हिन्दुओं के आस्थास्थान प्रभु श्रीराम पर हुए आरोपों का खंडन

प्रभु श्रीरामचंद्रजी के श्रीचरणों में प्रणाम ! भगवान श्रीराम ने जो अवतारी कार्य किया है, उसकी अन्य किसी से तुलना ही नहीं की जा सकती । प्रभु श्रीराम ने सामान्य मनुष्य की भांति सुख-दुःख में जीवन बिताते हुए अपने आचरण से अनेक आदर्श स्थापित किए हैं । आपातकाल में भी उन्होंने अपने वचन का पालन किया । वनवास में रहते हुए श्रीरामजीने वनवासी जातियों को धर्म का मार्ग दिखाया, उन्हें संगठित कर सेना का निर्माण किया । रावण का वध करके लंका जीतने के बाद भी उन्होंने उस भूमिपर अपना अधिकार नहीं जताया, अपितु विभीषण को राजा घोषित कर लंका उसे सौंप दी । अयोध्या से लौटने पर आदर्श रामराज्य स्थापित किया । उनका जीवन इतना महान है कि आज भी भारत के बाहर कंबोडिया, मलेशिया, इंडोनेशिया आदि देशों मे प्रभु श्रीराम तथा रामायण, इन्हें बहुत सम्मान दिया जाता है ।

जब श्रीराम का आदर्श, उनके रामराज्य का आदर्श इस प्रकार रहेगा, तब हिन्दूूविरोधी शक्तियों के लिए कार्य करना आसान नहीं होगा । इस कारण प्रभु श्रीरामजी के जीवन के संदर्भ में अनेक सरासर मिथ्या आरोप किए जाते हैं । भारत में जब अंग्रेजों का राज था, तब हमारे समाज में फूट डालने के लिए ईसाइयों ने अनेक षडयंत्र रचे । उसके ही अंतर्गत हमारे धर्मग्रंथों का उलटा अथवा अयोग्य ढंग से अंग्रेजी में अनुवाद किया गया । इसके साथ ही कुछ संस्कृत के विद्वानों को धन का प्रलोभन देकर हमारे मूल ग्रंथों में कुछ नए प्रक्षिप्त (मिलावटी) भाग जोडकर उन्हें विकृत किया गया । अंग्रेजी शिक्षा लेनेवाले आधुनिकतावादियों को संस्कृत का ज्ञान न होने के कारण उन्होंने वही विकृत अंग्रेजी ग्रंथ पढकर हिन्दू धर्म पर आक्षेप लेना, उसकी अपकीर्ति करना आरंभ कर दिया । इसीप्रकार तमिलनाडु में प्रभु श्रीराम को विदेशी आर्य तथा अपने आपको द्रविडीयन मूल का माननेवाले इ.वी. रामस्वामी नायकर (पेरीयार) ने प्रभु श्रीराम के संदर्भ में अत्यंत विकृत ‘सच्ची रामायण’ नामक पुस्तक लिखी । जिसमें बिना किसी संदर्भ के श्रीराम पर विकृत आरोप किए गए । जब तक ऐसे मिथ्या आरोप हम सुनेंगे और हमें भी सत्य का पता नहीं होगा, तो हमारे मन में श्रीराम के प्रति भाव निर्माण होना कठिन है । इसलिए आज हम इन मिथ्या आरोपों की वास्तविकता आपके सामने रखेंगे । इससे निश्‍चित ही आपके मन की शंका दूर होगी और आप भी ऐसे आरोप करनेवालों का सामना आत्मविश्‍वास के साथ कर सकते हैं ।

 

वाल्मीकि रामायण में ऐसे कई श्‍लोक आते हैं
जिनसे यह सिद्ध होता है कि प्रभु श्रीराम मांसाहारी थे ?

