दुर्गा सप्तशती ( श्री सप्तश्‍लोकी दुर्गास्तोत्र )

 

श्री दुर्गादेवी

इस लेख में हम दुर्गा सप्तशती (श्री सप्तश्‍लोकी दुर्गा) इस स्तोत्र के विषय में जान लेते हैं । स्तोत्र अर्थात देवता का स्तवन, अर्थात उनकी स्तुति है । स्तोत्रपठन करने से पठन करनेवाले व्यक्ति के सर्वओर ‘सूक्ष्म स्तरपर देवता का संरक्षक-कवच’ निर्माण होकर उसकी अनिष्ट शक्तियों से रक्षा होती है ।

मार्कंडेय महापुराण में ‘सप्तशती’ अर्थात ‘देवीमहात्म्य’. ‘श्री सप्तश्‍लोकी दुर्गा’ यह ‘देवी का महात्म्य’ बतानेवाले स्तोत्र होने से उसकी रचना अनुष्टुप छंद में की गई है । ये स्तोत्र नारायण ऋषि द्वारा रचित हैं । सनातन की पुरोहित वेदपाठशाला के संचालक श्री. वझेगुरुजी ने सनातन संस्था के प्रेरणास्थान प.पू. डॉ. आठवलेजी के मार्गदर्शन में दुर्गा सप्तशती स्तोत्र का पठन किया है ।

तो सुनते हैं, ‘श्री सप्तश्‍लोकी दुर्गास्तोत्र’ …….

 

॥ श्री सप्तश्‍लोकी दुर्गास्तोत्र ॥

ॐ अथ सप्तश्‍लोकी दुर्गा (सप्तशती)

शिव उवाच

देवी त्वं भक्तसुलभे सर्वकार्यविधायिनी ।

कलौ हि कार्यसिद्ध्यर्थमुपायं त्रूहि यत्नतः ॥

देव्युवाच

शृणु देव प्रवक्ष्यामि कलौ सर्वेष्टसाधनम् ।

मया तवैव स्नेहेनाप्यम्बास्तुतिः प्रकाश्यते ॥

ॐ अस्य शी दुर्गा सप्तश्‍लोकी स्तोत्र मंत्रस्य

नारायण ऋषि: अनुष्टुप् छ्न्द:

शी महाकाली महालक्ष्मी महासरस्वत्यो देवता:

शी दुर्गा प्रीत्यर्थे सप्तश्‍लोकी दुर्गा पाठे विनियोग: ।

ॐ ज्ञानिनामपि चेतांसि देवी भगवती हि सा

बलादाकृष्य मोहाय महामाया प्रयच्छति ॥१॥

दुर्गे स्मृता हरसिभीतिमशेष जन्तो:

स्वस्थै: स्मृता मति मतीव शुभां ददासि

दारिद्र्य दु:ख भय हारिणि का त्वदन्या

सर्वोपकार करणाय सदार्द्र चित्ता ॥२॥

सर्व मङ्गल माङ्गल्ये शिवे सर्वार्थ साधिके

शरण्ये त्र्यम्बके गौरी नारायणि नमोऽस्तुते ॥३॥

शरणागत दीनार्त परित्राण परायणे

सर्वस्यार्ति हरे देवि नारायणि नमोऽस्तुते ॥४॥

सर्वस्वरूपे सर्वेशे सर्व शक्ति समन्विते

भयेभ्यस्त्राहि नो देवि दुर्गे देवि नमोऽस्तुते ॥५॥

रोगान शेषा नपहंसि तुष्टा

रुष्टा तु कामान् सकलान भीष्टान् ।

त्वामाशितानां न विपन् नराणां

त्वामाशिता ह्या शयतां प्रयान्ति ॥६॥

सर्वा बाधा प्रशमनं त्रैलोक्यस्याखिलेश्‍वरि

एकमेव त्वया कार्यमस्मद् वैरि विनाशनं ॥७॥

इति सप्तश्‍लोकी दुर्गास्तोत्र सम्पूर्णा ॥