रामभक्तशिरोमणी भरत की आध्यात्मिक गुणविशेषताएं !

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‘मार्च २०२० में कोरोना महामारी के काल में भारत में यातायात बंदी के समय दूरदर्शन पर रामायण एवं महाभारत धारावाहिक पुन: प्रसारित हुआ था । इस भीषण आपातकाल में भी प्रभु श्रीराम एवं भगवान श्रीकृष्ण की एवं उनके भक्तों के चरित्र के प्रसंग एवं उनकी लीलाएं देखकर अनेकों को मन:शांति मिली और कोरोना का सामना करने के लिए आध्यात्मिक बल भी मिला । इसलिए हिन्दू धर्म के ग्रंथों में अध्यात्मशास्त्र होने से वे कभी भी कालबाह्य नहीं होते । इसलिए उनका पुन:पुन: पारायण करने से आत्मानंद एवं आत्मशांति की आज भी अनुभूति होती है । प्रभु श्रीराम भगवान विष्णु के सातवें अवतार थे । कौसल्या के प्रभु श्रीराम, कैकयी के भरत और सुमित्रा के लक्ष्मण एवं शत्रुघ्न, ये चार भाई राजा दशरथ के सुपुत्र थे । ‘भरत’ प्रभु श्रीराम के अनुज थे । प्रभु श्रीराम के अनेक भक्त होकर गए । इस लेख में हम रामभक्त भरत की आध्यात्मिक गुणविशेषताएं देखेंगे और भरत समान असीम रामभक्ति को अपने हृदय में निर्माण होने के लिए भगवान के श्रीचरणों में प्रार्थना करेंगे ।

 

१. पराकोटि का वैराग्य

कैकयी ने दशरथ राजा से दो वचन मांगे थे । पहला वचन अर्थात श्रीरामजी के बजाय भरत का राज्याभिषेक करना और दूसरा वचन था श्रीराम को १४ वर्षाें के वनवास हेतु भेजना । आजकल राजनेता राज्यपद पाने के लिए किसी भी स्तर तक गिर सकते हैं । यहां तो भरत को बिना मांगे ही अयोध्या का राज्यपद प्राप्त हो गया था । वह अयोध्या का एकछत्र सम्राट हो सकता था; परंतु उसने राज्यपद का स्वीकार नहीं किया । ‘राज्यपद संभालने के लिए वह सर्वदृष्टि से सक्षम होते हुए भी उसका मोह न होना’, यह पराकोटि के वैराग्य का लक्षण है । ऐसा वैराग्य देवताओं के पास भी नहीं होता । ‘इंद्रदेव के मन में इंद्रपद के प्रति कितना मोह और लालसा होती है’, यह हम सभी को ज्ञात है । इसलिए ‘राज्यपद नकारनेवाले भरत का आध्यात्मिक अधिकार कितना होगा !’, इसका हम अनुमान लगा सकते हैं ।

 

