श्रीरामनवमी उत्सव मनानेकी पद्धति

सारिणी

१. श्रीरामनवमी उत्सव
२. श्रीरामनवमीका आध्यात्मिक महत्त्व
३. श्रीरामनवमी मनानेकी पद्धति
४. श्रीरामकी प्रतिमाकी पूजाविधि एवं उपासना-पद्धति
५. रामायण
६. रामराज्य
७. विशिष्ट तिथिपर विशिष्ट देवताका उत्सव मनानेका कारण क्या है ?


 

१. श्रीरामनवमी उत्सव

त्रेतायुगमें श्रीविष्णुके सातवें अवतार श्रीरामजीने पुष्य नक्षत्रपर, मध्याह्न कालमें अयोध्यामें जन्म लिया । वह दिन था, चैत्र शुक्ल नवमी । तबसे श्रीरामजीके जन्मप्रीत्यर्थ श्रीरामनवमी मनाई जाती है । सामान्यतः श्रीरामनवमीका उत्सव विभिन्न स्थानोंपर विविध प्रकारसे मनाया जाता है । कहीं सार्वजनिक रूपमें, कहीं व्यक्तिगत स्तरपर, तो कहीं पारिवारिक रूपमें इसे मनाते हैं ।

अनेक राममंदिरोंमें चैत्र शुक्ल प्रतिपदासे लेकर नौ दिनतक यह उत्सव मनाया जाता है । रामायणके पारायण, कथाकीर्तन तथा राममूर्तिको विविध शृंगार कर, यह उत्सव मनाया जाता है । नवमीकी दोपहरको रामजन्मका कीर्तन होता है । मध्यान्हकालमें, कुंची (छोटे बच्चेके सिरपर बांधा जानेवाला एक वस्त्र । यह वस्त्र पीठतक होता है ।) धारण किया हुआ एक नारियल पालनेमें रखकर उस पालनेको हिलाते हैं व भक्तगण उसपर गुलाल तथा फूलोंका वर्षाव करते हैं । कुछ स्थानोंपर पालनेमें नारियलकी अपेक्षा श्रीरामकी मूर्ति रखी जाती है । इस प्रसंगपर श्रीरामजन्मके गीत गाए जाते हैं । उसके उपरांत प्रभु श्रीरामके मूर्तिकी पूजा करते हैं व प्रसादके रूपमें सोंठ देते हैं । कुछ स्थानोंपर महाप्रसाद भी देते हैं । इस दिन प्रभु श्रीरामका व्रत करनेसे सर्व व्रतोंका फल प्राप्त होता है तथा सर्व पापोंका क्षालन होकर अंतमें उत्तम लोककी प्राप्ति होती है ।

 

२. श्रीरामनवमीका आध्यात्मिक महत्त्व

किसी भी देवता एवं अवतारों की जयंतीपर उनका तत्त्व पृथ्वीपर अधिक मात्रामें कार्यरत होता है । श्रीरामनवमीको श्रीरामतत्त्व अन्य दिनोंकी अपेक्षा १००० गुना कार्यरत होता है । श्रीराम नवमीपर `श्रीराम जय राम जय जय राम ।’ नामजप एवं श्रीरामकी भावपूर्ण उपासनासे श्रीरामतत्त्वका अधिकाधिक लाभ होता है ।

 

३. श्रीरामनवमी मनानेकी पद्धति

श्रीरामतत्त्वका अधिकाधिक लाभ प्राप्त करनेके लिए उपासनामें श्रीरामजीकी प्रतिमाका पूजन, स्तोत्रपाठ एवं नामजप करें । श्रीरामजीकी प्रतिमाका पूजन षोडशोपचार पद्धतिसे करें । षोडशोपचार पूजन संभव न हो, तो पंचोपचार पद्धतिसे पूजन करें ।

 

४. श्रीरामकी प्रतिमाकी पूजाविधि एवं उपासना-पद्धति

श्रीरामनवमीकी पूजाके लिए नित्य पूजाकी सामग्रीके साथ सौंठका बनाया विशेष प्रसाद होता है । सौंठ अर्थात सूखे अदरकका चूर्ण एवं पीसी हुई चीनी तथा सूखे नारियलका चूरा मिलाकर उस मिश्रणको प्रसादके रूपमें निवेदित किया जाता है ।

