नटराज

१. उत्पत्ति एवं अर्थ

शिवजी की दो अवस्थाएं मानी जाती हैं । उनमें से एक है समाधि अवस्था एवं दूसरी है ताण्डव अथवा लास्य नृत्य अवस्था । समाधि अवस्था का अभिप्राय निर्गुण अवस्था से है एवं नृत्यावस्था का सगुण अवस्था से । ‘जब किसी निश्‍चित घटना अथवा विषय को अभिव्यक्त करने के लिए भाव-भंगिमाओं सहित शरीर के अवयवों से विविध मुद्राएं की जाती हैं, उसे ‘नटन अथवा नाट्य’की संज्ञा दी जाती है तथा ऐसे नटन करनेवाले को नट कहते हैं । एक पारम्पारिक धारणा यह है कि नटराज के रूप में शिवजी ने ही नाट्यकला को प्रेरित किया है । लोगों की यह धारणा है कि वे ही आद्य (प्रथम) नट हैं, इसीलिए उन्हें नटराज की उपाधि दी गई । ‘ब्रह्मांड नटराज की नृत्यशाला है । वे नर्तक भी हैं एवं इस नृत्य के साक्षी भी । जब उनका नृत्य आरंभ होता है तो उससे उत्पन्न होनेवाली ध्वनि से सम्पूर्ण विश्‍व को गति मिलती है । जब यह नृत्य समाप्त होता है, तो वे चराचर विश्‍व को अपने अन्दर समेटकर अकेले ही आनंद में निमग्न रहते हैं ।’ यही नटराज संकल्पना की भूमिका है । संक्षेप में, ईश्‍वर के समस्त क्रियाकलापों की – उत्पत्ति एवं लय के प्रतिरूप नटराज हैं । नटराज का नृत्य सृष्टि, स्थिति, संहार, तिरोभाव (माया का आवरण) एवं अनुग्रह (माया से परे जाने के लिए कृपा), इन पांच ईश्‍वरीय क्रियाओं का द्योतक माना जाता है ।’ (१२)

२. तांडवनृत्य और उसके सात प्रकार

जिस नृत्य के समय शरीर के भुवनों का अर्थात प्रत्येक कोशिका का नाद शिवकारक होता है, उसे तांडवनृत्य कहते हैं । यह पुरुष नृत्य है और मुद्रांकित होता है उदा. ज्ञानमुद्रा अंगूठे और तर्जनी के सिरे एक-दूसरे से मिलाना । इससे गुरु और शुक्र पर्वत जुडते हैं अर्थात पुरुष और स्त्री जुड जाते हैं ।

२ अ. ताण्डवनृत्य

‘संगीतरत्नाकर में ताण्डवनृत्य की उत्पत्ति इस प्रकार दी है

प्रयोगमुद्धतं स्मृत्वा स्वप्रयुक्तं ततो हरः ।
तण्डुना स्वगणाग्रण्या भरताय न्यदीदिशत् ॥
लास्यमस्याग्रतः प्रीत्या पार्वत्या समदीदिशत् ।
बुद्ध्वाऽथ ताण्डवं तण्डोः मर्त्येभ्यो मुनयोऽवदन् ॥

– संगीतरत्नाकर, अध्याय ७, श्‍लोक ५, ६

अर्थ : तदुपरांत शिवजी को अपने पूर्व किए गए ‘उद्धत’ नृत्यका स्मरण हुआ। उन्होंने अपने गणों में तण्डू नामक प्रमुख गण के माध्यम से वह नृत्य भरतमुनि को दिखाया । उसी प्रकार लास्य नृत्य भी पार्वती के माध्यम से बडे चावसे भरतमुनि को दिखलाया । लास्य स्त्रीनृत्य है, जिसमें हाथ मुक्त रहते हैं । लास्य स्त्री नृत्य है और इसमें हाथ खुले रहते हैं । जो तण्डू ने कर दिखाया वह ताण्डव नृत्य है, भरतादि मुनियों ने यह जाना एवं उन्होंने यह नृत्य मनुष्यों को सिखाया ।

