श्री त्र्यम्बकेश्‍वर ज्योतिर्लिंग

त्र्यम्बकेश्‍वर, नासिक, महाराष्ट्र

दक्षिण काशी के नाम से विख्यात, महाराष्ट्र के नासिक जनपद के निकट ‘त्र्यम्बकेश्‍वर’ नामक ज्योतिर्लिंग है । इस ज्योतिर्लिंग की रचना में ३ गोलाकार लिंग हैं जो कि ब्रह्मा, विष्णु एवं महेश के प्रतीक हैं । नारायण-नागबलि, त्रिपिण्डी श्राद्ध जैसे विधि यहां शीघ्र फलप्रद होते हैं । यहांपर संत निवृत्तिनाथ की समाधि है ।

१. त्र्यम्बकेश्‍वर देवालय के गर्भगृह में निर्मित ऊर्जा तथा चैतन्य सहन करने की क्षमता जिनके शरीर में है, ऐसे ही व्यक्तियों को गर्भगृह में प्रवेश दिया जाता है । इसका शास्त्रीय कारण इस प्रकार है – जिस प्रकार ज्वालामुखी फटने पर निकली ऊर्जा से गैमा, अल्फा, क्ष किरण तथा धन एवं ऋण छोटे-छोटे विद्युत कणों की वर्षा होती है; ठीक उसी प्रकार ज्योतिर्लिंग से भी होती है । त्र्यम्बकेश्‍वर में भी ऐसा होता है । वहां के पण्डितों ने कहा कि, इसीलिए ‘आजतक कभी ३ दिन, तो कभी ७ दिन भी यह मंदिर बंद रखा गया है’।

२. विद्वानों ने कहा है कि प्राचीन काल में भारत में जहां-जहां प्राकृतिकरूप से ज्वालामुखी का विस्फोट हुआ, वहांं ज्योतिर्लिंग निर्माण किए गए । विशिष्ट दिन, विशिष्ट समयपर प्राकृतिकरूप से ज्वालामुखी फटनेपर वहां का चैतन्य, ऊर्जा, स्पंदन आदि नित्य की तुलना में अधिक तापमान उत्पन्न करनेवाले होते हैं । ऐसी स्थिति त्र्यम्बकेश्‍वर में पाई जाती है ।

३. जब भी पृथ्वीतल पर, विशेषरूप से भारत पर वैश्‍विक ऊर्जा से संबंधित वातावरणीय प्रकोप हुए हैं (उदा. भारत-चीन, भारत-पाक युद्ध) उस समय यह मंदिर कम से कम १ दिन बंद रखना पडा था ।

४. त्र्यम्बकेश्‍वर शिवयोयुक्त प्राचीन शिवयोग में वर्णित तीर्थस्थल है । यहां ब्रह्मा, विष्णु एवं महेश युक्त जललिंग है ।

(संदर्भः ‘विश्‍वचैतन्य का विज्ञान’, पूजनीय डॉ. रघुनाथ शुक्ल, वरिष्ठ वैज्ञानिक, राष्ट्रीय रासायनिक प्रयोगशाला)

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