इस शंका का समाधान होना अत्यंत आवश्यक है । इसका कारण यह है कि श्रीराम के साथ भारतीय जनमानस की आस्था जुडी हैं । भारतीय जनमानस का यह मानना है कि ऐसा नहीं हो सकता है कि श्रीराम मांसाहारी थे । हमारे मूल ग्रंथ वेदों में अनेक मंत्र मांसाहार की निंदा करते हैं, निरीह पशुओं की रक्षा करना आर्य पुरुषों का कर्तव्य बताते हैं और जो निरीह पशुओं पर अत्याचार करते हैं उनको कठोर दंड देने की आज्ञा वेद में स्पष्ट रूप से है ।

हमारे आर्यावर्त देश में महाभारत युद्धकाल के पश्‍चात और उसमें भी विशेष रूप से पिछले २५०० वर्षों में अनेक परिवर्तन हुए हैं जैसे ईश्‍वरीय वैदिक धर्म का लोप होना और मानव निर्मित मत मतान्तर का प्रकट होना जिनकी अनेक मान्यताएं वेद विरुद्ध थीं । ऐसा ही एक मत था वाममार्ग । जिसकी मान्यता थी की, मांस, मद्य, मैथुन आदि से ईश्‍वर की प्राप्ति होती है । वाममार्ग के समर्थकों ने अपना प्रभाव बढाने के लिए श्रीरामजी के सबसे प्रमाणिक जीवनचरित्र वाल्मीकि रामायण में यथानुसार मिलावट आरंभ कर दी जिसका परिणाम आपके सामने है । यहीं से प्रक्षिप्त श्‍लोकों की रचना आरंभ हुई ।

वाल्मीकि रामायण का प्रक्षिप्त भाग

इस समय देश में वाल्मीकि रामायण की जो भी पांडुलिपियां मिलती हैं, वे सभी दो मुख्य प्रतियों से निकली हैं । एक हैं बंग देश में मिलनेवाली प्रति जिसमें बाल, अयोध्या, अरण्य, किष्किन्धा, सुंदर और युद्ध, ये ६ कांड हैं और कुल सर्ग ५५७ और श्‍लोक संख्या १९७९३ हैं; जबकि दूसरी प्रति बम्बई प्रांत से मिलती हैं जिसमें बाल, अयोध्या, अरण्य, किष्किन्धा, सुंदर और युद्ध, इन ६ कांड के अलावा एक और उत्तरकांड हैं, कुल सर्ग ६५० और श्‍लोक संख्या २२४५२८ हैं ।

दोनों प्रतियों में पाठ भेद होने का कारण संपूर्ण उत्तरकांड का प्रक्षिप्त होना, कई सर्गों का प्रक्षिप्त होना हैं एवं कई श्‍लोकों का प्रक्षिप्त होना है ।

रामायण में मांसाहार के विरुद्ध श्रीराम की साक्ष्य

श्रीराम और श्री लक्ष्मण द्वारा यज्ञ की रक्षा

रामायण के बालकांड में ऋषि विश्‍वामित्र, राजा दशरथ के समक्ष जाकर उन्हें अपनी समस्या बताते हैं कि जब वे यज्ञ करने लगते हैं तब मारीच और सुबाहु नाम के दो राक्षस यज्ञ में विघ्न डालते हैं एवं मांस, रुधिर आदि अपवित्र वस्तुओं से यज्ञ को अपवित्र कर देते हैं । राजा दशरथ श्रीराम एवं लक्ष्मणजी को उनके साथ राक्षसों का विध्वंस करने के लिए भेज देते हैं जिसके परिणामस्वरूप यज्ञ निर्विघ्न संपन्न होते हैं और राक्षसों का संहार होता है ।

जो लोग यज्ञ आदि में पशु बलि आदि का विधान होना मानते हैं, वाल्मीकि रामायण में राजा दशरथ द्वारा किए गए अश्‍वमेध यज्ञ में पशु बलि आदि का होना मानते हैं उनसे हमारा यह स्पष्ट प्रश्‍न है कि यदि यज्ञ में पशु बलि का विधान होता तो फिर राक्षस यज्ञ में मांस आदि डालकर ऋषि विश्‍वामित्र की तो सहायता कर रहे थे, न कि उनके यज्ञ में विघ्न डाल रहे थे । इससे तो यही सिद्ध होता है कि रामायण में अश्‍वमेध आदि में पशु बलि का वर्णन प्रक्षिप्त हैं और उसका खंडन स्वयं रामायण से ही हो जाता है ।

श्रीराम की मांसाहार विरुद्ध स्पष्ट घोषणा

अयोध्या कांड सर्ग २ के श्‍लोक २९ में जब श्रीराम वन में जाने की तैयारी कर रहे थे तब माता कौशल्या से श्रीराम ने कहा, मैं १४ वर्षों तक जंगल में प्रवास करूंगा और कभी भी वर्जित मांस का सेवन नहीं करूंगा और जंगल में प्रवास कर रहे मुनियों के लिए निर्धारित केवल कंद मूल पर निर्वाह करूंगा।

इससे स्पष्ट साक्ष्य रामायण में मांस के विरुद्ध और क्या हो सकती है ?