पूजाविधी आरंभ करते समय प्रथम आचमन करें । अब प्राणायाम करें । देशकालकथन कर पूजाके लिए संकल्प करें । अब चंदनका तिलक करें । अब अक्षत समर्पित करें । तदुपरांत फूल एवं तुलसी अर्पित करें । अब पुष्पमाला अर्पित करें । अब अगरबत्ती दिखाएं । अब दीप दिखाएं । अब नैवेद्य समर्पित करें । इस प्रकार पूजा करनेके उपरांत आरती, मंत्रपुष्प, परिक्रमा एवं नमस्कार करें । अनेक राममंदिरोंमें चैत्र शुक्ल प्रतिपदासे लेकर नौ दिनतक यह उत्सव चलता है । रामायणके पारायण, कथा-कीर्तन तथा राममूर्तिका विविध शृंगार कर, यह उत्सव मनाया जाता है । यह हुआ सार्वजनिक उत्सव । कुछ स्थानोंपर कुछ परिवारोंके सदस्य एकत्रित होकर यह उत्सव मनाते हैं । कुछ लोग नौ दिन उपवास कर इसे व्यक्तिगत स्तरपर व्रतके रूपमें भी मनाते हैं । रामका स्मरण, भजन एवं पूजन कर नौंवे दिन श्रीरामजन्मोत्सव मनाते हैं । अगले दिन उद्यापन कर व्रतकी समाप्ति करते हैं । चैत्र शुक्ल नवमीके दिन मध्याह्न कालमें श्रीरामजीके जन्मका कीर्तन होता है। जहां श्रीरामजीकी मूर्ति उपलब्ध होती है, वहां मूर्तिको कंटोप पहनाकर उसे हिंडोलेमें रखा जाता है । छोटे बच्चेके सिरपर बांधे जानेवाले वस्त्रको कंटोप कहते हैं । यह वस्त्र पीठतक होता है । तदुपरांत भक्तगण उसपर गुलाल तथा पुष्पवर्षाव करते हैं । इस अवसरपर श्रीरामजीके जन्मके गीत गाए जाते हैं । कुछ स्थानोंपर रामलल्लाकी पालकी भी निकाली जाती है । तदुपरांत श्रीरामजीका स्तोत्रपाठ एवं नामजप किया जाता है । उसके उपरांत महाआरती एवं महाप्रसाद होता है । इस प्रकार वर्षारंभमेंही व्यक्तिगत, पारिवारिक तथा सामाजिक क्षमता बढाने हेतु यह उत्सव पारंपरिक पद्धतिसे मनाया जाता है । हमें इस बातको ध्यानमें रखना आवश्यक है, कि देवता तत्त्वरूपमें होते हैं ।

अ. प्रभु श्रीरामकी उपासनाके कुछ महत्त्‍वपूर्ण चरण

उपासनाकी कृति कृति कैसे करें ?
१. श्रीराम पूजनसे पूर्व उपासक स्‍वयंको
कौनसा तिलक कैसे लगाए ?
विष्‍णुसमान खडी दो रेखाओं का अथवा भरा
हुआ खडा तिलक मध्‍यमा से लगाए ।
२. श्रीरामको चंदन किस उंगलीसे लगाए ? अनामिकासे
३. फूल चढाना
अ. फूल कौनसे चढाएं ? जाही
आ. संख्‍या कितनी हो ? चार अथवा चारगुना
इ. फूल चढानेकी पद्धति क्‍या हो ? फूलोंका डंठल देवताकी ओर कर चढाएं।
ई. फूल कौनसे आकारमें चढाएं? लंबे गोलाकार(भरा हुआ अथवा खोखला)
४. उदबत्तीसे आरती उतारना
अ. तारक उपासनाके लिए
किस गंधकी उदबत्ती ?
चंदन, केवडा, चंपा, चमेली,
जाही एवं अंबर
आ. मारक उपासनाके लिए किस गंधकी उदबत्ती ? हीना एवं दरबार
इ. संख्‍या कितनी हो ? दो
ई. उतारनेकी पद्धति क्‍या हो ? दाहिने हाथकी तर्जनी व अंगूठेमें पकडकर
घडीकी सुईयोंकी दिशामें पूर्ण गोलाकार
पद्धतिसे तीन बार घुमाकर उतारें।
५. इत्र किस गंधका अर्पण करें ? जाही
६. श्रीरामकी कितनी परिक्रमा करें ? कमसे कम तीन अथवा तीनगुना

 

५. रामायण

`समस्य अयनं रामायणम् ।’ अयनका अर्थ है जाना, गति, मार्ग इत्यादि । जो परब्रह्म परमात्मारूप श्रीरामकी ओर ले जाती है, उसतक पहुंचनेके लिए जो प्रोत्साहित करती है अर्थात् गति देती है, जीवनका सच्चा मार्ग दर्शाती है, वही `रामायण’ है ।

अ. कैकेयीने एक वरसे रामके लिए चौदह
वर्षका वनवास व दूसरे वरसे भरतके लिए राज्य क्यों मांगा ?

