
१. उत्साहित एवं आनंदित
श्री. कुलकर्णीकाका भले ही दोपहर को मिलें अथवा देररात मिलें, तब भी वे सदैव उत्साहित एवं आनंदित होते हैं । वे ओजस्वी दिखाई देते हैं । जब कभी मुझे निराशा आनेपर मैं उनसे मिलती हूं, तब उनके साथ बात करनेपर मैं उत्साहित बन जाती हूं ।
२. ईश्वर के साथ अनुसंधान
अ. बचपन से ही उन्हें ईश्वर के साथ बोलने में रूचि है । वे बचपन में ईश्वर को सबकुछ बताते थे । अब भी वे ईश्वर के साथ बोलते हैं ।
आ. वे युवावस्था में प्रति शनिवार भद्रा हनुमानजी के दर्शन करने (संभाजीनगर से लगभग २५ कि.मी. दूर) पैदल जाते थे । उसके पश्चात भी वे नियमितरूप से प्रति शनिवार वाहन से जाते थे । सेवा में व्यस्तता बढने के पश्चात उनका हनुमानजी के दर्शन के लिए जाना न्यून हुआ ।
इ. उन्हें सेवा हेतु सुबह शीघ्र बाहर जाना हो, तो वे शीघ्र जागकर देवतापूजन करते हैं ।
ई. उन्होंने अपने कार्यालय के एक कक्ष को गोबर से पोताई कर वहां ध्यानमंदिर बनाया है । काकाजी वहां बैठकर नामजप करते हैं ।
उ. एक बार मैं धुले के अधिवेशन के पश्चात काकाजी के साथ चौपहिया वाहन से संभाजीनगर आई थी । तब काकाजी संपूर्ण यात्रा में ऊंचे स्वर में नामजप कर रहे थे ।
३. आध्यात्मिक उपाय का महत्त्व समझकर लेना
काकाजी नामजप करते समय भ्रमणभाषपर कभी नहीं बोलते । उन्होंने दैनिक सनातन प्रभात से टोपी बनाई है । दैनिक सनातन प्रभात में विद्यमान चैतन्य का लाभ मिले; इस हेतु वे यात्रा में भी यह टोपी पहनते हैं ।
४. गुरुकार्य का निदिध्यास

अ. भले ही वे कितने भी व्यस्त हों; परंतु जनपद में जब भी राष्ट्रीय हिन्दू आंदोलन अथवा निषेध फेरी का आयोजन होता है, तब वे उसमें स्मरणपूर्वक उपस्थित होते हैं । वे वहां आनेपर भी अपना अलगपन न संजोते हुए साधकों से ध्वज मांगकर सभी साधकों की भांति हाथ में ध्वज लेते हैं ।
आ. उन्हें जब भी हिन्दू राष्ट्र-जागृति सभा अथवा राष्ट्रीय हिन्दू आंदोलन के आयोजन की सूचना मिलती है, तब वे स्वयंस्फूर्ति से उसकी सफलता हेतु प्रार्थना करते हैं ।
इ. वे दैनिक सनातन प्रभात में दी जानेवाली सूचनाओं का गंभीरता से अचूक पालन करते हैं । वे दैनिक सनातन प्रभात पढने के पश्चात अपने भाई को देते हैं और उन्हें अन्य लोगोंतक पहुंचाने का अनुरोध करते हैं ।
५. अल्प अहं
अ. वे कभी भी स्वयं का बडप्पन नहीं बताते । परात्पर गुरुदेव भी यदि कब उनकी प्रशंसा करते हैं, तब वे उसका कभी उल्लेख नहीं करते; परंतु गुरुदेवजी ने चपळगावकरकाकाजी के संदर्भ में कुछ कहा हो, तो वे उस संदर्भ में प्रशंसा कर दूसरों को बताते हैं ।
आ. वे ‘मैं कुछ नहीं करता; परंतु आप सभी लोग बहुत कुछ करते हैं’, ऐसा कहते हुए अन्यों की प्रशंसा करते हैं ।
६. सूक्ष्म से जानने की क्षमता
एक बार काका अधिवेशन हेतु आए हुए थे । तब कार्यालय के मुख्य प्रवेशद्वार के पास जाते ही उन्हें कष्ट प्रतीत हुआ, तब उन्होंने तुरंत उस संदर्भ में बताया ।
७. भाव
अ. काकाजी के कार्यालय जानेपर वहां बहुत चैतन्य प्रतीत होता है । काकाजी में विद्यमान भा के कारण वहां जानेपर मंदिर में जाने जैसा प्रतीत होता है ।
आ. उनके कार्यालय में संत भक्तराज महाराज का छायाचित्र है । काकाजी के भाव के कारण वह छायाचित्र जीवंत होने का प्रतीत होता है ।
८. गुरुदेवजी के प्रति असीम श्रद्धा
वे कहते हैं, ‘‘मुझपर गुरुदेवजी की कृपा है; इसलिए मुझे किसी प्रकार का कष्ट नहीं अथवा किस बात का भय नहीं है ।’’ अलग-अलग प्रकार के न्यायालयीन प्रकरण चलाते समय भी उन्हें कुछ नहीं होगा’, यह उनमें दृढ श्रद्धा है ।
– कु. चैताली डुबे, संभाजीनगर
(प्रस्तुत लेख पू. सुरेश कुलकर्णीजी के संतपद प्राप्त करने के पहले का है । इसलिए इस लेख में उनका उल्लेख पूजनीय के रूप में न कर श्री. कुलकर्णीकाका किया गया है । – संकलक)
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