उज्जैन सिंहस्थपर्व में साधना एवं गुरुकृपा के बल पर ३ साधक हुए जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्त !

सेवा के प्रति लगन रखनेवाली श्रीमती विजया बरडे एवं भावपूर्ण सेवा करनेवाले श्री. जयहिंद सुतार !

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श्रीमती विजया बरडे
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श्री. जयहिंद सुतार

सेवा की लगन, ईश्‍वर द्वारा प्रदान परिस्थिति का स्वीकार करनेवाली महाराष्ट्र के वर्धा (विदर्भ ) की श्रीमती विजया बरडेजी के साथ-साथ दृढता और लगन से परिपूर्ण गुरुसेवा करे पुणे के श्री. जयहिंद सुतारजी ने ६१ प्रतिशत आध्यात्मिक स्तर प्राप्त कर सभी के समक्ष आदर्श रखा है ।

पूज्य डॉ. चारुदत्त पिंगळेजी ने कहा, किसी भी सेवा का मनःपूर्वक स्वीकार कर, सभी सेवाआें को समदृष्टि से देखने के कारण श्रीमती बरडे की और प्रत्येक परिस्थिति को आनंदपूर्वक स्वीकारने की स्थिति में रहने के कारण श्री. सुतार जी की आध्यात्मिक उन्नति हुई है ।

समर्पित भाव से सेवा कर ६३ प्रतिशत आध्यात्मिक स्तर प्राप्त करनेवाली श्रीमती सीतादेवी नोगिया ! 

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श्रीमती सीतादेवी नोगिया

सत्कार समारोह के समय पूज्य चारुदत्त पिंगळेजी ने कहा, निरक्षर होते हुए भी मंदिरों में ग्रंथप्रदर्शनी लगाकर ग्रंथ वितरण की सेवा भावपूर्ण करनेवाली और अपने प्रारब्ध की ओर साक्षीभाव से देखनेवाली सीतादेवी के सेवाभाव के कारण उनकी प्रगति हुई है ।

इस शुभावसर पर अपना मनोगत व्यक्त करते हुए श्रीमती सीतादेवी ने कहा, सभी साधकों ने मुझे बहुत प्रेम दिया । उज्जैन सिंहस्थ, एक आश्रम ही है । मैं तो केवल मिट्टी हूं, मुझमें बहुत दोष हैं । ईश्वर ही सब कुछ जानते हैं । मैं कुछ भी नहीं जानती और मुझे कुछ आता भी नहीं । उपर्युक्त साधक जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्त हुए, ऐसा पूज्य (कु.) स्वाती खाडयेजी ने घोषित किया । पूज्य डॉ. चारुदत्त पिंगळेजी के करकमलों द्वारा भगवान श्रीकृष्ण की प्रतिमा देकर उनका सत्कार किया गया ।

६० प्रतिशत आध्यात्मिक स्तर प्राप्त करने का अर्थ क्या है ?

यह स्पष्ट करते हुए पूज्य डॉ. पिंगळेजी ने बताया, सामान्य व्यक्ति का आध्यात्मिक स्तर २० प्रतिशत होता है । ईश्‍वर के प्रति भाव एवं श्रद्धा रखकर साधकों ने ६१ प्रतिशत स्तर प्राप्त किया है । ध्यान, कर्मयोग, ऐसे विविध मार्गों से आध्यात्मिक प्रगति होती है । इन्होंने अब स्वर्ग के भी आगे महर्लोक में स्थान प्राप्त किया है । निष्ठा रखकर कार्य करने से साधना होती है एवं महर्लोक में स्थान मिलता है । हम अपने जीवन में मोक्षप्राप्ति हेतु अर्थात ईश्‍वरप्राप्ति हेतु साधना व धर्मपालन करने से हम जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्त हो जाते हैं ।

स्रोत : पाक्षिक सनातन प्रभात 

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