शिवपिंडीकी विशेषताएं एवं कार्य

 

सारिणी


 

१. शिवपिंडी एवं नंदीके मध्य खडे रहकर दर्शन क्यों न करें ?

शिवजीसे प्रक्षेपित शक्तिशाली सात्त्विक तरंगें सर्वप्रथम नंदीकी ओर आकृष्ट होती हैं, तदुपरांत वातावरणमें प्रक्षेपित होती हैं । विशेष यह है कि, ये तरंगें नंदीके माध्यमसे आवश्यकतानुरूप प्रक्षेपित होती हैं । इस कारण पिंडीके दर्शन करनेवालेपर शिवजीसे प्रक्षेपित शक्तिशाली तरंगें सीधे नहीं पडतीं; अर्थात उसे तरंगोंसे कष्ट नहीं होता ।शिवजीसे प्रक्षेपित तरंगें सात्त्विक ही होती हैं । परंतु सर्वसामान्य भक्तका आध्यात्मिक स्तर अधिक न होनेके कारण उसमें उन सात्त्विक तरंगोंको सहनेकी क्षमता नहीं होती । इसलिए शिवपिंडी एवं नंदीके मध्यमें खडे होकर दर्शन करनेपर उसे विविध कष्ट हो सकते हैं, जैसे सिर भारी होना, चक्कर आना, गर्माहट होना इत्यादि । अतः पिंडीके दर्शन करते समय पिंडी एवं नंदीके मध्यमें नहीं; बल्कि पिंडी एवं नंदीको जोडनेवाली रेखाके समीप खडे रहें अथवा बैठें । शिवजीकी उपासनामें शिवपिंडीके पूजनका विशेष महत्त्व है ।

 

२. शिवपिंडीके बारेमें

भग-प्रतीक ‘अरघा’ एवं लिंग-प्रतीक ‘लिंग’ इनके संयोजनसे पिंडी निर्माण हुई है । भूमि अर्थात सृजन एवं शिव अर्थात पवित्रता । शक्ति बिना शिव कुछ भी नहीं कर सकते; इसलिए शिवके साथ शक्तिका पूजन किया जाता है । पिंडीरूप शिवलिंग शक्तिका प्रतीक है ।

३. शिवपिंडीकी विशेषताएं

३ अ. शिवतत्त्व, शिवमें विद्यमान त्रिगुण अर्थात सत्त्व, रज एवं तम तथा सू्क्ष्म-तरंगें आकृष्ट कर उन्हें प्रक्षेपित करनेका सामर्थ्य शिवपिंडीमें होता है ।

३ आ. शिवपिंडीद्वारा ४० प्रतिशत तारक शक्ति तथा ६० प्रतिशत मारक शक्ति निरंतर प्रक्षेपित होती रहती है । आवश्यकतानुसार इसकी मात्रामें परिवर्तन होता है ।

३ इ. ज्योतिर्लिंग स्वयंभू होनेके कारण उससे सघन मात्रामें शिवतत्त्वका तेज एवं शक्ति प्रक्षेपित होती रहती है ।

३ ई. भूमिपर होनेवाली शिवपिंडीमें निर्गुण तत्त्व ५ प्रतिशत एवं शिवकी १० प्रतिशत मारक शक्ति तथा तेज प्रक्षेपित होता है । सर्वसामान्य व्यक्ति इसे सहपानेमें असमर्थ होनेके कारण कुछ स्थानोंपर शिवपिंडी भूतलके नीचे होती है ।

३ उ. शिवपिंडीसे निरंतर तेज एवं शक्तिका प्रक्षेपण होता रहता है । इससे शिवपिंडीके निकट तापमानमें वृद्धि होती है तथा वहांपर उष्णताका अनुभव होता है । इसलिए शिवपिंडीपर जलधाराका प्रवाह बनाए रखना चाहिए । इससे तापमान नियंत्रित रहता है ।

 

४. शिवपिंडीके कारण सूक्ष्म-स्तरपर होनेवाले परिणाम

 