भावार्थ : श्रावणकुमारके दादा धौम्य ऋषि थे व उसके माता-पिता रत्नावली व रत्नऋषि थे । रत्नऋषि नंदिग्रामके राजा अश्वपतिके राजपुरोहित थे । अश्वपति राजाकी कन्याका नाम कैकेयी था । रत्नऋषिने कैकेयीको सभी शास्त्र सिखाए और यह बताया कि यदि दशरथकी संतान हुई, तो वह संतान राजगद्दीपर नहीं बैठ पाएगी अथवा दशरथकी मृत्युके पश्चात् यदि चौदह वर्षके दौरान राजसिंहासनपर कोई संतान बैठ भी गई, तो रघुवंश नष्ट हो जाएगा । ऐसी होनीको टालने हेतु, आगे चलकर वसिष्ठ ऋषिने कैकेयीको दशरथसे दो वर मांगनेके लिए कहा । उनमेंसे एक वरसे उन्होंने रामको चौदह वर्षतक ही वनवास भेजा व दूसरे वरसे भरतको राज्य देनेके लिए कहा । उन्हें ज्ञात था कि रामके रहते भरत राजा बनना स्वीकार नहीं करेंगे यानी राजसिंहासनपर नहीं बैठेंगे । वसिष्ठ ऋषिके कहनेपर ही भरतने सिंहासनपर रामकी प्रतिमाकी अपेक्षा उनकी चरणपादुका स्थापित की । यदि प्रतिमा स्थापित की होती, तो शब्द, स्पर्श, रूप, रस व गंध एकत्रित होनेके नियमसे जो परिणाम रामके सिंहासनपर बैठनेसे होता, वही उनकी प्रतिमा स्थापित करनेसे भी होता ।

 

६. रामराज्य

ऐसा नहीं कि, केवल श्रीराम ही सात्त्विक थे, अपितु प्रजा भी सात्त्विक थी; इसीलिए रामराज्यमें श्रीरामके दरबारमें एक भी शिकायत नहीं आई । पंचज्ञानेंद्रिय, पंचकर्मेंद्रिय, मन, चित्त, बुद्धि व अहंकारपर रामका (आत्मारामका) राज्य होना ही खरा रामराज्य है ।

 

७. विशिष्ट तिथिपर विशिष्ट देवताका उत्सव मनानेका कारण क्या है ?

किसी एक विशिष्ट तिथिपर विशिष्ट देवताका तत्त्व संपूर्ण ब्रह्मांडमें अधिक मात्रामें कार्यरत होता है । जिस कारण देवताका चैतन्य तथा सात्त्विकता अधिक मात्रामें प्रक्षेपित होती है । विशिष्ट तिथिपर विशिष्ट देवताका त्योहार, व्रत तथा उत्सव मनानेसे साधना करनेवाले जीवको इस तत्त्वका लाभ अधिक होता है । देवताओंकी इन तिथियोंपर ब्रह्मांडमें सात्विकता एवं चैतन्य प्रक्षेपित होनेसे जो कार्य होता है वह इस प्रकार है…

अ. ब्रह्मांडकी शुद्धि होना

आ. अनिष्ट शक्तियोंका प्रभाव अल्प होना

इ. सभी जीवोंको चैतन्य एवं सात्त्विकता प्राप्त होना

विशिष्ट तिथिपर विशिष्ट देवताका उत्सव मनानेके पीछे यही महत्त्वपूर्ण कारण है । श्रीरामनवमीके दिन भी ब्रह्मांडमें रामतत्त्वकी तरंगें अन्य दिनोंकी अपेक्षा १००० गुना अधिक कार्यरत होती हैं । इस दिन सभी जीवोंको श्रीरामतत्त्वका अत्यधिक मात्रामें लाभ होता है । इसलिए धर्मशास्त्रके अनुसार श्रीरामतत्त्वका अत्यधिक लाभ प्राप्त करने हेतु समझ लेते हैं ।

संदर्भ : सनातन-निर्मित ग्रंथ ‘श्रीविष्णु, श्रीराम एवं श्रीकृष्ण’