परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी महान हैं तथा उनके द्वारा हाथ में लिया गया कार्य तो पूर्णता को पहुंचने ही वाला है ! – योगऋषी डॉ. स्वामी सत्यप्रकाश

रामनाथी के सनातन आश्रम में कैनडा स्थित
संगठन ‘विश्‍व’ के संस्थापक डॉ. सत्यप्रकाशजी सम्मानित !

सनातन आश्रम, रामनाथी (गोवा) : सनातन आश्रम के मेरे निवास की कालावधि में मैने साधकों को जो सिखाया, उसके प्रेरणास्रोत परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी हैं । सनातन का आश्रम तो चैतन्य का सागर है । सनातन आश्रम में चलाई जा रही साधकों के स्वभावदोष एवं अहंनिर्मूलन की प्रक्रिया विशेषतापूर्ण है । साधक भले ही स्वभावदोष एवं अहं निर्मूलन हेतु प्रयास करते हों; परंतु केवल परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी के संकल्प के कारण ही उनमें परिवर्तन आ रहे हैं, यह उन्हें ध्यान में लेना होगा । परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी को किसी तीर्थस्थान को जाने की आवश्यकता नहीं है; क्योंकि वे जहां हैं, वही तीर्थस्थान है । डॉ. आठवलेजी ने सबकुछ जान लिया है । उसके कारण ही उन्होंने सभी को अध्यात्म विश्‍वविद्यालय के माध्यम से भारतीय संस्कृति, परंपरा, १४ विद्याएं और ६४ कलाओं का ज्ञान प्रदान करने का कार्य हाथ में ले लिया है । यह कार्य पूर्णता को पहुंचकर रहेगा । कैनडा में स्थित ‘विश्‍व’ नामक संगठन के संस्थापक जगद्गुरु योगऋषी डॉ. स्वामी सत्यप्रकाशजी ने यह भावपूर्ण मार्गदर्शन किया ।

यहां के सनातन आश्रम में १६ अगस्त को जगद्गुरु योगऋषी डॉ. स्वामी सत्यप्रकाशजी तथा उनकी शिष्या डॉ. प्रीती मिश्रा का शुभागमन हुआ । १९ अगस्त को सनातन के संत पू. (डॉ.) मुकुल गाडगीळजी ने कुमकुम तिलक लगाकर, माल्यार्पण कर तथा श्रीफल एवं भेंटवस्तुएं प्रदान कर जगद्गुरु योगऋषी डॉ. स्वामी सत्यप्रकाशजी को सम्मानित किया । उसके पश्‍चात पू. (डॉ.) मुकुल गाडगीळजी ने जगद्गुरु योगऋषी डॉ. स्वामी सत्यप्रकाशजी के चरणोंपर माथा टेककर नमस्कार किया । महर्षि अध्यात्म विश्‍वविद्यालय की संगीत विभाग समन्वयक कु. तेजल पात्रीकर ने योगऋषी डॉ. स्वामी सत्यप्रकाशजी की शिष्या डॉ. प्रीती मिश्रा को सम्मानित किया । उसके पश्‍चात जगद्गुरु योगऋषी डॉ. स्वामी सत्यप्रकाशजी ने उपस्थित साधकों का मार्गदर्शन करते हुए उक्त गौरवोद्गार व्यक्त किए ।

जगद्गुरु योगऋषी डॉ. स्वामी सत्यप्रकाशजी ने अपने मार्गदर्शन में आगे कहा, ‘‘परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी के कारण ही यह सब कार्य हो रहा है । वहीं सभी के प्रेरणास्रोत हैं । हम उनके विद्यार्थी हैं । हम उनसे सीखेंगे और हमारे साधकों को भी इस आश्रम में सिखने हेतु भेजेंगे । संगीत के विषयपर मार्गदर्शन करते हुए स्वामीजी ने कुछ अप्रजलित रागों की जानकारी देकर उन्हें गाकर भी सुनाया । इस संदर्भ में उन्होंने कहा कि मैं अगली बार ‘जयंत’ नामक नए राग का अविष्कार करूंगा और वह ‘आठवले’ नामक नए ताल में निबद्ध होगा ।

परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी द्वारा जगद्गुरु योगऋषी
डॉ. स्वामी सत्यप्रकाशजी के प्रति व्यक्त किए गए गौरवोद्गार !

