पाश्‍चात्त्य संस्कृति अपनाने से व्यसनाधीन बने भारतीय !

‘पाश्‍चात्त्य संस्कृति अपनाने से मनुष्य जीवन व्यसनों के अधीन हो रहा है, साथ ही उससे मनुष्य का आयुकाल भी घटता जा रहा है । हमारे पाठकों के लिए मासिक ‘वज्रधारी’ में ’व्यसनाधीनता के कारण होनेवाले परिणाम और दिखनेवाले लक्षण’के संदर्भ में प्रकाशित जानकारी दे रहे हैं ।

 

१. व्यक्ति को व्यसन के दुष्परिणाम स्वयंसहित परिवार और समाज को भुगतने पडना

किसी भी व्यसन के २ प्रकार के दुष्परिणाम होते हैं ।

१. तात्कालीन एवं दीर्घकालीन

तात्कालीन परिणाम व्यसन के आरंभ से दिखाई देते हैं; परंतु जब व्यसन नित्य का बन जाता है, तब उसके दीर्घकालीन परिणाम दिखाई देने लगते हैं । उसमें व्यसनाधीन व्यक्ति का शरीर, मन, परिवार, समाज और बच्चे इन सभी को इसका दंश झेलना पडता है ।

 

२. व्यसनाधीन व्यक्ति के मानसिक लक्षण

व्यसनाधीन व्यक्ति का मन आरंभ से बलहीन होता है; इसलिए वह समस्या का वैधानिक समाधान न ढूंढने की अपेक्षा व्यसन को चुनता है । उससे व्यसनाधीन बननेपर उसके मानसिक लक्षण स्पष्टरूप से दिखाई लगने लगते हैं ।

अ. व्यसन का आकर्षण बढने लगता है ।

आ. अनियंत्रितरूप से व्यसन किया जाता है ।

इ. केवल व्यसन का ही विचार होता है ।

ई. अनिष्ट परिणाम दिखाई देते हुए भी व्यसन को चालू रखा जाता है ।

उ. ‘मैं व्यसनाधीन बन चुका हूं’, इस वास्तविकता को ही अस्वीकार किया जाता है ।

इस नकारात्मक भावनाओं के कारण मनुष्य अधिकाधिक व्यसनाधीन होता है और उससे बाहर निकालने की उसकी इच्छा ही समाप्त हो जाती है । उसके पश्‍चात स्वास्थ्यसंबंधी समस्याएं उत्पन्न होने लगती हैं ।

 

३. शारीरिक समस्याएं

शरीरांतर्गत विविध अंग व्यसनों के कारण प्रभावित होते हैं । उससे विविध विकार उत्पन्न होने लगते हैं । व्यसन के कारण शरीर खोखला बन चुका होता है । रोगप्रतिकारक शक्ति अल्प हो जाती है । उससे व्याधियों का सामना करना कठिन बन जाता है । जठर, अन्ननलिका, मुख, यकृत और आंत्रों के रोग उत्पन्न होते हैं ।

 

४. मानसिक समस्याएं

निराश, अतिचिंता, साथ के लोगों में घुल-मिल जाना संभव न होना, निरंतर एक ही बात को करने की प्रवृत्ति, अपराधीपन की भावना, मस्तिष्कपर नियंत्रण तथा शरीर-मन के समन्वय का अभाव, स्मृति-चिंतन क्षमता अल्प होना, अतिसंवेदनशीलता अथवा असंवेदनशीलता उत्पन्न होना, निद्राविकार, तनाव व्यवस्थापन का अभाव, झटका आना, देखे हुए अथवा न देखे हुए काल्पनिक बातों के प्रति भय, स्वयं द्वारा अथवा दूसरों से अधिक अपेक्षा करना और अकार्यक्षमता इत्यादि ।

 

५. सामाजिक समस्याएं

व्यसनी व्यक्ति तथा अपने परिवार और समाज में अपना स्थान-सम्मान गंवाता है । उससे उसे सामाजिक संपर्क अच्छा नहीं लगता । अकेलापन और समाज से विभाजित होना उसे अधिक तनावपूर्ण बनाता है । इसके कारण व्यसनाधीन व्यक्ति के परिवार को समाज की सहानुभूति का धनी बनना पडता है ।

 

६. शरीरपर होनेवाले परिणाम

अ. दुर्घटनाओं की संख्या बढना

आ. व्यसन न करनेपर शरीर कांपने लगना

इ. बहुत पसीना आना

ई. नाडी की गति बढना

जैसे लक्षण दिखाई देने लगते हैं । उससे केवल जीवित रहने के लिए भी व्यसन आवश्यक लगने लगता है । इन्हीं लक्षणों को विड्रोल्स अथवा व्यसनपर निर्भरता दिखानेवाले लक्षण कहा जाता है ।

 

७. मनपर होनेवाले परिणाम

अ. व्यसनी व्यक्ति समाज, मित्र और परिवार से दूर होता है ।

आ. मनपर नियंत्रण नहीं रहने से असीमित प्रतिक्रियाएं देना आरंभ होता है ।

इ. किसी भी बात में आनंद लेने की प्रवृत्ति नष्ट होती है ।

ई. जीने की इच्छा नहीं रहती ।

उ. निद्रानाश, अतिचिंता और अकस्मात आक्रमण करने जैसी प्रतिक्रिया दी जाना

ऊ. मन में आत्महत्या के विचार प्रबल होना

सामान्य लोगों को इन लक्षणों से ठीक होना तुलनात्मक दृष्टि से सरल होता है; परंतु व्यसनाधीन व्यक्ति में तनाव को सहन करने की कुल क्षमता ही घटी हुई होती है; जिससे कि उसे इस दुष्टचक्र से बाहर निकाल पाना कठिन हो जाता है ।

 

८. व्यसनाधीन व्यक्ति को होनेवाले विकार

दुर्बलता, जीवनसत्त्वों के अभाव के कारण उत्पन्न व्याधियां, मुख से लेकर शरीर के अंतर्गत उत्पन्न होनेवाले अलग-अलग कैन्सर, यकृत के विकार, दृष्टिदोष और कुपोषण इत्यादि ।’

संदर्भ : मासिक ‘वज्रधारी’ (९.७.२०१५)

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