शिवमोग्गा (कर्नाटक) के प्रसिद्ध शिल्पी श्री. काशीनाथ के द्वारा रामनाथी (गोवा) के सनातन आश्रम का अवलोकन

श्री. काशीनाथ के. (मध्य में) को ध्यानमंदिर में स्थित देवी-देवताओं की मूर्तियां एवं प्रतिमाओं के संदर्भ में जानकारी देते हुए श्री. अभिषेक पै (दाहिनी ओर) और साथ में साधक श्री. प्रभाकर पडियार

रामनाथी (गोवा) : शिवमोग्गा (कर्नाटक) के प्रसिद्ध शिल्पी श्री. काशीनाथ के. (आय ७५ वर्ष) ने १३ दिसंबर को यहां के सनातन आश्रम का अवलोकन किया । इस अवसरपर सनातन संस्था के साधक श्री. अभिषेक पै ने उन्हें आश्रम में चल रहे राष्ट्र एवं धर्म का कार्य और आध्यात्मिक शोधकार्य की जानकारी दी ।

 

श्री. काशीनाथ के. को आश्रम के अवलोकन के
समय प्रतीत विशेषतापूर्ण सूत्र तथा उनके द्वारा व्यक्त गौरवोद्गार

१. आश्रम के अवलोकन के समय स्वागतकक्ष के पास स्थित संत भक्तराज महाराज (प.पू. बाबा) के छायाचित्र का दर्शन करते समय श्री. अभिषेक पै ने श्री. काशीनाथ के. को प.पू. बाबा के कार्य की जानकारी दी, तब उसे सुनकर उन्होंने कहा, ‘‘प.पू. बाबा तो तपस्वी ही हैं । उनके संकल्प से ही संस्था का कार्य चल रहा है ।’’

२. श्री. काशीनाथ के. ने आश्रम में की जानेवाली विविध सेवाएं और आश्रम की स्वच्छता का नियोजन जानकर लिया । उसे सुनकर आनंदित होकर उन्होंने कहा कि आश्रम का कार्य अनुशासित एवं अच्छे प्रकार से चल रहा है । यहां यह अत्यावश्यक है कि सभी को सभी प्रकार की सेवाएं करनी होंगी; क्योंकि किसी ने एक ही सेवा की, तो उससे ‘मैं यह सेवा अच्छी करता हूं’, यह अहं बढ सकता है । सभी प्रकार की सेवाएं करने से अहं न्यून होकर चित्तशुद्धि होगी ।

३. उन्हें आश्रम की सभी व्यवस्था अच्छी लगी । आश्रम में अनुशासन देखकर उन्होंने कहा, ‘‘गुरुजी (परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी) आपसे सेवाएं करवाकर ले रहे हैं; इसलिए सभी अच्छे प्रकार से चल रहा है ।’’

४. भारतीय संस्कृति का महत्त्व विशद करते हुए श्री. काशीनाथ के ने कहा, ‘‘पाश्‍चात्त्य लोग भारत क्यों आते हैं ?; क्योंकि वहां के लोगों को कोई दिशा नहीं होती । वहां के लोगों को ईश्‍वर क्या है ?, यह ज्ञात नहीं होता । उसकी खोज में वे भारत आते हैं । उन्हों यहां की संस्कृति और हिन्दू धर्म के अनुसार आचरण करने से ईश्‍वर की अनुभूति होती है । इसलिए वे हमारी संस्कृति आत्मसात करते हैं । विदेशी लोग भारत आनेपर वे यहां की इमारतें आदि बातों में भारत द्वारा की गई प्रगति को नहीं देखते, अपितु वे भारत के प्राचीन मंदिर, शिल्पकला आदि संस्कृति देखने आते हैं । भारत में स्थित मूर्तियां और विदेश की मूर्तियों में भाव कैसा होता है, इसका वे अध्ययन करते हैं । इसे जानकर लेनेपर वे भारत की कला (संस्कृति) कैसे श्रेष्ठ है ?, इस विषयपर ग्रंथ भी लिखते हैं । भारत में जो कुछ भी संस्कृति और कला है, उसे हमारे ऋषि-मुनियों ने प्रमाणित किया है; परंतु उसकी प्रसिद्धि विदेशी लेखकों को मिलती है; क्योंकि भारत के लोग विदेशी लोग जो बताते हैं, उसका तुरंत स्वीकार करते हैं ।’’

 

श्री. काशीनाथ के. का परिचय

शिवमोग्गा के श्री. काशीनाथ के. ने पंचशिल्पकला में महारथ प्राप्त की है । वर्ष २००४ में उन्हें ‘अमरशिल्पी जकनाचारी’ पुरस्कार से सम्मानित किया गया । वर्ष २०१४ में कर्नाटक राज्य संस्कृति विभाग शिल्पकला एकॅडमी ने उन्हें पुरस्कार प्रदान कर सम्मानित किया । उन्होंने कर्नाटक के मुरडेश्‍वर में १३५ फीट ऊंचाईवाली भगवान शिवजी की मूर्ति बनाई है । यह मूर्ति भारत की सबसे ऊंची मूर्तियों में से एक है । इसके अतिरिक्त उन्होंने देशभर के विविध स्थानोंपर ५० से ६० फीट ऊंचाईवाली हनुमानजी, शिवजी, दुर्गादेवी आदि देवी-देवताओं की मूर्तियां बनाई हैं । उनके पूर्वजों ने भी शिल्प बनाने का कार्य किया था । इस कार्य के लिए कर्नाटक के राजे मुमुडी कृष्णराज वडेयर ने उनके पूर्वजों को सम्मानित किया था ।

 

श्री. काशीनाथ के. के संदर्भ में साधक श्री. अभिषेक पै को प्रतीत सूत्र

१. श्री. काशीनाथ के. में अल्प अहं है, ऐसा प्रतीत हुआ; क्योंकि जब समाज की कोई बडी व्यक्ति अपने कार्य के संदर्भ में बताती है, तब उससे ‘मैं कितना बडा कार्य कर रहा हूं’, यह उन्हें बताना होता है । उससे उनकी बातों में अहं प्रतीत होता है; परंतु जब श्री. काशीनाथ के. अपने कार्य के संदर्भ में बता रहे थे, तब उनकी बातों में कहीं भी कर्तापन प्रतीत नहीं हो रहा था ।

२. उनमें अपने गुरुदेव के प्रति बहुत श्रद्धा है; क्योंकि वे अपने गुरुदेवजी को निरंतर आर्तता के साथ पुकारते रहते हैं ।

स्रोत : दैनिक सनातन प्रभात