क्या श्रीराम ने स्वर्ण मृग का शिकार उसका मांस खाने के लिए किया था ?

इस शंका का उचित उत्तर स्वयं रामायण में अरण्य कांड में मिलता है ।

माता सीता प्रभु रामचंद्रजी से स्वर्ण मृग को पकडने के लिए इस प्रकार कहती हैं –

यदि आप इसे जीवित पकड लेते है तो यह आश्‍चर्यप्रद पदार्थ आश्रम में रहकर विस्मय करेगा- (अरण्यक कांड सर्ग ४३ श्‍लोक १५)

और यदि यह मारा जाता है, तो इसकी सुनहरी चाम को चटाई पर बिछा कर मैं उस पर बैठना पसंद करूंगी।- (अरण्यक कांड सर्ग ४३ श्‍लोक १९)

इससे यह निश्‍चित रूप से सिद्ध होता हैं की स्वर्ण हिरण का शिकार मांस खाने के लिए तो निश्‍चित रूप से नहीं हुआ था।

 

क्या विवाह के समय रामचन्द्रजी की आयु १५ वर्ष और सीता जी की आयु ६ वर्ष थी ?

प्रथम तो सीताजी विवाह के समय आयु ६ वर्ष की मानने का कारण वाल्मीकि रामायण में दिया गया एक श्‍लोक है, जिसे अरण्य कांड ४७/४,१० में सीता रावण को अपना परिचय देते हुए कहती हैं कि मेरी आयु इस समय १८ वर्ष है, मैं १२ वर्ष ससुराल में रहकर, समस्त भोगों का उपभोग करके मैं राम-लक्ष्मण के साथ वन में आई हूं । अर्थात विवाह के समय सीता जी की आयु केवल १८ -१२ = ६ वर्ष ही थी । इस श्‍लोक को आधार बनाकर सीता जी की विवाह के समय आयु ६ वर्ष सिद्ध करने की हम रामायण आदि शास्त्रों से समीक्षा करेंगे ।

१. जब ऋषि विश्‍वामित्र श्रीराम और श्रीलक्ष्मण को लेकर जनक राज के राज्य में पधारे तो उन्हें देखकर राजा जनक ने आश्‍चर्यचकित हो हाथ जोडकर विश्‍वामित्र से पूछा हे मुनिवर ! गज और सिंह समान चलने वाले, देवताओं के समान पराक्रमी तथा अश्‍विनी कुमारों के समान सुंदर युवा कुमार कौन हैं ? – संदर्भ बालकाण्ड ५०/१७-१९ (यहां श्रीराम और श्री लक्ष्मण का जो वर्णन किया गया है, ऐसी अवस्था सुश्रुत के अनुसार २५ वर्ष की आयु में ही होती हैं)

२. जब विश्‍वामित्र ने राजकुमारों की धनुष देखने की इच्छा व्यक्त की, तो जनक ने सीता के विवाह के संदर्भ में धनुषभंग की चर्चा करते हुए कहा- जब मेरी कन्या सीता ‘वर्द्धमाना’ अर्थात यौवना हुई तो बहुत से राजा उसका हाथ मांगने आने लगे । पर सब असफल रहे । – संदर्भ बालकाण्ड ६६/१५ (यहां पर भी सीता को यौवना कहा गया है ।)

३. तुलसीकृत रामचरितमानस में भी कहीं पर भी सीताजी की विवाह के समय आयु ६ वर्ष नहीं लिखी है । इन सबसे सिद्ध होता है कि यह श्‍लोक प्रक्षिप्त अर्थात मिलावटी हैं और विवाह के समय श्री रामचन्द्र जी की आयु १५ वर्ष और सीताजी की आयु ६ वर्ष नहीं थी ।

 

भूमि जोतते समय सीता पाई गईं, ऐसे कहा जाता है ।
परंतु यह क्या है, यह समझ में नहीं आता । इसका अर्थ क्या है ?