इस नृत्यके ७ प्रकार हैं –

१. आनन्दताण्डव,

२. संध्याताण्डव (प्रदोषनृत्य),

३. कालिकाताण्डव,

४. त्रिपुरताण्डव,

५. गौरीताण्डव,

६. संहारताण्डव,

७. उमाताण्डव ।

इन सात प्रकारोंमें से संध्याताण्डव का वर्णन शिवप्रदोष (अर्थात प्रदोष) स्तोत्र में इस प्रकार आया है – त्रिलोक जननी गौरी को रत्नजडित सिंहासन पर बिठाकर शिवजी संध्या के समय यह नृत्य करने लगते हैं । जब शिवजी नृत्य आरंभ करते हैं, तब अन्य देवता भी उनका साथ देते हैं । मां सरस्वती वीणा बजाती हैं, इंद्रदेवता बांसुरी के स्वर छेडते हैं, ब्रह्माजी ताल देते हैं, लक्ष्मी माता गायन करती हैं, श्रीविष्णु मृदंग बजाते हैं तथा सभी देवी-देवता इस अलौकिक उत्सव का आनंद उठाने के लिए शिवजी को घेर कर खडे हो जाते हैं । इस नृत्य में शिवजीका स्वरूप द्विभुज होता है एवं उनके पैरों तले दैत्य के रौंदे जाने का दृश्य नहीं होता ।

ऊपर दिए सात प्रकारोंमेंसे गौरीताण्डव एवं उमाताण्डव, इन दोनोंका ही स्वरूप उग्र है । इन नृत्योंमें शिवजी भैरव अथवा वीरभद्रके स्वरूपमें होते हैं । उनके साथ उमा अथवा गौरी होती हैं एवं जलती चिताओंसे युक्त श्मशान भूमिमें अपने भूतगणों सहित वे यह भयानक नृत्य करते हैं ।

नटराज के सात्त्विक नृत्यप्रकारों में संध्यानृत्य समान नादान्तनृत्य भी अत्यन्त प्रसिद्ध है । चिदम्बरम् में विश्‍वप्रसिद्ध नटराजमूर्ति इसी नृत्य की मुद्रा में है शैव एवं शाक्त संप्रदाय के लोग इन नृत्यों को विशिष्ट तत्त्वों का प्रतीक मानते हैं । उनके मतानुसार ऐसे संहारक उग्र नृत्यों के समय शिवजी केवल सृष्टि का प्रलय कर रुकते नहीं, अपितु जीव के बंधन भी नष्ट करते हैं । जहां जीवों का अहंकार भस्मसात होता है, ऐसी अवस्था की प्रतीक है श्मशानभूमि । यह नृत्य इसीलिए वहां किया जाता है । शिवजी के ताण्डवनृत्य के दौरान उनका साथ देने के लिए देवता एवं दानव, दोनों एक समान ही उत्सुक रहते हैं ।’

३. ताण्डवनृत्य की विविध मुद्राएं कितनी अर्थपूर्ण होती हैं,
यह आनन्दताण्डव नृत्यकी एक मुद्राके सन्दर्भ में आगे दिए उदाहरण से स्पष्ट होगा ।

अर्थ
१. ‘कानोंमें विभिन्न कुण्डल अर्धनारीश्‍वर
२. दाहिने (पिछले) हाथमें डमरू नाद एवं शब्दब्रह्म की उत्पत्ति
३. बाएं (पिछले) हाथमें अग्नि चराचर की शुद्धि
४. दाहिना (अगला) हाथ भक्तों को अभय
५. बायां (अगला) हाथ जीवों की मुक्ति हेतु ऊपर उठाए पैरकी ओर संकेत कर रहा है ।
६. दाहिने पैर के नीचे रौंदा हुआ ‘अपस्मार’ अथवा ‘मुयलक’ नामक दैत्य अविद्या अथवा अज्ञान का नाश
७. आस-पास के चक्र मायाचक्र
८. चक्र से लगा हाथ एवं पैर माया को पवित्र कर रहा है ।
९. चक्र से निकले ज्वालांकुरों से तेजस्वी रूप में प्रक्षेपित होनेवाले पांच स्फुलिंग (चिंगारी) सूक्ष्म पंचतत्त्व’

 

४. लास्य एवं ताण्डव नृत्य

लास्यनृत्य ताण्डवनृत्य
१. नर्तक स्त्री पुरुष
२. मुद्रा पदन्याससे (चालसे) सम्बन्धित है । होना अनावश्यक है ।
३. अभिनय (टिप्पणी १) है नहीं

टिप्पणी १ – अभिनय : यह शब्द अभि + नय से बना है । ‘अभि’ का अर्थ है व्यवस्थित, अखण्ड एवं ‘नी – नय्’ का अर्थ है भावना । अभिनय से तेज का निर्माण होता है । भरतमुनि के नाट्यशास्त्र को ‘पांचवा वेद’ कहते हैं ।

संदर्भ : सनातन-निर्मित ग्रंथ ‘भगवान शिवसम्बन्धी अध्यामशास्त्रीय विवेचन’

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