भगवान शिवजीके रूप

१. रुद्र

‘रुद्र’ शब्दके कुछ अर्थ आगे दिए अनुसार हैं ।

१. रु अर्थात रोना तथा द्रु अर्थात भागना । रुद्र अर्थात रोनेवाला, रुलानेवाला; देवतादर्शनके लिए बिलखनेवाला । जो भगवानके दर्शन हेतु क्रंदन करता है ।

२. रुत् अर्थात संसाररूप दुःख । जो उन्हें दूर करता है, नाश करता है, वह है रुद्र ।

२. रुद्रगण

ये रुद्रके पार्षद (सेवक) हैं, अर्थात सदैव रुद्रके समीप रहकर सेवा करते हैं । ऐसा बताया जाता है कि इन गणोंकी संख्या एक करोड है । भूतनाथ, वेताल, उच्छुष्म, प्रेतपूतन, कुभाण्ड इत्यादि गण रुद्रद्वारा उत्पन्न किए गए हैं । रुद्रगण रुद्रसमान ही वेष धारण करते हैं ।

 

३. अर्धनारीनटेश्‍वर (अर्धनारीश्‍वर)

शक्तियुक्त शिव ही कार्यक्षम होते हैं । शिवागमके अद्वैतकी संकल्पनामें शक्ति (माया)का त्याग न कर, ब्रह्मशक्ति मानकर उसका संग्रह किया गया है । शिव-शक्तिकी
नित्य समरसताको ही ‘अद्वैत’ माना गया है ।

 

४. वेताल

वेताल शब्द ‘वैताल’ शब्दसे बना है । ‘वैताल’ अर्थात विकृतियोंको अपनी तालपर नचानेवाला । जहां आहत एवं अनाहत नाद एकत्रित होते हैं, वहां ‘वै’ नामक स्पंदन निर्मित होते हैं, जो विकृतियोंको सीधे मार्गपर लाते हैं ।

 

५. नटराज

शिवजीकी दो अवस्थाएं मानी जाती है । उनमेंसे एक है समाधि-अवस्था एवं दूसरी है तांडव अथवा लास्य नृत्यावस्था ।

अधिक जानकारी हेंतु पढें नटराज

६. पशुपतिनाथ

ऐसी कथा है कि पशुपतिनाथने महिषका रूप लिया था । इस महिषका धड केदारनाथ (हिमालय, हिन्दुस्थान) और सिर पशुपतिनाथ में माना जाता है ।

नेपालमें स्थित शिवजीका प्रसिद्ध स्थान – ‘पशुपतिनाथ. काठमांडू (नेपाल) स्थित शिवलिंगको पशुपतिनाथ कहते हैं ।

 

७. कालभैरव

ये आठ भैरवोंमेंसे एक हैं एवं इनकी उत्पत्ति शिवके क्रोधसे हुई है । शिवने ब्रह्मदेवका पांचवा मस्तक कालभैरवद्वारा तुडवाया एवं उसके उपरान्त उन्हें काशीक्षेत्रमें रहनेकी आज्ञा दी । इन्हें काशीका कोतवाल भी कहा जाता है । काशीमें प्रवेश करनेपर सर्वथम इनके दर्शन करने पडते हैं ।

 

८. वीरभद्र

यमधर्म एवं दक्षिणलोकके मुख वीरभद्र भी शिवगण हैं । दक्षिणलोकसे प्रत्यक्ष सम्बन्ध रखनेवाले वीरभद्र एक ही देवता हैं; इसलिए ये भूतमात्रोंके नाथ अर्थात भूतनाथ हैं । वीरभद्रने वेतालको अपना वाहन बनाया है । चलित कथाके अनुसार, शिवके लिंगरूपकी प्रथम पूजा वीरभद्रने की थी ।

 

९. भैरव (भैरवनाथ)

शिवागममें भैरवोंके चौंसठ प्रकार बताए गए हैं । भैरवोंके आठ वर्ग हैं एवं प्रत्येक वर्गमें आठ भैरव हैं । इन आठ वर्गोंके प्रमुख अष्टभैरवके नामसे सिद्ध हैं । इसके साथ ही, कालभैरव, बटुकभैरव भी सिद्ध हैं । तन्त्रग्रन्थमें चौंसठ भैरवोंको चौंसठ योगिनियोंका स्वामी मानकर शक्तियों एवं भैरवोंके बीच निकटताका सम्बन्ध दर्शाया गया है । ऐसी
मान्यता है कि भैरव प्रत्येक शक्तिपीठका संरक्षण करते हैं ।

 

६. अन्य कुछ रूप

स्कंद, सुब्रह्मण्यम्, मंगेश, वैजनाथ, जोतिबा, रवळनाथ, खंडोबा, भूतनाथ, मसोबा, शिवदूत, ज्योतिर्लिंग एवं बाण (लिंग) ।

संदर्भ : सनातन का ग्रंथ ‘भगवान शिवसम्बन्धी अध्यात्मशास्त्रीय विवेचन’

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