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सारिणी
१. राम
यह नाम रामजन्मके पूर्व भी प्रचलित था । रम् -रमयते अर्थात (आनंदमें) रम जाना; इससे‘राम’ शब्द बना है । राम अर्थात वे जो स्वयं आनंदमें रमण करते हैं, तथा दूसरोंको भी आनंदमें रमाते हैं ।
२. रामचंद्र
रामका नाम मूलतः ‘राम’ ही है । वे सूर्यवंशी थे । उनका जन्म मध्याह्न १२ बजे हुआ; तब उन्हें सूर्यसे संबंधित कोई नाम जैसे ‘रामभानु’ नहीं दिया गया । आगे, चंद्रमाके लिए हठ करनेके प्रसंगसे वे ‘रामचंद्र’ कहलाए ।
३. श्रीराम
मनुष्य षड्विकारोंसे युक्त है तथा ईश्वर षड्गुणोंसे । ‘श्री’, भगवानके षड्गुणोंमेंसे एक है । भगवानके षड्गुण इसप्रकार हैं – यश, श्री, औदार्य, वैराग्य, ज्ञान एवं ऐश्वर्य । श्री अर्थात शक्ति, सौंदर्य, सद्गुण इत्यादि, लंका विजयके पश्चात्, राम जब सीतासहित अयोध्यानगरी लौटे, तब सर्व अयोध्यावासी उन्हें ‘श्रीराम’ के नामसे संबोधित करने लगे । ‘श्री’ ईश्वरका विशेषण है । जब रामने संपूर्ण जगतको अपने ईश्वरीय गुणोंसे परिचित करवाया, तब उन्हें श्रीरामके नामसे संबोधित किया जाने लगा ।
४. प्रभु श्रीरामजीकी विशेषताएं एवं तदनुसार उनका कार्य
प्रभु श्रीरामजी एकवचनी, एकबाणी तथा एकपत्नी थे ।
४ अ. एकवचनी
श्रीराम एकवचनी थे, अर्थात् वे कोई बात एक बार भी कह दें, वह सत्य ही होती थी । उन्हें किसी भी बातपर बल देकर तीन बार बोलनेकी आवश्यकता नहीं होती थी । श्रीरामजीसे कोई नहीं पूछता था, ‘क्या यह सत्य है ?’ संस्कृत व्याकरणमें तीन वचन होते हैं – एकवचन, द्विवचन एवं बहुवचन । राम ‘एकवचनी’ हैं । इसका अर्थ यह कि, रामसे एकरूप होना अर्थात तीनसे एककी ओर जाना । अनेकसे एककी ओर एवं एकसे शून्यकी ओर जाना, इस प्रकार अध्यात्ममें प्रगति होती है । यहांपर शून्य अर्थात पूर्णावतार कृष्ण ।
४ आ. एकबाणी
प्रभु श्रीरामका केवल एकही बाण लक्ष्य भेदनेमें सक्षम था; उन्हें दूसरा बाण चलानेकी आवश्यकता ही नहीं होती थी ।
४ इ. एकपत्नी
राम एकपत्नीव्रती थे । सीताका त्याग करनेके उपरांत श्रीरामने विरक्त जीवन व्यतीत किया । उस कालमें प्रथाके अनुसार एक राजाकी अनेक रानियां होती थीं । इस पृष्ठभूमिसे रामके एकपत्नीव्रती होनेका तीव्रतासे भान होता है । प्रभु श्रीरामजीकी अन्य एक विशेषता यह थी, की वे आदर्श राजा थे ।
५. आदर्श राजा
वनवाससे लौटनेके उपरांत राज्याभिषेक हो जानेपर प्रभु श्रीरामचंद्रद्वारा अपना सर्व राज्य श्रीगुरु वसिष्ठके चरणोंमें अर्पण किए जानेका उल्लेख है । श्रीरामजी राजधर्मका पालन करनेमें तत्पर थे । सीताके प्रति प्रजाद्वारा शंका व्यक्त किए जानेके पश्चात् अपने व्यक्तिगत नातेका विचार न कर, राजधर्म पालनके लिए उन्होंने अपनी धर्मपत्नीका त्याग कर दिया । श्रीरामजीने धर्मकी सर्व मर्यादाओंका पालन किया । इसी कारण उन्हें ‘मर्यादा-पुरुषोत्तम’ कहते हैं । श्रीरामने प्रजाको भी धर्म सिखाया । प्रभु श्रीराम तथा उनकी प्रजा एवं वर्तमानके राज्यकर्ता तथा प्रजामें बहुत अंतर है । जिस प्रकार श्रीराम एवं उनके भक्त पूर्णरूपसे आदर्श थे, उसी प्रकार अयोध्याकी प्रजाभी उतनीही आदर्श थी । लोगोंके मनमें अपने राजा श्रीरामके प्रति अत्यंत भाव था । लोग प्रभु श्रीरामजीकी अपेक्षाके अनुसार साधना करते थे । वे एक-दूसरेकी स्थितिको समझ लेते थे । इस कारण वे रामराज्यमें रहनेके पात्र बने । रामराज्यका जीवन आदर्श माना गया है ।
संदर्भ : सनातन-निर्मित ग्रंथ ‘त्यौहार, धार्मिक उत्सव एवं व्रत’

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