बालसीता पृथ्वी के गर्भ से उद्भूत होनेवाली हिरण्यगर्भ तरंगोेंं का साकार रूप थीं । शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गंध एवं उनसे संबंधित शक्तियां सहवर्ती होती हैं एवं उनमें से किसी एक घटक के अस्तित्व से अन्य सर्व भी विद्यमान होते हैं, (उदा. नाम के उच्चारण से उससे संबंधित रूप, गंध भी विद्यमान होते हैं,) उसीप्रकार बालसीता विशिष्ट शक्ति का, हिरण्यगर्भ शक्ति का, रूप थीं और रामपत्नी सीता राम की शक्ति का रूप थीं ।

 

कैकेयी को खलनायक के रूप में देखा जाता है ।
इसलिए कि कैकेयी ने एक वर से रामचंद्र के लिए चौदह वर्ष का
वनवास एवं दूसरे वर से भरत के लिए राज्य मांग लिया । इसकी वास्तविकता क्या है ?

श्रवणकुमार के दादा, धौम्य ऋषि थे । उसके माता-पिता रत्नावली एवं रत्नऋषि थे । रत्नऋषि नंदिग्रामके राजा अश्‍वपतिके राजपुरोहित थे । अश्‍वपति राजा की कन्याका नाम कैकेयी था । रत्नऋषिने कैकेयी को सभी शास्त्र सिखाए एवं यह बताया कि यदि दशरथ की संतान हुई, तो वह संतान राजगद्दी पर नहीं बैठ पाएगी अथवा दशरथ की मृत्यु के पश्‍चात यदि चौदह वर्ष के दौरान राजसिंहासन पर कोई संतान बैठ भी गई, तो रघुवंश नष्ट हो जाएगा । इसे रोकने हेतु वसिष्ठ ऋषि ने आगे चलकर कैकेयी को दशरथ से दो वर मांगने के लिए कहा । उसमें एक वर से कैकेयी ने श्रीरामके लिए चौदह वर्ष का वनवास मांगा और दूसरे वर से भरत के लिए राज्य । यदि कैकेयी श्रीराम का वास्तव में द्वेष करतीं, तो वह केवल १४ वर्ष के लिए ही क्यों ? वे संपूर्ण जीवनकाल के लिए राम को वनवास भेज सकती थीं । उन्हें ज्ञात था कि श्रीराम के रहते, भरत राजा बनना स्वीकार नहीं करेंगे अर्थात राजसिंहासन पर नहीं बैठेंगे । वसिष्ठ ऋषि के कहने पर भरत ने सिंहासन पर राम की प्रतिमा के स्थान पर उनकी चरणपादुकाएं स्थापित कीं । यदि प्रतिमा स्थापित की होती, तो शब्द, स्पर्श, रूप, रस एवं गंध सहवर्ती होने के नियम से जो परिणाम राम के सिंहासन पर बैठने से होता, वही उनकी प्रतिमा स्थापित करने से भी होता ।

कैकेयी को महर्षि दुर्वासा ने वरदान देकर उसका एक हाथ वज्र का बनाया था । कैकेयी ने राजा दशरथ के साथ स्वर्ग पर आक्रमण करनेवाले असुरों के विरुद्ध युद्ध में सारथी बनकर सहभाग लिया था । उस युद्ध में रथ के पहिए से कील निकल जाने के बाद कैकेयी ने वहां पर कील की जगह अपनी उंगली लगाकर राजा दशरथ के प्राणों की रक्षा की थी । इससे प्रसन्न होकर राजा दशरथ ने उन्हे वरदान मांगने के लिए कहा था । इस घटना से यह भी स्पष्ट होता है कि हजारों वर्ष पूर्व भी हमारे हिन्दू धर्म में नारियां युद्धशास्त्र में पारंगत और रथ को कुशलता से चलानेवाली थीं । इससे हिन्दू धर्म में स्त्रियों के साथ अन्याय किया, यह आरोप भी असत्या सिद्ध होता है ।

 

भगवान राम स्वयं भगवान के अवतार थे । फिर माता
सीता का हरण रावण ने कैसे किया, ऐसा प्रश्‍न भी उठाया जाता है ?