२. स्वयं को प्रभु श्रीराम का दास कहलवाना

कु. मधुरा भोसले

‘भरत’ यद्यपि रघुवंश के राजपुत्र और प्रभु श्रीराम के अनुज थे, तब भी वे स्वयं को ‘मैं प्रभु श्रीराम का तुच्छ दास हूं’, ऐसे संबोधित करते थे; कारण यह कि वे प्रभु श्रीराम को ज्येष्ठ भ्राता की अपेक्षा भगवान ही समझते थे । ‘भगवान मेरे स्वामी हैं और उनकी चरणसेवा करनेवाला मैं सामान्य दास हूं’, ऐसा भाव भरत के मन में प्रभु श्रीराम के प्रति था । इससे भरत की पराकोटि की दास्यभक्ति की साक्ष्य हमें मिलती है । इस दास्यभक्ति के कारण ही उन्होंने चित्रकूट जाकर प्रभु श्रीराम से पुन: अयोध्या आकर राज्यकारभार संभालने के लिए विनती का प्रयत्न किया । जब प्रभु श्रीराम के वचन देने पर कि ‘मैं १४ वर्षाें का वनवास पूर्ण होने के पश्चात अयोध्या आकर राज्यपद स्वीकारूंगा !’ तब भरत बोले कि प्रभु की अनुपस्थिति में वे प्रभु के स्थान पर उनकी चरणपादुकाओं को सिंहासन पर स्थापित कर, उनका दास बनकर राज्यकारभार चलाएंगे ! उनकी दास्यभक्ति के आगे और प्रेमभरे हठ के सामने प्रभु श्रीराम ने अपनी हार स्वीकार कर, अपनी पादुकाएं भरत को दीं । तदुपरांत भरत ने श्रीराम की पादुकाओं को अत्यंत कृतज्ञताभाव से उठाकर अपने मस्तक पर धारण किया और चित्रकूट से चलकर अयोध्या आए और उन्होंने राज्यसिंहासन पर प्रभु की चरणपादुकाओं की विधिवत स्थापना की । भरत के इस निर्णय से उनके अंत:करण में प्रभु श्रीराम के प्रति ओतप्रोत भरा निस्सीम आदरभाव और स्वामीभक्ति दिखाई देती है । हम ‘दास्यभक्ति’ यह विषय सुनते हैं; परंतु भरत ने अपनी कृति, विचार एवं वृत्ति से दास्यभक्ति का साक्षात उदाहरण सबके समक्ष प्रस्तुत किया है ।

 

३. हिन्दू धर्मशास्त्र का कठोर पालन करना

चित्रकूट पहुंचने के उपरांत प्रभु श्रीराम, लक्ष्मण एवं सीतामाता को राजा दशरथ के देहत्याग की वार्ता ज्ञात हुई । वे शोकाकुल हो गए । कुलगुरु वसिष्ठ ऋषि के बताएनुसार राम, लक्ष्मण, भरत एवं शत्रुघ्न ने मंदाकिनी नदी में दशरथ राजा की आत्मा का शांति के लिए तर्पणविधि की । उसी अनुसार प्रभु श्रीराम की ओर से अयोध्या का राज्य संभालते हुए भरत ने कडे ब्रह्मचर्य का पालन होने हेतु तपस्वी वेश धारण कर राजमहाल का और राजसी सुखों का त्याग किया और ‘नंदीग्राम’ नामक स्थान पर एक कुटी बनाकर तपस्वी जीवनयापन करने लगे । उन्होंने १४ वर्ष तपस्वी जीवन व्यतीत कर, एक आदर्श राजा के सर्व कर्तव्य निभाए । उन्होंने खरे अर्थ में ‘धर्म, अर्थ, काम एवं मोक्ष’ धर्म के इन चार पुरुषार्थाें के अनुसार शुद्ध आचरण एवं कठोर धर्माचरण किया । इसलिए भरत भी राजा जनक समान राजर्षि ही थे ।

 

४. प्रभु श्रीराम की आज्ञा का यथावत पालन कर आदर्श राज्य करना

जब प्रभु श्रीराम ने भरत से कहा कि वह १४ वर्ष राज्य करे, तब भरत उनसे बोला, ‘‘मैं आयु, ज्ञान एवं अनुभव में छोटा हूं । मैं इतना बढा दायित्व कैसे निभा पाऊंगा ?’’ तब प्रभु श्रीराम बोले, ‘‘तुम राजगुरु एवं कुलगुरु वसिष्ठ ऋषि, सुमंत जैसे मंत्री एवं पितृतुल्य राजर्षि जनकराजा का मार्गदर्शन लेकर राज्य कार्यभार करो ।’’ उसी अनुसार भरत ने संबंधितों का मार्गदर्शन लेकर औैर धर्मशास्त्रानुसार कठोर आचरण कर, आदर्श राज्य चलाया । भरत के अपने हृदयसिंहासन पर प्रभु श्रीरामजी की पादुकाओं की स्थापना करने से उनके सर्वांग और उनका अस्तित्व ही राममय हो गया था । ऐसे राममय हुए भरत द्वारा किया राज्य साक्षात् रामराज्य ही था । उसके राज्य में कोई भी दीन-दुखी नहीं था । उन्होने एक पिता समान वात्सल्य से अपनी प्रजा का पालन किया था ।

 

