गोमय से बनी अशास्त्रीय गणेशमूर्ति उपासक को आध्यात्मिक दृष्टि से लाभदायक न होकर धर्मशास्त्रानुसार बनी सनातन-निर्मित शास्त्रीय गणेशमूर्ति आध्यात्मिक दृष्टि से लाभदायक होना

‘महर्षि अध्यात्म विश्‍वविद्यालय’ ने ‘यू.टी.एस.
(यूनिवर्सल थर्मो स्कैनर)’ उपकरण की सहायता से की हुई वैज्ञानिक परीक्षण

आज सामाजिक प्रसारमाध्यमों द्वारा (सोशल मीडिया के माध्यम से) गणेशोत्सव में ‘गोमय (गोबर) गणेशमूर्ति’ बनाने के विषय में बडी मात्रा में प्रसार किया जा रहा है । उसमें कहा है कि गोमय से अर्थात गाय के गोबर से बनी गणेशमूर्ति का पूजन करने पर शीघ्र शुभ फल की प्राप्ति होती है । मिट्टी एवं गोबर से बनी मूर्ति में पंचतत्त्वों का वास होता है ।’ देखा जाए, तो गोमय एवं गोमूत्र से बनी गणेशमूर्ति अशास्त्रीय है । धर्मग्रंथों में मिट्टि से बनी श्री गणेशजी की मूर्ति की स्थापना करने के लिए बताया है । ऐसा करने से श्री गणेशचतुर्थी के दिन मिट्टी से बनी श्री गणेशमूर्ति की ही स्थापना एवं पूजन करने से पूजक को लाभ होता है । गोमय से बनी अशास्त्रीय गणेशमूर्ति एवं मिट्टि से बनी शास्त्रीय गणेशमूर्ति इनसे प्रक्षेपित होनेवाले स्पंदनों का विज्ञान की सहायता से अध्ययन करने हेतु ९.३.२०१८ के दिन रामनाथी, गोवा स्थित सनातन के आश्रम में ‘महर्षि अध्यात्म विश्‍वविद्यालय’ की ओर से एक प्रयोग किया गया । इस हेतु ‘यु.टी.एस. (युनिवर्सल थर्मो स्कैनर)’ इस उपकरण का उपयोग किया गया । इस प्रयोग का स्वरूप, प्रयोग से प्राप्त निरीक्षण तथा उनका विवरण आगे दिया है ।

 

१. प्रयोग का स्वरूप

इस प्रयोग में गोमय गणेशमूर्ति, सनातन-निर्मित शास्त्रीय रंगीन गणेशमूर्ति एवं सनातन-निर्मित शास्त्रीय श्‍वेत रंग की गणेशमूर्ति के ‘यु.टी.एस.’ उपकरण द्वारा निरीक्षण लिए गए । इन सभी निरीक्षणों का तुलनात्मक अध्ययन किया गया ।

पाठकों को सूचना : ‘यु.टी.एस.’ उपकरण की जानकारी’, ‘उपकरण द्वारा करने के प्रयोग में अंतर्भूत घटक’, ‘घटकों का प्रभामंडल जांचना’, ‘परीक्षण की पद्धति’ तथा ‘प्रयोग में समानता आने हेतु बरती गई सावधानी’, ये नित्य के सूत्र सनातन संस्था के जालस्थल की ‘goo.gl/tBjGXa’ इस लिंक पर दिए हैं । ध्यान रहे कि, इस लिंक के कुछ अक्षर कैपिटल (Capital) हैं ।

 

२. गणेशमूर्तियों के संदर्भ में लिए गए निरीक्षण एवं उनका विवेचन

२ अ. नकारात्मक ऊर्जा के संदर्भ में प्राप्त निरीक्षण एवं उनका विवेचन

२ अ १. गोमय गणेशमूर्ति में ‘इन्फ्रारेड’ एवं ‘अल्ट्रावायलेट’ दोनों प्रकार की नकारात्मक ऊर्जा का होना; परन्तु सनातन-निर्मित शास्त्रीय रंगीन गणेशमूर्ति एवं सनातन-निर्मित शास्त्रीय श्‍वेत रंग की गणेशमूर्ति में नकारात्मक ऊर्जा तनिक भी न होना