महाराष्ट्रके सिंधुदुर्ग जिल्ह्मेमें कुणकेश्वर गावमें स्थित श्री कुणकेश्वरकी पिंडीका सूक्ष्म चित्र पिंडीके बिचमें बीज मंत्र ॐ कार का नाद स्वरूपमें प्रेक्षपण होता है । यहाँ पर अनाहत नाद सुनाई देता है । उसके सर्व ओर शांतिका वलय कार्यरत रहता है । इस शांतिके वलयसे शांतिका प्रवाह निकलता है । जो अरघाद्वारा शांतिकी तरंगोंका वातावरणमें प्रक्षेपण करता है । इस अरघासे शक्तिके प्रवाह एवं चैतन्यके कण प्रक्षेपित होते है । शिवपिंडीसे चैतन्यके वलयोंका पूरे शिवालयमें प्रक्षेपण होता रहता है । शिवपिंडीद्वारा शक्तिके कणोंका वातावरणमें प्रक्षेपण होता है ।

 

५. शिवपिंडीका कार्य

५ अ. ज्ञान, भक्ति एवं वैराग्य तरंगें प्रक्षेपित करना

शिवपिंडीद्वारा सत्त्वप्रधान ज्ञानतरंगें, रजोप्रधान भक्तितरंगें एवं तमप्रधान वैराग्यतरंगें प्रक्षेपित होती रहती हैं । महाशिवरात्रिके दिन इस प्रक्षेपणमें ३० प्रतिशत वृद्धि होती है ।

५ आ. चैतन्य, आनंद एवं शांतिकी सूक्ष्म-तरंगें प्रक्षेपित करना

शिवपिंडीद्वारा चैतन्य, आनंद एवं शांतिकी सूक्ष्म-तरंगें प्रक्षेपित होती रहती हैं । महाशिवरात्रिके दिन इस प्रक्षेपणमें २५ प्रतिशत वृद्धि होती है । इससे शिवपिंडीके दर्शन करनेवाले श्रद्धालुओंके सूक्ष्म-देह शुद्ध होते हैं एवं आवश्यकतानुसार सूर्य नाडी अथवा सुषुम्ना नाडी जागृत होती है । साथही उनके देहोंकी सत्त्वगुण एवं चैतन्य ग्रहण करनेकी क्षमता बढती है । शिवपिंडीमें विद्यमान शिवके निर्गुण तत्त्वके कारण एवं प्रक्षेपित होनेवाली शांतिकी तरंगोंके कारण शिवपिंडीके निकट शीतलता अनुभव होती है एवं मन शांत होता है ।

५ इ. मारक एवं तारक शक्ति प्रक्षेपित करना

शिवपिंडीमें शिवका निर्गुण एवं निर्गुण-सगुण तत्त्व, तथा तारक तथा मारक तत्त्वोंका संगम होता है । इससे दर्शनार्थीको आवश्यक तत्त्वका लाभ होता है । शिवपिंडीद्वारा मारक शक्ति प्रक्षेपित होते समय वहांके तापमानमें वृद्धि होती है । वहां आनंद अनुभव होता है । तथा तारक शक्ति प्रक्षेपित होते हुए वहांका वातावरण शीतल हो जाता है । साथही आनंद एवं शांति की अनुभूति होती है ।

 

६. अरघा अर्थात जलहरीके विषयमें

अरघाका मूल नाम है सुवर्णशंखिनी; क्योंकि शंख अर्थात कौडीका आकार स्त्रीकी सृजनेंद्रिय समान है । अरघाकी पूजा अर्थात मातृदेवीकी पूजा । अरघाके आंतरिक खांचे महत्त्वपूर्ण होते हैं, क्योंकि उनके कारण पिंडीमें निर्माण होनेवाली सात्त्विक शक्ति अधिकतर पिंडीमें एवं गर्भगृहमें अर्थात मंदिरके आंतरिक भागमें गतिशील रहती है । विनाशकारी तमप्रधान शक्ति अरघाके स्रोतसे बाहर निकलती है ।

संदर्भ : सनातन का ग्रंथ ‘शिव’