५. वसिष्ठ ऋषि द्वारा भरत का गुणगान

‘भरत ने राज्यपद, राजवैभव एवं राजसी सुख का त्याग कर महान कार्य किया है । इसलिए वे सर्वसामान्य मनुष्य न रहते हुए ‘महात्मा भरत’ हो गए हैं । अत: प्रभु श्रीराम से पहले भरत का नाम इतिहास के सुवर्ण अक्षरों में लिखा जाएगा । भरत का अंत:करण निष्कपट, नि:स्वार्थी और निर्मल था । रामभक्ति का आदर्श बताते हुए भरत का जानबूझकर उल्लेख किया जाएगा और भरत को किया गया नमन प्रभु श्रीराम तक निश्चितरूप से पहुंचेगा’, ऐसे गौरवोद्गार वसिष्ठ ऋषि ने भरत के विषय में किए ।

 

६. जब भरत ने प्रभु श्रीराम की चरणपादुका
अपने मस्तक पर धारण कीं, तब ब्रह्मांड के ऋषि-मुनि एवं
देवी-देवताओं द्वारा आशीर्वाद देते हुए भरत पर पुष्पवृष्टि

भरत प्रभु श्रीराम से शरीर से भले ही दूर हों, तब भी वे मन से सदैव प्रभु के निकट ही थे । वे आठों प्रहर प्रभु श्रीराम का भावस्मरण करते और उनके ही सान्निध्य में रहकर राज्य चलाते थे । भरत के मन में प्रभु की पादुका एवं उनके मुख में ‘श्रीराम जय राम जय जय राम ।’ का पवित्र जप अखंड चलता था । वे अपने हृदय में स्थापित प्रभु श्रीराम की चरणपादुकाओं की भावपूर्ण ढंग से मानस पूजा करते थे । इसलिए सूक्ष्म से प्रभु श्रीराम का अखंड अस्तित्व उनके समीप कार्यरत था । ऐसे राममय हुए भक्तशिरोमणी महात्मा एवं राजर्षि भरत के चरणों में कोटि-कोटि प्रणाम ! रामभक्त भरत की इस परमोच्च भक्ति के सामने संपूर्ण ब्रह्मांड का ऐश्वर्य एवं समस्त पुण्यात्माओं का पुण्य भी फीका पड जाता है । इसलिए भरत ने जब चित्रकूट में प्रभु श्रीराम की चरणपादुकाएं अपने मस्तक पर धारण कीं, तब ब्रह्मांड के विविध लोकों में वास करनेवाली पुण्यात्माएं, दिव्यात्माएं, ऋषि-मुनि, सिद्ध, यक्ष, गंधर्व एवं समस्त देवी-देवताओं ने आनंद से आशीर्वाद देते हुए भरत पर पुष्पवृष्टि कर, उनका सम्मान किया ।

 