वास्तव में सीता रावण के साथ गईं ही नहीं । वह अग्नि में प्रवेश कर गईं और केवल उनकी छाया रावण के साथ गई । (वास्तव में रामलीला का आरंभ यहीं से होता है ।) पुनः रावण की चंगुल से लौटने पर वह छाया शुद्धिनिमित्त पुनः अग्नि में प्रविष्ट हुईं और खरी सीता बाहर आईं । अवतार का कार्य होता है, सज्जनों की रक्षा तथा दुर्जनों का विनाश । इसलिए रावण-कुंभकर्ण के अत्याचार से पीडित जनता को भयमुक्त करने के लिए उनका विनाश करना आवश्यक था । सीता को मुक्त करने के लिए रावण का वध करना पडा ।

 

सीताहरण के उपरांत आक्रोश में ‘सीते, सीते’ पुकारते हुए श्रीराम वृक्षों
का आलिंगन कर रहे थे । क्या अवतारों के इस आचरण का कुछ और अर्थ है ?

अवतार होते हुए भी साधारण मनुष्य की भांति श्रीराम भी सुख-दुःख व्यक्त करते थे, इसलिए हम अन्य देवताओं की तुलना में उनसे अधिक समीपता अनुभव करते हैं । सीताहरण के उपरांत श्रीराम अत्यंत शोकाकुल हो गए । परंतु इसका भावार्थ समझने के लिए एक कथा इसप्रकार है –

इस प्रसंग से भी श्रीरामका ईश्‍वरत्व किस प्रकार प्रमाणित होता है, यह आगे शिव-पार्वती के वार्तालाप से ज्ञात होता है ।

पार्वती : हम जिनका नामजप करते हैं, देखिए वह सामान्य मनुष्य की भांति अपनी पत्नी के लिए कितने शोकाकुल हैं ।

शिव : वह शोक बनावटी है । उन्होंने मनुष्यदेह धारण किया है, इसलिए उन्हें ऐसा व्यवहार करना पडता है ।

पार्वती : देखिए, श्रीराम कैसे बेल-पौधोंका आलिंगन करते फिर रहे हैं, वह सीता के लिए सच में पागल हो गए हैं ।

शिव : मैं जो कह रहा हूं, वही सत्य है ।

तब माता पार्वती ने स्वयं सीता का रूप धारण कर, श्रीराम के समक्ष खडी हो गईं । उन्हें देखते ही श्रीराम उन्हें प्रणाम कर बोले, ‘मैं तुम्हें पहचानता हूं । तुम आदिमाया हो ।’ यह सुनते ही पार्वती समझ गईं कि श्रीराम का शोक मात्र दिखावा है ।

इस कथा से यह ध्यान में आता है कि अवतार हो अथवा सिद्ध पुरुष, उनके चरित्र का अवलोकन आध्यात्मिक अधिकारी ही कर सकते हैं । सामान्य बुद्धि से उसका तर्क लगाना हास्यास्पद है ।

 

बाली के विषय में राम पर एक आरोप किया जाता
है कि राम ने बाली पर पीछे से बाण चलाया । युद्ध के नियम न
पालते हुए श्रीराम ने उनके साथ विश्‍वासघात किया । इसमें सत्य क्या है ?

अध्यात्म के अनुसार – श्रीराम के बाण से, अनाहतचक्र पर रुकी हुई बाली की आध्यात्मिक प्रगति पुनः आरंभ हो गई और वह मुक्त हो गया ।

कथा के अनुसार

१. बाली ने सुग्रीव की पत्नी और संपत्ति छीनकर उसे राज्य से बाहर निकाल दिया था । बाली कोई अच्छा व्यक्तित्ववाला और न ही धार्मिक विचारोंवाला था ।

वाल्मीकि रामायण के अनुसार जब सुग्रीव बाली को युद्ध के लिए ललकारते हैं, तब बाली की पत्नी तारा उसे समझाने का प्रयास करती है कि श्रीराम जैसे महापुरुष का विरोध करना हमारे लिए अच्छा नहीं होगा । इससे तो आप मुसीबत में पड जाएंगे । अर्थात युद्ध होने से पूर्व ही बाली और उसकी पत्नी तारा को पता चल गया था कि श्रीराम भी इस युद्ध में सुग्रीव के साथ हैं । तब श्रीराम के छिपकर युद्ध करने की बात ही नहीं रहती ।