१. जगद्गुरु योगऋषी डॉ. स्वामी सत्यप्रकाशजी भगवान का रूप है । हमें उनसे सिखने का अवसर मिल रहा है । उन्होंने यहां २-३ दिनों में जो सिखाया है, उसे सिखाने के लिए हमें १० वर्ष लग गए होते ।

२. जगद्गुरु योगऋषी डॉ. स्वामी सत्यप्रकाशजी तथा उनकी शिष्या डॉ. प्रीती मिश्रा के माध्यम से हमें गुरु और शिष्य का एक उच्च कोटि की गुरु-शिष्य परंपरा देखने को मिली । स्वामीजी के सान्निध्य में सभी को अच्छी अनुभूतियां प्राप्त होती हैं ।

 

स्वामीजी की शिष्या डॉ. प्रीती मिश्रा द्वारा सनातन के आश्रम के प्रति व्यक्त गौरवोद्गार

यह आश्रम बहुत ही अच्छा है । यहां केवल ज्ञान ही नहीं, अपितु उसके अनुरूप प्रत्यक्ष आचरण भी करवा लिया जाता है । समाज में हम में विद्यमान स्वभावदोष एवं अहं बताना कठिन होता है और सामान्यरूप से यह कोई किसी को नहीं बताता; किंतु इस आश्रम में साधक खुलेपन से फलकपर अपने दोष और अहं के पहलू लिखते हैं, यह विशेष बात है । ऐसा करवानेवाले परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी महान हैं । हमें हमारे आश्रम के साधकों को भी यह प्रक्रिया सिखानी है । यहां संगीत के प्रति भी बहुत तडप है । यहां के प्रत्येक साधक सकारात्मक है ।

 

श्री. निषाद देशमुख को सूक्ष्म स्तरपर प्रतीत डॉ. स्वामी सत्यप्रकाशजी की विशेषताएं

श्री. निषाद देशमुख

कैनडा स्थित ‘विश्‍व’ संगठन के संस्थापक जगद्गुरु योगऋषी डॉ. स्वामी सत्यप्रकाशजी पिछले कुछ दिनों से सनातन के रामनाथी आश्रम में साधकों का विविध विषयोंपर मार्गदर्शन कर रहे हैं । उनकी सूक्ष्म स्तरपर ध्यान में आईं गुणविशेषताएं यहां दे रहे हैं ।

१. ज्ञानयोगी डॉ. स्वामी सत्यप्रकाशजी !

स्वामीजी के ज्ञानयोगी होने का प्रतीत हुआ । ज्ञानयोगियों की बातों का बुद्धिपर परिणाम होकर शंकाओं का निराकरण होता है । स्वामीजी के मार्गदर्शन से प्रक्षेपित होनेवाले स्पंदन सिर के इर्द-गिर्द घूमते हुए प्रतीत हुआ ।

२. योगियों के अनुसार तडप के साथ
साधना करनेवाले डॉ. स्वामी सत्यप्रकाशजी !

स्वामीजी किसी योगियों की भांति तडप के साथ साधना करते हैं । उनकी व्यष्टि साधना योग के अनुसार होने से वे कई घंटोंतक एक ही स्थिति में बैठकर साधकों का मार्गदर्शन करते हैं । इस समय उनका मन भी विषयपर एकाग्र एवं स्थिर होता है और तब उनके शरीर की किसी प्रकार की हलचल नहीं होती ।

३. योगियों की भांति अद्भुत स्मरणक्षमतावाले डॉ. स्वामी सत्यप्रकाशजी !

जीव के द्वारा पृथ्वीतत्त्वपर विजय प्राप्त करने के पश्‍चात उसे अनेक सूत्रों को ध्यान में रखना संभव होता है । उसके लिए कठोर साधना की आवश्यकता होती है । स्वामीजी की स्मरणक्षमता ऐसी ही है । वे कई विषयोंपर बोलते समय संस्कृत श्‍लोकों का उल्लेख करते हैं और उसके पश्‍चात उनका अर्थ विशद करते हैं । विशेष बात यह कि आयु के ७०वें वर्ष में भी बोलते समय उन्हें अपने सामने कागद नहीं रखना पडता । इससे उनकी अद्भुत स्मरणक्षमता ध्यान में आती है ।

४. ईश्‍वर की इच्छा से व्यष्टि साधना से समष्टि साधना की ओर अग्रसर डॉ. स्वामी सत्यप्रकाशजी !

स्वामीजी अभीतक परेच्छा से आचरण करना, इस स्तरपर रहकर व्यष्टि साधना कर रहे थे; परंतु ईश्‍वर अब उन्हें ‘ईश्‍वरेच्छा से समष्टि साधना करना’, इस चरण की ओर ले जा रहे हैं । सूक्ष्म से ईश्‍वर द्वारा किए जा रहे इस कृत्य के कारण उन्होंने सनातन आश्रम में आकर साधकों का मार्गदर्शन करना आरंभ किया है । इससे उनकी व्यष्टि से समष्टि की हो रही यात्रा ध्यान में आई ।

५. डॉ. स्वामीजी की अन्य विशेषताएं

अ. स्वामीजी के मार्गदर्शन का प्रभाव लंबे समयतक टिकता है, साथ ही अनिष्ट शक्ति के कष्टवाले साधकोंपर भी उसका प्रभाव सहजता से होता है ।

आ. स्वामीजी मार्गदर्शन करते समय कभी-कभी जागृत ध्यानावस्था में होते हैं ।

इ. स्वामीजी के मार्गदर्शन से प्रक्षेपित होनेवाले तरंग स्वर्गलोकतक पहुंचते हैं ।

६. कृतज्ञता

ईश्‍वर की कृपा से स्वामीजी की कुछ गुणविशेषताएं ध्यान में आकर उनका टंकण करना संभव हुआ । इसके लिए भगवान श्रीकृष्ण एवं परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी के चरणों में कृतज्ञता !