गोमय गणेशमूर्ति में ‘इन्फ्रारेड’ एवं ‘अल्ट्रावायलेट’ दोनों प्रकार की नकारात्मक ऊर्जा थी । तब ‘यु.टी.’ स्कैनर की भुजाओं ने उस गणेशमूर्ति के संदर्भ में ‘इन्फ्रारेड’ एवं ‘अल्ट्रावायलेट’ ऊर्जा जांचते समय क्रमशः १२० तथा १५० अंश का कोण बनाया । स्कैनर की भुजाओं से १८० अंश का कोण बनने पर ही प्रभामंडल नापना संभव होता है । इसलिए गोमय गणेशमूर्ति में विद्यमान दोनों नकारात्मक ऊर्जा का प्रभामंडल नापना संभव नहीं हुआ । उसकी जानकारी आगे दे रहे हैं ।

गणेशमूर्ति का प्रकार सकारात्मक ऊर्जा का प्रभामंडल (मीटर में)
१. गोमय गणेशमूर्ति १.२०
२. सनातन-निर्मित शास्त्रीय रंगीन गणेशमूर्ति १.४५
३. सनातन-निर्मित शास्त्रीय श्‍वेत रंग की मूर्ति २.०७

 

सनातन-निर्मित शास्त्रीय रंगीन गणेशमूर्ति एवं सनातन-निर्मित शास्त्रीय श्‍वेत रंग की मूर्ति इन दोनों में भी ‘इन्फ्रारेड’ एवं ‘अल्ट्रावायलेट’ दोनों प्रकार की नकारात्मक ऊर्जा तनिक भी नहीं पाई गई ।

२ आ. सकारात्मक ऊर्जा के संदर्भ में प्राप्त निरीक्षण एवं उनका विवेचन

२ आ १. गोमय गणेशमूर्ति की अपेक्षा सनातन-निर्मित शास्त्रीय रंगीन गणेशमूर्ति में सकारात्मक ऊर्जा अधिक होना, तो सनातन-निर्मित शास्त्रीय श्‍वेत रंग की गणेशमूर्ति में सकारात्मक ऊर्जा सर्वाधिक होना

सभी व्यक्ति, वास्तु अथवा वस्तु में सकारात्मक ऊर्जा होती है, ऐसा नहीं । प्रयोग से प्राप्त निरीक्षणों में तीनों भी गणेशमूर्तियों में सकारात्मक ऊर्जा थी । उन मूर्तियों का प्रभामंडल नापते समय स्कैनर की भुजाओं ने १८० अंश का कोण बनाया, जिससे उनका प्रभामंडल नापना संभव हुआ । उसकी जानकारी आगे दे रहे हैं ।

 

२ इ. कुल प्रभामंडल के संदर्भ में प्राप्त निरीक्षणों का विवेचन

२ इ १. गोमय गणेशमूर्ति की अपेक्षा सनातन-निर्मित शास्त्रीय रंगीन गणेशमूर्ति का कुल प्रभामंडल अधिक होना, तो सनातन-निर्मित शास्त्रीय श्‍वेत रंग की गणेशमूर्ति का कुल प्रभामंडल सर्वाधिक होना

सामान्य व्यक्ति अथवा वस्तु का कुल प्रभामंडल सामान्यतः १ मीटर होता है । तीनों गणेशमूर्तियों का प्रयोग से प्राप्त कुल प्रभामंडल इस प्रकार था ।

गणेशमूर्ति का प्रकार कुल प्रभामंडल (मीटर में)
१. गोमय गणेशमूर्ति २.२०
२. सनातन-निर्मित शास्त्रीय रंगीन गणेशमूर्ति २.३५
३. सनातन-निर्मित शास्त्रीय श्‍वेत रंग की मूर्ति ३.४७

 

उपरोक्त सभी सूत्रों का अध्यात्मशास्त्रीय विश्‍लेषण ‘सूत्र ३’ में दिया है ।

 

