते हैं । तत्त्वनिष्ठा से ऐसा नहीं होता । साधना करते समय और किसी से नहीं, केवल ईश्‍वर से लगाव होना चाहिए । ईश्‍वर से लगाव होने पर जन्म-मृत्यु के चक्र से सदा के लिए मुक्त हुआ जा सकता है !

अ. व्यक्तिनिष्ठा से संकीर्णता आती है; परंतु तत्त्वनिष्ठा से ऐसा नहीं होता । अध्यात्म में संकीर्णता का कोई स्थान नहीं है; यहां तो ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ की स्थिति प्राप्त करनी होती है ।

संदर्भ : सनातन-निर्मित ग्रंथ ‘गुरुकृपायोगानुसार साधना’