रुद्राक्ष

शास्त्रके अनुसार शिवपूजा करते समय गलेमें रुद्राक्ष-माला धारण की जाती है । असली एवं नकली रुद्राक्षकी विशेषताआेंको समझने हेतु रुद्राक्षके लाभ, असली एवं नकली रुद्राक्षकी विशेषताएं तथा अंतर आदिके बारेंमें प्रस्तूत लेखद्वारा हम अवगत होंगे ।

 

असली रुद्राक्ष !

असली रुद्राक्ष

 

१. रुद्राक्षके लाभ

अ. रुद्राक्षमालाको गलेमें अथवा अन्यत्र धारण कर किया गया जप, बिना रुद्राक्षमाला धारण किए गए जपसे सहस्र गुना लाभदायक होता है । इसी प्रकार अन्य किसी मालासे जप करनेकी तुलनामें रुद्राक्षकी मालासे जप करनेपर दस सहस्र गुना अधिक लाभ होता है । इसीलिए शैव मानते हैं कि रुद्राक्षमाला लिए बिना अथवा धारण किए बिना यदि मंत्रजप किया जाए, तो शीघ्र (पूर्ण) मंत्रसिदि्ध प्राप्त नहीं होती । रुद्राक्षमालाका अधिकाधिक लाभ प्राप्त करने हेतु उसे गलेके निकट इस प्रकार बांधे कि उसका गलेसे अधिकाधिक स्पर्श हो ।

आ. कुंडलिनी जागृत होने हेतु एवं प्राणायाम अंतर्गत ‘केवल कुंभक’ साध्य करनेमें रुद्राक्षसे सहायता मिलती है ।

इ. ‘रुद्राक्षमें विद्युत चुंबकीय (इलेक्ट्रोमैग्नेटिक) गुणधर्म पाए जाते हैं ।’ – गुरुदेव डॉ. काटेस्वामीजी

 

२. नकली रुद्राक्ष

अब हम नकली रुद्राक्षके बारेमें समझ लेंगे ।

२ अ. भद्राक्ष

भद्राक्ष

इसका वृक्ष रुद्राक्ष समान होता है; परंतु उसके फल एवं बीज गोलाकार होते हैं । बीजोंके अर्थात भद्राक्षोंके मुख नहीं होते, अर्थात इनके ऊध्र्व-अधर भाग नहीं होते । भद्राक्षका प्रयोग विषवर्धन करता है अर्थात विषम तरंगोंको बढाता है । सामान्यतः भद्राक्ष ही रुद्राक्षके नामसे बेचे जाते थे । इसके फल पक्षी नहीं खाते और यदि खा लें तो अपने प्राण गंवा देते हैं ।

 

२ आ. विकृताक्ष

विकृताक्ष

 

आजकल यही रुद्राक्षके नामसे बेचा जाता है । यह एक प्रकारके जंगली बेरोंका बीज है । तांत्रिक यज्ञ, जादू-टोना, उच्चाटन इत्यादि हेतु विकृताक्षका प्रयोग किया जाता है । नेपालमें गुरंग नामक जातिके खानाबदोश लोगोंने विकृताक्षका प्रयोग करना आरंभ किया । इनपर उष्ण (गरम) सुईसे आर-पार छिद्र करते हैं तथा ॐ, स्वस्तिक, शंख, चक्र, इत्यादि आकृतियां भी तराशते हैं । रंग भरने हेतु इसे कत्थेके पानीमें रखते हैं; इसीलिए सादे पानीमें रखते ही इसका रंग धुल जाता है ।

 

२ इ. कृत्रिम रुद्राक्ष

लाकडी रुद्राक्ष

 

यह लाख, लकडी, प्लास्टिक इत्यादिसे बनते हैं ।

 

३. अच्छा रुद्राक्ष

विशेषताएं

रुद्राक्षाची वैशिष्ट्ये

रुद्राक्षकी विशेषताएं

 

अ. भारी एवं तेजपूर्ण
आ. स्पष्ट मुखोंसे युक्त
इ. ॐ, शिवलिंग, स्वस्तिक इत्यादि शुभचिह्नयुक्त
र्इ. बडेसे बडा रुद्राक्ष एवं छोटेसे छोटा शालिग्राम उत्तम होता है । (मेरुतंत्र)
उ. जिस वृक्षकी गोलाई दोनों भुजाओंके आलिंगनमें पूरी नहीं समाती, ऐसे वृक्षका अर्थात पुराने वृक्षका रुद्राक्ष

ऊ. समुद्री सतहसे अधिक ऊंचाईपर स्थित वृक्षका रुद्राक्ष एवं एक ही वृक्षकी ऊपरी शाखाओंके रुद्राक्ष : ऊंचाईपर स्थित रुद्राक्षोंको ऊपरसे सत्त्वगुण अधिक मात्रामें मिलता है, इसलिए वे अधिक प्रभावशाली होते हैं ।

ए. शुभ्र रंगका सर्वोत्तम होता है । अन्य रुद्राक्ष लाल, पीले एवं काले रंगके क्रमश: कनिष्ठश्रेणीके होते हैं ।

 

४. असली एवं नकली रुद्राक्षमें अंतर

  असली रुद्राक्ष नकली रुद्राक्ष
अ. आकार मछली समान चपटा गोल
आ. रंग (आकाशकी लालिमा समान) पक्का पानीमें धुल जाता है
इ. पानीमें डालनेपर सीधे नीचे जाता है तैरता है अथवा हिलते-डुलते नीचे जाता है
ई. आर-पार छिद्र होता है सुईसे करना पडता है
उ. तांबेके बर्तनमें अथवा पानीमें डालनेपर गोल-गोल घूमना होता है नहीं
ऊ. कुछ समय बाद कीट लगना नहीं लगते लगते हैं
ए. मूल्य (वर्ष २००८ में) रु. ४,००० से ४०,००० रु. २० से २००
ऐ. कौनसी तरंगें ग्रहण करता है ? सम (सत्त्व)
ओ. स्पंदनोंका अनुभव होता है नहीं होता

 

५. नकली रुद्राक्ष एवं संत

संत यद्यपि बाह्यतः ‘नकली’ रुद्राक्ष दें, तब भी उनके चैतन्यसे वह अंदरसे ‘असली’ रुद्राक्षमें परिवर्तित हो जाता है ।

 

असली रुद्राक्ष धारण कर उससे प्राप्त होनेवाले लाभका अनुभव करें !

 

संदर्भ : सनातन-निर्मित ग्रंथ ‘शिव’