७. प्रभु श्रीराम को दिए हुए वचन का यथावत पालन करना

प्रभु श्रीराम का राज्य संभालने का आदेश स्वीकारते हुए भरत ने कहा, ‘‘एक शर्त पर मैं यह राज्य संभालूंगा । यदि १४ वर्षाें का कालखंड पूर्ण होते ही आप अयोध्या लौटे, तो ठीक है । यदि आपको अयोध्या लौटने में विलंब हुआ, तो मैं अग्निप्रवेश करूंगा ।’’ भरत द्वारा की हुई प्रतिज्ञा सुनकर सभी आश्चर्यचकित एवं चिंताग्रस्त हो गए । प्रभु श्रीराम ने उन्हें १४ वर्षाें पश्चात तत्काल अयोध्या लौटने का वचन दिया । रावण वध के उपरांत १४ वर्षाें की अवधि समाप्त होते ही प्रभु श्रीराम सीता, हनुमान एवं वानरवीरों सहित पुष्पक विमान में बैठकर लंका से भारत की ओर रवाना हुए । ‘अयोध्या लौटने में कहीं विलंब न हो जाए और कहीं भरत अग्निप्रवेश न कर ले’, इसलिए प्रभु श्रीराम ने अपने आगमन का समाचार देने के लिए हनुमान को अयोध्या जाने के लिए आगे भेज दिया । निर्धारित अवधि समाप्त होने जा रही थी और प्रभु श्रीराम के लौटने के कोई भी चिन्ह न दिखाई देने पर भरत अग्निप्रवेश करनेवाले ही थे कि इतने में प्रभु श्रीराम का संदेश लेकर हनुमानजी वहां पहुंचे । इससे भरत को अत्यंत आनंद हुआ । उन्होंने अग्निप्रवेश करने का निर्णय रहित किया और प्रभु श्रीरामजी के स्वागत के लिए संपूर्ण अयोध्यानगरी सजा दी । भरत में प्रभु श्रीराम के प्रति इतनी भक्ति थी कि उन्होंने अपना सर्वस्व उनके श्रीचरणों में अर्पण कर दिया था । उसका साथ ही उसे प्रभु की विरह सहन न होने से वह अपने प्राणों का भी त्याग करनेवाला था । इससे ‘रघुकुल रीति सदा चली आई, प्राण जाई पर वचन न जाई ।’ इस उक्ति की प्रचीति आई । क्षणभर का भी विलंब न करते हुए अपना सर्वस्व भगवान के श्रीचरणों में हंसते-हंसते अर्पण करनेवाले रामभक्त भरत का गुणगान जितना भी किया जाए, कम ही है । प्रभु श्रीराम सीतासहित पुष्पक विमान से जब अयोध्या पहुंचे, तब श्रीराम एवं भरत की भेट हुई । १४ वर्षाें का वियोग समाप्त होकर भक्त और भगवान के मिलन का अनमोल क्षण देखने के लिए केवल अयोध्यावासी ही नहीं, अपितु संपूर्ण सृष्टि आतुर हो गई थी ।

 

८. भरत के मानसिक स्तर पर न रहते हुए
आध्यात्मिक स्तर पर अतिउच्च स्तर का आदर्श जीवन यापन करना :

‘माता कैकयी ने प्रभु श्रीराम का राज्याभिषेक नहीं होने दिया और उन्हें वनवास में भेज दिया’, इसका भरत को बहुत दु:ख हुआ । इसलिए कि भरत एवं प्रभु श्रीराम में बंधुत्व का नाता न होते होकर, उनके बीच भक्त और भगवान का अटूट नाता था । वे माता कैकयी पर क्रोधित हुए और उनका मुख न देखने की प्रतिज्ञा की । जब प्रभु श्रीराम १४ वर्षाें पश्चात पुन: अयोध्या लौटे, तब प्रभु श्रीराम ने भरत को समझा-बुझाकर, माता कैकयी को क्षमा करवाया । फिर भरत ने अपनी माता से बोल-चाल आरंभ की । भरत एवं प्रभु श्रीराम, ये व्यावहारिक नाते के अनुसार सौतेले भाई थे; परंतु भरत आध्यात्मिक स्तर पर होने से उन्हें वे प्रभु श्रीराम को साक्षात् भगवान समझते थे और प्राणों से भी प्रिय मानते थे । इससे ध्यान में आता है कि भरत कभी भी मानसिक स्तर पर न रहते हुए आध्यात्मिक स्तर पर रहकर अति उच्च स्तर का आदर्श जीवन जी रहे थे ।

 

९. भरत द्वारा आदर्श राज्यकार्यभार अर्थात रामराज्य करना

भरत को राजनीति एवं नीति शास्त्र का भी ज्ञान था । उन्होंने प्रभु श्रीरामजी की अनुपस्थिति में स्थूल से राज्यकार्यभार उत्कृष्ट ढंग से संभाला । उनका आचरण इतना शुद्ध था कि प्रजा उनमें प्रभु श्रीराम का ही प्रतिरूप देखकर श्रद्धा और भक्तिभाव से धर्माचरण एवं साधना करती थी । भरत के उत्तम राज्यकार्यभार के कारण शत्रु ने कभी भी अयोध्या पर चढाई नहीं की । इसके साथ ही अयोध्या की प्रजा भी धर्माचरण कर आदर्श जीवन बिता रही थी । इसलिए किसी के जीवन में दु:ख नहीं था । राज्य पर भी कोई भी प्राकृतिक अथवा मानवी संकट नहीं आया । इस प्रकार भरत ने आदर्श राज्य कर रामराज्य ही किया ।

