श्री सरस्वतीदेवी की उपासना एवं सरस्वती यंत्रका कार्य

१. श्री सरस्वतीदेवी की उपासना हेतु आवश्यक गुण एवं घटक

अ. जिज्ञासा एवं सीखने की वृत्ति

यद्यपि जीव का आध्यात्मिक स्तर न्यून (कम) हो, फिर भी जिज्ञासा एवं सीखने कीr वृत्ति के कारण वह आगे के स्तर का ज्ञान, कला एवं विद्या प्राप्त कर सकता है ।

आ. तीव्र उत्कंठा

यद्यपि जीव का आध्यात्मिक स्तर न्यून हो, फिर भी तीव्र उत्कंठा के कारण वह ज्ञान ग्रहण कर सकता है ।

इ. मार्गदर्शन लेना

देवता की उपासना के साथ-साथ सतत मार्गदर्शन लेने से उपासक की चूकें एवं त्रुटियां उसे ध्यान में आती हैं और वे तत्काल सुधारी जा सकती हैं । इससे उसके जीवन के अनेक वर्ष व्यर्थ होने से बच जाते हैं ।

ई. दृढता एवं निरंतरता रखना

उ. एकाग्रता

ऊ. धर्माचरणी एवं सदाचरणी होना

अधर्म से आचरण करनेवालों से अधिकतर ज्ञान, विद्या एवं कला का दुरुपयोग होता है । इसी कारण वह सरस्वतीदेवी से आगे के स्तर का ज्ञान, कला एवं विद्या प्राप्त नहीं कर पाता; अपितु वह उनकी अवकृपा का पात्र बन जाता है ।

ए. साधना

उच्च स्तर का ज्ञान ग्रहण करने के लिए उपासक के लिए अत्यंत आवश्यक है कि वह निरंतर साधना करे । साधना से ज्ञान ग्रहण करने की क्षमता बढती है । ज्ञान के उचित प्रयोग हेतु, सात्त्विक बुद्धि आवश्यक है । निरंतर साधना, बुद्धि को सात्त्विक बनाने में सहायक होती है ।

ऐ. विनम्रता, अल्प अहं, शरणागतभाव एवं कृतज्ञभाव

‘विद्या विनयेन शोभते ।’ उक्ति के अनुसार श्री सरस्वतीदेवी को ‘अल्प अहं’वाला उपासक अधिक प्रिय है । विनम्र, शरणागत एवं कृतज्ञभाव से संपन्न उपासक यद्यपि कुछ न मांगे, तो भी श्री सरस्वतीदेवी उसे स्वयं अधिक ज्ञान एवं विद्या प्रदान करती हैं ।

ओ. सात्त्विक स्तर ५० प्रतिशत से अधिक

श्री सरस्वतीदेवी की उपासना हेतु जीव का आध्यात्मिक स्तर न्यूनतम ५० प्रतिशत होना आवश्यक है । स्तर ५० प्रतिशत से अधिक हो जाए, तो जीव की बुद्धि सात्त्विक बनती है एवं श्री सरस्वतीदेवी की उपासना उत्तम ढंग से कर, उसके लिए ज्ञान, विद्या एवं कला की प्राप्ति सुलभ हो जाती है । कलियुग में जीव का स्तर ४० प्रतिशत से अधिक हो, तो भी पर्याप्त है; क्योंकि कलियुग में जीव का स्तर मूलतः लगभग २० प्रतिशत होता है ।

औ. व्यष्टि की अपेक्षा समष्टि का अधिक विचार

श्री सरस्वतीदेवी को संकीर्ण मनोवृत्ति के उपासक की अपेक्षा व्यापक प्रवृत्ति के उपासक अधिक प्रिय हैं । ऐसे उपासक को ज्ञान देने से वह ज्ञान केवल उसतक सीमित नहीं रहता है; सर्व जीवोंतक वह ज्ञान पहुंचता है ।

२. उपासना से संभाव्य प्राप्ति

अ. उपनिषद् में श्री सरस्वती की वाणी से एकरूपता मानी गई है । प्रज्ञावृद्धि एवं वाणी में मिठास के लिए उनसे प्रार्थना की गई है ।

आ. कलाप्राप्ति : शिव, श्री गणपति एवं सरस्वती देवी कला एवं ज्ञान के प्रमुख देवता हैं । कला प्राप्ति के लिए जीव में एकाग्रता, उत्कंठा एवं परिश्रम के साथ ही, कला सीखने के लिए जन्मजात गुण भी चाहिए । जीव ने उपरोल्लेखित देवता अथवा अन्य उच्च-देवता की उपासना की हो, तो वह कोई भी कला सहज ग्रहण कर सकता है । श्री गणपति की उपासना से उपासक के सूक्ष्म-देहों पर का काली शक्ति का आवरण नष्ट होता है और वह कला के सूक्ष्म आयामों का आकलन सहज कर सकता है । जीवने शिव की उपासना की हो, तो उसके मन की शक्ति का अपव्यय नहीं होता; मन एकाग्र होने में सहायता मिलती है । श्री सरस्वतीदेवी की कृपा से बुद्धि प्रगल्भ होती है ।

इ. विद्याप्राप्ति : प्रमुख १८ विद्या, विविध उपविद्याएं व माया की विविध विद्या को सीखने हेतु, जीव के लिए श्री सरस्वतीदेवी की उपासना आवश्यक है ।

ई. ज्ञानप्राप्ति : श्री सरस्वतीदेवी के हाथ में वेद हैं; अर्थात वे ज्ञान की उपास्यदेवता हैं एवं उनके पास सर्वोच्च ज्ञान है । श्री सरस्वतीदेवी की उपासना से उपासक की बुद्धि सात्त्विक बनती है । इसलिए कठिन ज्ञान को भी वह सहजता से ग्रहण कर पाता है ।