३. प्रयोग से प्राप्त निरीक्षणों का अध्यात्मशास्त्रीय विश्‍लेषण

३ अ. गोमय से बनी गणेशमूर्ति अशास्त्रीय होने से तथा उस मूर्ति से वातावरण में
नकारात्मक स्पंदन प्रक्षेपित  होने के कारण वह मूर्ति उपासक को आध्यात्मिक दृष्टि से लाभदायक न होना

गोमाता का मूत्र एवं गोबर (गोमूत्र एवं गोमय) सात्त्विक होता है । गोमय से भूमि लीपना, गोमूत्र से वास्तूशुद्धि करना यह आध्यात्मिक दृष्टि से उचित है; क्योंकि ऐसा करने से उस भूमि के एवं वहां के वातावरण में विद्यमान नकारात्मक स्पंदन नष्ट होते हैं । गोमय सात्त्विक होने के कारण उससे बनी गणेशमूर्ति में सकारात्मक ऊर्जा पायी गई; परंतु उस गणेशमूर्ति में नकारात्मक स्पंदन भी पाए गए । इस कारण पूजन हेतु गोमय से बनी गणेशमूर्ति का पूजक को लाभ नहीं होगा । इसका कारण यह कि गोमय से गणेशमूर्ति बनाना धर्मशास्त्र के विपरीत है । ऐसी धर्मशास्त्र के विपरीत बनी गणेशमूर्ति में गणेशतत्त्व आकर्षित नहीं होता; इसीलिए भी गोमय गणेशमूर्ति में नकारात्मक स्पंदन होते हैं । धर्मशास्त्र के अनुसार श्री गणेशमूर्ति कैसी होनी चाहिए, यह आगे बताया है ।

अध्यात्मशास्त्र के अनुसार अर्थात मूर्तिशास्त्र के अनुसार गणेशमूर्ति शाडू मिट्टि से बनी एवं प्राकृत रंगों से रंगी होनी चाहिए । मूर्तिशास्त्र के अनुसार बनी गणेशमूर्ति में गणेशतत्त्व अधिकाधिक मात्रा में आकर्षित होकर उसका श्रद्धालु को लाभ हो सकता है । अध्यात्मशास्त्र के अनुसार किया गया कोई भी कृत्य प्रकृति के समीप जानेवाला; अर्थात पर्यावरण के लिए पूरक ही होता है ।

पर्यावरण रक्षण के नाम पर निकाले शास्त्र के विपरीत पर्यायों के कारण, अर्थात ‘कागद की लुगदी की गणेशमूर्ति(टिप्पणी), गोमय गणेशमूर्ति जैसी अशास्त्रीय गणेशमूर्ति बनाने के कारण पर्यावरण की रक्षा तो होती ही नहीं, वरना शास्त्र के विपरीत कृत्य करने के कारण धर्म की हानि होती है और पाप भी लगता है । यह हानि टालने एवं धर्मशास्त्र के अनुसार प्रत्येक कृत्य होने के लिए प्रत्येक हिन्दू को धर्मशिक्षा लेना आवश्यक है !

टिप्पणी : ‘महर्षि अध्यात्म विश्‍वविद्यालय’ की ओर से वर्ष २०१७ में कागद की लुगदी से बनाई गणेशमूर्ति के प्रयोग से प्राप्त निरीक्षणों में उस गणेशमूर्ति में अधिक मात्रा में नकारात्मक स्पंदन पाए गए । साथ ही उस मूर्ति में सकारात्मक स्पंदन नहीं पाए गए ।

३ आ. परीक्षण में सनातन-निर्मित शास्त्रीय रंगीन
गणेशमूर्ति एवं सनातन-निर्मित शास्त्रीय श्‍वेत रंग की गणेशमूर्ति
धर्मशास्त्र में बताए गणेशजी के वर्णनानुसार तथा परात्पर गुरु डॉ.आठवलेजी ने
कालानुसार किए मार्गदर्शनानुसार होने के कारण इन मूर्तियों में सकारात्मक ऊर्जा (चैतन्य) होना