– श्री. निषाद देशमुख (सूक्ष्म से प्राप्त ज्ञान), सनातन आश्रम, रामनाथी, गोवा 

 

डॉ. स्वामी सत्यप्रकाशजी के गायन का श्री. राम होनप द्वारा किया गया सूक्ष्म परीक्षण

श्री. राम होनप

१९.८.२०१९ को महर्षि अध्यात्म विश्‍वविद्यालय की ओर से रामनाथी आश्रम में आयोजित कार्यक्रम में कैनडा के ‘विश्‍व’ नामक संगठन के संस्थापक जगद्गुरु योगऋषी डॉ. स्वामी सत्यप्रकाशजी के संगीत के विषय के अध्ययन के आध्यात्मिक कष्टवाले तथा कष्टरहित साधकोंपर विविध संगीत प्रयोग लिए गए । इस समय स्वामीजी ने सप्तचक्र तथा उनसे संबंधित बीजमंत्र, विविध राग और भक्तिगीत गाए । उनका सूक्ष्म परीक्षण, साथ ही स्वामीजी की प्रतीत अन्य आध्यात्मिक गुणविशेषताएं यहां दे रहे हैं ।

१. स्वामीजी जब बोलते हैं, तब ज्ञान प्रकट होता है और जब वे गाते हैं, तब भक्ति प्रकट होती है । ज्ञान एवं भक्ति का सुंदर संगम हैं स्वामीजी !

२. स्वामीजी जब गाते हैं, तब अपनेआप ही श्री सरस्वतीदेवी का स्मरण होता है, साथ ही उनके माध्यम से साक्षात सरस्वतीदेवी ही गा रही हैं, ऐसा प्रतीत होता है ।

३. स्वामीजी के गायन में सदैव आध्यात्मिक मधुरता प्रतीत होती है । मेरे मन में यह प्रश्‍न उठा कि यह मधुरता क्यों है ?, तब मुझे सूक्ष्म से यह उत्तर मिला कि मनुष्य की कभी इडा नाडी, तो कभी पिंगला नाडी चलती है; परंतु स्वामीजी की सुषुम्ना नाडी चलती है । उससे उनकी वाणी में दैवीय मधुरता आई है ।

४. स्वामीजी को हिन्दू और संस्कृत भाषा में काव्य सुझता है और तब वे उसे संगीतबद्ध करते हैं । स्वामीजी की प्रज्ञा अलौकिक है तथा उसके जागृत होने से उन्हें ये बातें बहुत ही सहजता से संभव हैं, ऐसा प्रतीत होता है ।

५. स्वामीजी के गायन का परिणाम चौथे पातालतक होता है । वहांतक की अनिष्ट शक्तियों को स्वामीजी के गायन से प्रक्षेपित होनेवाले चैतन्य के कारण कष्ट होता है ।

६. स्वामीजी ने कुछ समयतक शिवतांडव स्तोत्र गाया । तब सूक्ष्म स्थित अनिष्ट शक्तियोंने शिवजी का ध्यान लगाने का प्रयास किया; किंतु स्वामीजी की भक्ति के कारण मांत्रिकों का ध्यान तुरंत भंग हो रहा था ।

७. ७ स्वरों में २२ श्रुतियां हैं । स्वामीजी जब गायन कर रहे थे, तब मुझे सूक्ष्म के कुछ श्रृतियां नृत्य करती हुई दिखाई दीं । वो महिलाएं युवा थीं और उनके शरीरपर श्‍वेत वेशभूषा थी । उन्होंने सुनहरे आभूषण धारण किए थे । उनके मस्तकपर सुनहरा मुकुट दिखाई दे रहा था । स्वामीजी के गायन में विद्यमान ताल के साथ वे श्रृति नृत्य करती हुई दिखाई दीं । इन श्रृतियों के प्रसन्न होने का यह दर्शक है ।

८. स्वामीजी का गायन भावपूर्ण होने के कारण आध्यात्मिक कष्टवाले साधकों का भाव भी जागृत हो रहा था अथवा उनमें भाववृद्धि हो रही थी । उसके कारण साधकों के शरीर में प्रदत्त काली शक्ति मोम के पिघलने की भांति पिघलती हुई दिखाई दे रही थी ।

९. स्वामीजी ने प्रत्येक कुंडलिनीचक्र से संबंधित बीजमंत्रों का ७ -८ बार उच्चारण किया । तब आध्यात्मिक कष्टवाले साधकों के संबंधित कुंडलिनीचक्रपर उसका परिणाम होकर वहां की काली शक्ति अल्प होती हुई दिखाई दी ।

– श्री. राम होनप (सूक्ष्म से प्राप्त ज्ञान), सनातन आश्रम, रामनाथी, गोवा

स्रोत : दैनिक सनातन प्रभात