समर्थ रामदास स्वामीजी द्वारा दासबोध में किया गया नवविधा भक्ति का वर्णन !

भक्तिमार्ग में सुंदर श्रवणभक्ति का स्तर प्राप्त करने हेतु
और क्या प्रयास करने चाहिए, इस संदर्भ में समर्थ रामदास स्वामीजी
हमें नवविधा भक्ति एवं उसमें श्रवणभक्ति के बारे में मार्गदर्शन करते हैं !

समर्थ रामदास स्वामीजी के शिष्यों ने उनसे ‘भक्तिमार्ग का आचरण कैसे करना है ?, यह पूछा,

कैसे करें भगवद् भजन । कहां रखें यह मन । भगवद भजन का लक्षण । आप विशद करें ॥

शिष्यों ने समर्थजी के चरणों को पकडकर यह प्रश्‍न पूछा । यह सुनकर समर्थजी का मन प्रसन्न हुआ और उन्होंने बताना आरंभ किया । उसमें उन्होंने भागवत में बताई हुई नवविधा भक्ति ही अपने शिष्यों को बताई ।

  • श्रवण करना: विविध बातों का श्रवण करना – समर्थ जी ने साधना का मुख्य साधन श्रवण बताया है । अनेक विषयों का श्रवण करें, ऐसा उन्होंने बताया है कर्ममार्ग, ज्ञानमार्ग, सिद्धांतमार्ग, योगमार्ग, वैराग्यमार्ग, विविध व्रत, विविध तीर्थ, विविध दान, विविध महात्मा, योग, आसन, सृष्टीज्ञान, संगीत, चौदह विद्या, चौसंठ कला, यह सब श्रवण करने के लिए बताते हैं । प्रत्येक विषय के लिए हमें ज्ञान चाहिए, ऐसा इसमे से समर्थ हमें बताना चाहते हैं, सिखाना चाहते हैं ।

  • श्रवण का लाभ : श्रवणे आतुडे भक्ती । श्रवणें उद्भवे विरक्ती । श्रवणें तुटे आसक्ती । विषयांची ॥
    श्रवणे विचार कळे । श्रवणे ज्ञान हे प्रबळे । श्रवणें वस्तु निवाळे । साधकासी ॥
    (श्रवणसे भक्ती बढती है, विरक्ती निर्माण होती है, विषयों के प्रति आसक्ति छूटती है । श्रवण से नए नए विचार समझ में आते हैं । श्रवण का लाभ है कि इससे ज्ञान प्रबल होता है.)

  • श्रवण किससे करें ? : संत वाड्मय संतों के अनुभव से आता है । इसलिए उनके ग्रंथों का किया गया वाचन श्रवण ही है । वाड्मय पढना अर्थात गुरूमुख श्रवण ही है । हमें श्रवण के लिए विविध माध्यम मिल रहे हैं । कोई विषय ग्रंथ से पढे गए शब्दों की अपेक्षा दुसरों के मुख से वह शब्द सुनने का मन पर अलग परिणाम होता है । उसके लिए हमारे लिए सत्संग का महत्व अनन्यसाधारण है, इसका भी उदाहरण हमें इससे ध्यान में आता है ।

  • श्रवण कैसे करें ? : श्रवण करें बीरबल की मूर्ती जैसे ! एक बार अकबर एक जैसी तीन मूर्ती लाए । सबसे अच्छी मूर्ती कौन सी है यह बिरबल को ढूंढने के लिए कहा । उन तीनों ही मूर्तियों के कान मे छिद्र था । बीरबल ने तीनों ही मूर्ति के कानों के छिद्रों में बारीक तार डाली । एक मूर्ती के कानों कें डाली तार दूसरे कान से बाहर आ गई । दुसरी मूर्ति के कानों मे डाली तार मुंह से बाहर आयी । तीसरी मूर्ति के कान में डाली तार हृदय से बाहर आई । बीरबल ने बताया कि यह तीसरी मूर्ति ही अच्छी है ।’ उन्होंने कहा – श्रोता तीन प्रकार के होते हैं । एक प्रकार अर्थात एक कान से सुनकर दूसरे कान से निकाल देता है । दूसरा श्रोता एक कान से सुनता है और सुना हुआ दूसरों को बताता है । तीसरा श्रोता कान से सुना हृदय में रखता है । उसका मनन, चिंतन करता है । अच्छे से ध्यानपूर्वक सुने बिना मनुष्य की किसी भी क्षेत्र में प्रगति नहीं होती है । इसलिए हम लोग जो कुछ भी सुनते हैं, वह अंत:करण से सुनना चाहिए ।

  • श्रवण अर्थात सुना हुआ आचरण में लेकर आना – श्रवण भक्तिमार्ग का प्रवेश द्वार है । हम लोग बताते हैं कि श्रवण शब्द का अर्थ है ‘सुनना’, पर श्रवण का अर्थ केवल सुनना नहीं है अपितु जो कुछ हम सुनते हैं उसे प्रत्यक्ष अपने जीवन में उतारना है । इसके लिए कौरव और पांडवों की एक कथा है । कौरव पांडवों के गुरु कृपाचार्य जी ने एक पाठ दिया कि, ‘हमेशा सत्य बोलो । क्रोध मत करो’ । दूसरे दिन कृपाचार्य जी ने बच्चों से पूछा, ‘बच्चों कल क्या सीखा ?’ बच्चों ने दोनों वाक्य बोल कर दिखा दिए । पर युधिष्ठर से बताया,‘मुझे दोनों वाक्य स्मरण नहीं हुए हैं ।’ १०-१२ दिन के उपरांत युधिष्ठर ने पुन: वही उत्तर दिया । अब कृपाचार्य को चिंता होने लगी । उन्होंने भीष्माचार्य जी से कहा । युधिष्ठर ने भीष्माचार्य जी से कहा । ‘पिछले १०-१२ दिन मैंने केवल सत्य बोला । जिसके कारण मुझे वह वाक्य स्मरण जैसे हो गया है । पर क्रोध नहीं करना यह स्मरण नहीं हो रहा है । कारण किसी न किसी कारण से क्रोध आ जाता है ।’ तब भीष्म को आनंद हुआ कि, मेरे पोते को सुनने और श्रवण में अंतर समझ आ गया है । इससे ध्यान में आता है कि, हम जो कुछ भी सुनते हैं, उसमें से कितना सीखते हैं और कृति में लाते हैं, इसको महत्व है । हमभी उसी दृष्टि से प्रयत्न करेंगे ।

  • श्रवण कैसे करना चाहिए ? इस विषय पर समर्थ रामदास स्वामीजी ने एक सुंदर सुत्र बताया है । वह मार्गदर्शन करते हैं कि,ऐसें हें अवघेंचि ऐकावें । परंतु सार शोधून घ्यावें । असार तें जाणोनि त्यागावें । या नांव श्रवणभक्ति ॥- समर्थ कहते हैं, हम जो कुछ श्रवण करते है उसका सार लेना अर्थात हमें उसमें से सीखने का प्रयत्न करना है, उसको आचरण में उतारने का प्रयत्न करना, ‘असार जाणून त्यागावे’ अर्थात हमारे में दुर्गुण, दोष-अहं निकाल फेंकना । श्रवण में केवल सुनना नहीं, पर जो कुछ सुना उस पर मनन करना होता है ।

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