‘शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गंध एवं उनसे संबंधित शक्ति सदैव एकत्रित रहती है’, यह अध्यात्मशास्त्र का एक सिद्धांत है । इस कारण जहां देवता का रूप होता है, वहां उसकी शक्ति होती ही है । प्रत्येक देवता के रूप का वर्णन द्रष्टा ऋषि-मुनियों ने धर्मशास्त्र में लिख कर रखा है । मूर्तिकार द्वारा अपनी कल्पना से बनाई किसी देवता की मूर्ति की अपेक्षा धर्मशास्त्र में बताए वर्णनानुसार बनाई देवता की मूर्ति में उस देवता का तत्त्व अधिक मात्रा में होता है । धर्मशास्त्र में एक ही देवता के अनेक नाम एवं उनके नामों के अनुरूप रूपों के उल्लेख मिलते हैं । ऐसे में उपासकों ने कालानुसार देवता के किस रूप की उपासना करना आध्यात्मिक दृष्टि से लाभदायक है, यह केवल अध्यात्म के जानकार अर्थात संत ही बता सकते हैं । प्रयोग हेतु उपयोग में लाई सनातन-निर्मित शास्त्रीय रंगीन गणेशमूर्ति एवं सनातन-निर्मित शास्त्रीय श्‍वेत रंग की गणेशमूर्ति धर्मशास्त्र में बताया गणेशजी का वर्णन तथा कालानुसार परात्पर गुरु डॉ. आठवले जी ने किए मार्गदर्शनके अनुसार बनाई गई है, इसलिए परीक्षण में इन दोनों गणेशमूर्तियों में सकारात्मक ऊर्जा पाई गई और उनका कुल प्रभामंडल भी अधिक था ।

३ आ १. सनातन-निर्मित शास्त्रीय रंगीन गणेशमूर्ति

यह मूर्ति शास्त्र के अनुसार अर्थात ऋषि-मुनियों द्वारा बताए मूर्तिविज्ञान के अनुसार होने के कारण उससे अधिक मात्रा में सकारात्मक स्पंदन प्रक्षेपित होते हैं । फलस्वरूप यह मूर्ति उपासक के लिए आध्यात्मिक दृष्टि से लाभदायक होती है । ऐसी मूर्ति की पूजा एवं उपासना करना उपासक की दृष्टि से लाभदायक है ।

३ आ २. सनातन-निर्मित शास्त्रीय श्‍वेत रंग की गणेशमूर्ति

यह मूर्ति साधक-मूर्तिकारों ने धर्मशास्त्रानुसार, तथा परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी के मार्गदर्शनानुसार भक्तिभाव से बनाई है । यह मूर्ति आध्यात्मिक दृष्टि से उच्च स्तर के स्पंदन प्रक्षेपित करती है । इसलिए यह मूर्ति उपासक को आध्यात्मिक दृष्टि से अधिक मात्रा में लाभदायक होने के साथ ही उसमें उच्च स्तर की आध्यात्मिक अनुभूति देने की क्षमता भी है ।

 

४. सनातन-निर्मित दो मूर्तियों में रंगीन गणेशमूर्ति पूजन हेतु अधिक उचित !

सनातन-निर्मित रंगीन गणेशमूर्ति सगुण स्तर के सकारात्मक स्पंदन प्रक्षेपित करती है, तो श्‍वेत रंग की गणेशमूर्ति आध्यात्मिक दृष्टि से उच्च स्तरीय निर्गुण स्तर के सकारात्मक स्पंदन प्रक्षेपित करती है । इसीलिए निरीक्षणों में भी पाया गया कि सनातन-निर्मित शास्त्रीय श्‍वेत रंग की गणेशमूर्ति में सकारात्मक ऊर्जा एवं उसका कुल प्रभामंडल सर्वाधिक था । सनातन-निर्मित रंगीन गणेशमूर्ति एवं सनातन-निर्मित श्‍वेत रंग की गणेशमूर्ति दोनों भी उपासक को आध्यात्मिक दृष्टि से लाभदायक होते हुए भी श्‍वेत रंग की गणेशमूर्ति से प्रक्षेपित निर्गुण स्पंदन सामान्य व्यक्ति सह नहीं सकता, इसलिए पूजा हेतु रंगीन गणेशमूर्ति का उपयोग अधिक उचित होगा ।’

– श्रीमती मधुरा धनंजय कर्वे, महर्षि अध्यात्म विश्‍वविद्यालय, गोवा. (३.९.२०१८)