उच्छिष्ट गणपति यज्ञ के समय प.पू. रामभाऊस्वामीजी अग्नि में स्वयं की आहुति देते हैं । उस समय उस अग्नि में अग्नितत्त्व जागृत होकर उन्हें प्रत्यक्षरूप से अग्निदेेव का रूप दिखाई देता है । प.पू. रामभाऊस्वामीजी यज्ञकुंडपर अग्नि के प्रज्वलित होने के समय उसमें स्वयं को समर्पित करते हैं ।
१. प.पू. रामभाऊस्वामीजी को अग्नि की दाहकता प्रतीत नहीं होती । उनका शरीर कहींपर भी नहीं जलता, साथ ही उन्हें कोई भी शारीरिक घाव नहीं होता, इसके पीछे क्या वैज्ञानिक कारण है ?
२. साथ ही यज्ञ की अग्नि में प्रवेश कर भी उनके शरीरपर धारण किए गए वस्र अथवा शॉल नहीं जलती; परंतु इसी शॉल अन्यत्र की अग्निपर रखने से वह तुरंत जल जाती है । इसका क्या वैज्ञानिक कारण है ?
३. उन्होंने वर्ष १९७५ से पानी भी नहीं पिया है । वे वर्ष १९७७ से प्रतिदिन केवल २ केले तथा एक गिलास दूध, इतना ही आहार ले रहे हैं । जिस दिन यज्ञ होता है, उस दिन वे किसी भी प्रकार का आहार नहीं लेते, तो रात में केवळ एक गिलास दूध ही पीते हैं । उनकी आयु ७८ वर्ष होते हुए भी उनका स्वास्थ्य इतना होने का क्या वैज्ञानिक कारण है ?
४. प.पू. रामभाऊस्वामीजी द्वारा किए गए यज्ञ के धुएं का वातावरणपर कितनी दूरीतक तथा क्या परिणाम होता है ?, इस संदर्भ में वैज्ञानिक दृष्टि से शोध करनेवाले यदि हमारी सहायता करते हैं, तो हम उनके प्रति कृतज्ञ रहेंगे ।
– व्यवस्थापक, सनातन आश्रम, रामनाथी, गोवा (संपर्क : श्री. रूपेश रेडकर, ईमेल :[email protected])
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