२. (वाल्मीकि रामायण किष्किन्धा – १९/११-१३) के अनुसार युद्ध में बाली ने भगवान् श्रीराम पर पत्थर और वृक्षों से आक्रमण किए, जिसे श्रीराम ने बाणों से काटकर खंडित कर, बाली का वध किया । अब यदि बाली को छल से मारा होता, तो बाली श्रीराम पर वृक्षों और पत्थरों से आक्रमण कैसे करता ?

प्राचीन समय में रथ, ढाल और कवच की सहायता से रक्षात्मक युद्ध किया जाता था । आधुनिक युद्धों में भी सैनिक सीमा पर आमने-सामने से नहीं लडते, अपितु सुरक्षित स्थान पर छिपकर ही लडते हैं ! भगवान् श्रीराम के पास न तो रथ था, न ढाल और न ही कवच ! इसलिए वाली द्वारा फेंके गए वृक्ष और शिलाओं से सुरक्षित रहने के लिए उन्होंने एक वृक्ष का सहारा लिया ! इस तरह श्रीराम ने बाली वध में कोई छल अथवा धोखा नहीं किया ! युद्ध के नियमों के अनुसार ही बाली-वध किया था !

३. जब श्रीराम ने बाली को तीर मारा, तो बाली श्रीरामजी से कहते हैं, मैंने तुम्हारा क्या बिगाडा है ? मेरी दुश्मनी तो सुग्रीव से थी, फिर आपने मुझे क्यों मारा ? तब श्रीराम श्‍लोकों के माध्यम से कहते हैं कि, ‘तुम धर्म का हनन करनेवाले हो और तुमने राजधर्म का पालन नहीं किया । धर्म छोडकर अपने ही छोटे भाई की पत्नी जो तुम्हारी पुत्रवधु के समान थी, उससे तुमने उपभोग किया है और इसी का दंड मैंने तुम्हें दिया है ।

४. इस युद्ध मे बाली को श्रीराम का बाण लगने के उपरांत बाली देह त्यागने से पहले अपने पुत्र अंगद को सुग्रीव के साथ श्रीराम की सहायता करने के लिए कहता है । यदि श्रीराम पर वह क्रोधित रहता, तो अपने पुत्र से ऐसा नहीं कहता । इससे स्पष्ट होता है कि यह आरोप मिथ्या है ।

 

कुछ विधर्मी और नास्तिकों द्वारा श्रीराम पर शम्बूक नामक
एक शुद्र का हत्यारा होने का आक्षेप लगाया जाता हैं, क्या यह सत्य है ?

१. बाद मे जोडे गये प्रक्षिप्त भाग का यह प्रसंग है – सर्वप्रथम शम्बूक कथा का वर्णन वाल्मीकि रामायण में उत्तरकांड के ७३/७६ सर्ग में मिलता हैं। यह बातें उत्तरकांड में लिखी गई है । यह मूल रामायण में नहीं है, रामायण युद्धकांड के बाद समाप्त हो जाती है। । क्योकि किसी भी ग्रंथ की फलश्रुति सदैव अंत में लिखी जाती है और उत्तरकाण्ड फलश्रुति के उपरांत जोडा गया है । बौद्धकाल में उत्तरकांड लिखा गया और इसे वाल्मीकि रामायण का हिस्सा बना दिया गया । रामकथा पर सबसे प्रामाणिक शोध करनेवाले फादर कामिल बुल्के का स्पष्ट मत है कि वाल्मीकि रामायण का ‘उत्तरकांड’ मूल रामायण के बहुत काल पश्‍चात की पूर्णत: प्रक्षिप्त रचना है ।’ (रामकथा उत्पत्ति विकास- हिन्दी परिषद, हिन्दी विभाग, प्रयाग विश्‍वविद्यालय, प्रथम संस्करण १९५०)