 

१०. भरत को राज्य का रत्तीभर भी मोह न होना

जब प्रभु श्रीराम १४ वर्षाें के पश्चात अयोध्या लौटे, तब भरत ने अयोध्या का राज्य उन्हें सौंप दिया । १४ वर्षाें के राज्यकार्यभार संभालने के पश्चात भी भरत को राज्य का मोह तनिक भी छू नहीं गया था । उन्होंने निरपेक्ष एवं अलिप्त रहकर केवल अपना कर्तव्य पूर्ण करने हेतु प्रभु श्रीराम की आज्ञा से अयोध्या का राज्य संभाला था । भरत निर्मोही होने से वे भले ही राज्यकार्यभार संभाल रहे थे, तब भी राजवैभव अथवा राजसत्ता में लिप्त नहीं हुए ।

 

११. भरत ने कर्मयोग, भक्तियोग, ज्ञानयोग एवं ध्यानयोग, इन चारों योगमार्गांनुसार साधना करना

रामभक्त भरत में अनेक दैवीय गुणों का समुच्चय था । व्यष्टि एवं समष्टि, ऐसे दोनों स्तरों पर भरत ने सभी कर्तव्य पूर्ण किए । वे आदर्श पुत्र, आदर्श बंधु, आदर्श राजा एवं आदर्श भक्त, इन सभी के कर्तव्य पूर्ण कर भरत ने सभी के समक्ष कर्मयोग का आदर्श प्रस्तुत किया । भरत में प्रभु श्रीराम के प्रति निस्सीम दास्यभक्ति थी । इसलिए उनकी आंतरिक साधना भक्तियोगानुसार चल रही थी । उसी प्रकार भरत को हिन्दू धर्मशास्त्र एवं अध्यात्म का संपूर्ण ज्ञान था । इसलिए उनका आचरण धर्मशास्त्र के अनुरूप था । राज्यकार्यभार से अवकाश मिलते ही भरत प्रभु श्रीराम का स्मरण करके ध्यानधारणा करते थे । इस प्रकार भरत ने कर्मयोग, भक्तियोग, ज्ञानयोग एवं ध्यानयोग, इन चारों योगमार्गांनुसार साधना कर, ‘आदर्श कर्मयोगी, परमज्ञानी, भक्तशिरोमणि एवं स्थितप्रज्ञ होना’, ऐसी उच्चतम आध्यात्मिक अवस्था प्राप्त की थीं ।

 

१२. भरत एवं प्रभु श्रीराम में एकरूपता के कारण उनमें समानता होना

रामभक्त भरत प्रभु श्रीराम से इतने एकरूप हो गए थे, कि उनकी कांति प्रभु श्रीराम समान ही नीली छटा युक्त थी । उनके नयन कमल समान सुंदर थे और उनकी देह से चंदन की दैवीय सुगंध आती थी । रामभक्त भरत का सौंदर्य दैवीय एवं अलौकिक था । प्रभु श्रीराम एवं भरत में इतनी समानता निर्माण हो गई थी कि प्रजा जब भरत को देखती, तो उससे उन्हें भगवान राम को देखने का ही संतोष मिलता । कारण यह कि भरत केवल देखने में ही प्रभु श्रीराम समान नहीं थे, अपितु उसमें प्रभु श्रीराम समान दैवीय गुण भी थे । इसप्रकार ‘केवल प्रभु श्रीराम ही नहीं, अपितु उनके भरत समान समस्त भक्त भी आदर्श थे’, यह उपरोक्त सूत्रों से हमें ध्यान में आता है ।

 

१३. कृतज्ञता !

‘भगवान की असीम कृपा से महात्मा भरत पर उपरोक्त लेख उत्स्फूर्तता से सूझा । भगवान ने ही मेरे मन के विचारों को शब्दबद्ध करवा लिया । इसके लिए प्रभु श्रीराम के श्रीचरणों में कोटीश: कृतज्ञता व्यक्त करती हूं ।’

– कु. मधुरा भोसले (सूक्ष्म से प्राप्त ज्ञान), सनातन आश्रम, रामनाथी, गोवा.

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