उ. बुद्धि सात्त्विक बनना : श्री सरस्वती देवी की उपासना से उपासक की बुद्धि सात्त्विक बनती है । अपने प्रत्येक कर्म पर उसका ध्यान रहता है एवं चूकों की मात्रा भी घट जाती है । उच्च स्तर के उपासक की बुद्धि इतनी सात्त्विक बनती है कि उसे ईश्वर आंतरिक मार्गदर्शन करते हैं । ’ – ईश्वर (कु. मधुरा भोसले के माध्यम से, ११.३.२००५, रात्रि ८.२० से ९.५८)

 

३. सरस्वती यंत्र, उसका कार्य एवं पूजन का महत्त्व

अ. सामान्यतः बनाया जानेवाला श्री सरस्वती देवी का यंत्र

आ. यंत्र का प्रमुख कार्य

‘विशिष्ट देवता का तत्त्व आकर्षित कर, उसमें से उस देवता के उपासक के लिए (उपासना हेतु) आवश्यक तारक अथवा मारक शक्ति प्रक्षेपित करना यंत्र का प्रमुख कार्य है ।’ – ईश्वर (कु. मधुरा भोसले के माध्यम से, ११.३.२००५)

सरस्वती यंत्र में ३ प्रतिशत सरस्वतीतत्त्व है, जिसका लाभ उपासक को होता है । यंत्र के कारण उपासक के मन पर काली शक्ति का आवरण नहीं आता । यंत्रदर्शन करते हुए मंत्रोच्चारण इत्यादि साधना करने से, बुद्धि एवं वाणी शुद्ध एवं सात्त्विक बनती हैं । नित्यमितरूप से यंत्र की भावपूर्वक पूजा करनेवाले पर श्री सरस्वतीदेवी प्रसन्न होती हैं । वह कठिन विद्या भी अल्प काल में अर्जित कर पाता है ।

यंत्र के इस महत्त्व एवं लाभ के कारण ही नववर्षारंभ पर श्री सरस्वतीपूजन करते हैं । विद्यालय में जानेवाले विद्यार्थियों द्वारा प्रयुक्त स्लेट पर, पूजा के लिए सरस्वती यंत्र बनाने की प्रथा है । यह श्री सरस्वतीदेवी की उपासना का ही एक अंग है ।’

– ईश्वर (कु. मधुरा भोसले के माध्यम से, ११.३.२००५, रात्रि ८.२० से ९.५८)

 

४. नववर्षारंभ पर श्री सरस्वतीदेवी के एवं लेखन-पट्ट (स्लेट)पर बनाए गए सरस्वती यंत्र के पूजन का महत्त्व

‘नववर्षारंभ’ साढे तीन मुहूर्तों में से एक है । अन्य दिनों की तुलना में इस दिन ब्रह्मतत्त्व के साथ श्री सरस्वतीतत्त्व भी पृथ्वी पर ३० प्रतिशत अधिक मात्रा में विद्यमान होता है । इस शुभदिन से अनेक लोग विद्यार्जन का शुभकार्य प्रारंभ करते हैं । इसीलिए इस दिन श्री सरस्वतीदेवी एवं उनके यंत्र की पूजा एवं उपासना अवश्य की जाती है ।’ – ईश्वर (कु. मधुरा भोसले के माध्यम से, ११.३.२००५, रात्रि ८.२० से ९.५८)

 

५. नववर्षारंभ पर श्री सरस्वती के तारक रूप का एवं दशहरे पर महासरस्वती के मारक रूप के पूजन का महत्त्व

‘नववर्षारंभ तथा दशहरे के दिन सरस्वतीपूजन करें । ब्रह्मांड में नववर्षारंभ पर श्री सरस्वतीदेवी के तारक तत्त्व की तरंगें एवं दशहरे के दिन महासरस्वतीदेवी के मारक तत्त्व की तरंगें कार्यरत होती हैं ।

श्री सरस्वतीदेवी की कृपा वर्षभर प्राप्त करने हेतु, उनका आवाहन किया जाता है । सरस्वतीपूजन से जीव का ब्राह्मतेज जाग्रत होता है । ब्राह्मतेज के बल पर किया गया प्रत्येक कृत्य जीव की आध्यात्मिक उन्नति हेतु पोषक होता है । इससे जीव के लिए उचित विचार एवं उसके अनुरूप कृत्य का उत्तम समन्वय साध्य करना संभव होता है ।
दशहरे पर श्री सरस्वती के मारक तत्त्व के पूजन से जीव का क्षात्रतेज जाग्रत होता है ।’

– एक विद्वान (श्रीमती अंजली गाडगीळ के माध्यम से, १७.३.२००५, दोपहर १२.३१)

बसंत पंचमी के दिन भी सरस्वती का पूजन किया जाता है । (इसका अध्यात्मशास्त्रीय कारण जानने हेतु पढिए सनातन निर्मित लघुग्रंथ ‘सरस्वती’)

संदर्भ : सनातन निर्मित लघुग्रंथ – सरस्वती

2 thoughts on “श्री सरस्वतीदेवी की उपासना एवं सरस्वती यंत्रका कार्य”

    • नमस्कार,

      आध्यात्मिक स्तर केवल संत ही बता सकते है ।

      आध्यात्मिक स्तर से अधिक भगवान की भक्ति महत्त्वपूर्ण है । अतः साधना करके अपनी भक्ति बढाएं । साधना कैसे करें, यह जानने के लिए पढें – https://www.sanatan.org/hindi/spiritual-journey

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