२. दूसरा प्रमाण यह है कि इस प्रसंग मे कहा जाता है कि राम ने शंबुक का वध तलवार से किया; परंतु श्रीराम के पूरे जीवनचक्र में रामजी कहीं भी, कभी भी धनुष-बाण के अतिरिक्त दूसरा कोई शस्त्र प्रयोग नहीं किया है । न तो शंबूक के वध से पहले और न ही शंबूक के वध के उपरांत । अत: स्पष्ट है कि यह प्रसंग प्रक्षिप्त है।

३. तीसरा प्रमाण यह कि इस प्रसंग में ऐसा वर्णन है कि श्रीरामचन्द्रजी पुष्पक विमान पर सवार होकर शम्बुक की खोज में निकल पडेे । वास्तवविकता तो यह है कि यह एक और असत्य कथन है, कारण यह कि पुष्पक विमान तो श्रीरामजी ने अयोध्या वापस लौटते ही उसके वास्तविक स्वामी कुबेर को लौटा दिया था । (संदर्भ- युद्ध कांड १२७/६२)

४. एक और रामायण में श्रीराम का केवट, निषाद राज, भीलनी शबरी के साथ बिना किसी भेदभाव के साथ सद्व्यवहार है । वहीं दूसरी और सातवें कांड में शम्बूक पर शुद्र होने के कारण अत्याचार का वर्णन है । दोनों बातें आपस में मेल नहीं खाती; अत: इससे यही सिद्ध होता है कि ‘शम्बूक-वध’ उत्तर कांड की कथा प्रक्षिप्त अर्थात मिलावटी है ।

वेद तथा वाल्मीकि रामायण में शूद्रों का निषेध नहीं, अपितु उपासना से शुद्र के महान बनने के प्रमाण

१. नमो निशादेभ्य यजुर्वेद १६/२७

अर्थात शिल्प-कारीगरी विद्यायुक्त, जो परिश्रमी जन (शुद्र / निषाद) हैं उनको नमस्कार अर्थात उनका सम्मान करें ।

२. मुनि वाल्मीकिजी कहते हैं कि इस रामायण के पढने से (स्वाध्याय से) ब्राह्मण बडा सुवक्ता ऋषि होगा, क्षत्रिय भूपति होगा, वैश्य अच्छा लाभ प्राप्त करेगा और शुद्र महान होगा । रामायण में चारों वर्णों के समान अधिकार दिखाई देते हैं । – संदर्भ- प्रथम अध्याय अंतिम श्‍लोक

३. इसके अतिरिक्त अयोध्या कांड, अध्याय ६३ श्‍लोक ५०-५१ तथा अध्याय ६४ श्‍लोक ३२-३३ में रामायण को श्रवण करने का वैश्यों और शूद्रों दोनों के समान अधिकार का वर्णन हैं ।

४. जिस अनधिकार तप के कारण शम्बूक का वध वर्णित है, उसी प्रसंग में ७४ सर्ग, श्‍लोक २७ में कलियुग में शूद्रों को तपस्या का अधिकार दिया गया है । अतः कलियुग में तो इस पर प्रश्‍न ही नहीं है । और भी बालकाण्ड, सर्ग १३, श्‍लोक २० में वसिष्ठ जी द्वारा पुत्रेष्टि यज्ञ में ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य के साथ सहस्त्रों शूद्रों को बुलाने का वर्णन है । तब वहां यज्ञ में क्या वे कान बंद कर बैठे होंगे !

अब रामायण से जुडी घटनाओं के विषय में अंतिम प्रश्‍न !

 

राज्य के रजक नामक एक धोबी के कहने पर कि ‘सीता अशुद्ध है’,
इसलिए राम ने सीता का परित्याग किया । इसकी वास्तविकता क्या है ?

१. सीता को दोषी कहनेवाले रजक को ‘धोबी’ दर्शाया गया है । धोबी का काम है कपडे धोकर स्वच्छ करना, उन पर किसी प्रकार का दाग-धब्बा न रहने देना । श्रीराम पर भी किसी प्रकार का दाग न रहे, इसी उद्देश्य से धोबी ने ऐसा कहा ।

२. रजक शब्द रज + क, इन दो शब्दों से बना है । अक्षर ‘क’ किसी वस्तु का छोटा-सा अंश दर्शाता है । रजक अर्थात वह जिसमें रजोगुण का अंश हो । इसलिए वह सीता की सात्त्विकता नहीं पहचान पाया ।

Leave a Comment