‘सत्यनारायण’ कथा का उद्गम स्थान तथा तीर्थस्थान‘नैमिषारण्य’ की महिमा !

सद्गुरु (श्रीमती) अंजली गाडगीळजी की दैवीय यात्रा

सद्गुरु (श्रीमती) अंजली गाडगीळजी

मयन महर्षिजी द्वारा बताए जाने के अनुसार चैत्र पूर्णिमा के दिन अर्थात १९.४.२०१९ को रामनाथी आश्र में सद्गुरु (श्रीमती) बिंदा सिंगबाळजी ने, तो उत्तर प्रदेश में तीर्थस्थान नैमिषारण्य में सद्गुरु (श्रीमती) अंजली गाडगीळजी ने सत्यनारायण पूजन किया । श्रीमहाविष्णुजी ने सबसे पहले नारद महर्षिजी को सत्यनारायण कथा विशद की थी । द्वापरयुग के अंत में शौनकादि सभी ऋषिमुनी जब सूतऋषी से ‘आनेवाले विभिषिक कलियुग में मनुष्य को तरने हेतु कौनसा व्रत करना चाहिए ?’, यह पूछते हैं, उस समय सूतऋषी नैमिषारण्य क्षेत्र में सत्यनारायण का व्रत बताकर उसकी कथा भी सुनाते हैं । ऐसे पवित्र नैमिषारण्य की महिमा आगे दी गई है ।

श्री. विनायक शानभाग

१. स्थान एवं महत्त्व

उत्तर प्रदेश राज्य की राजधानी लक्ष्मणपुरी (लखनऊ) से ९० कि.मी. की दूरीपर सीतापुर जनपद में नैमिषारण्य स्थित है । वह गंगा नदी के गंगानदी की उपनदी गोमती नदी के बाएं तटपर स्थित है । नैमिषारण्य को नीमसार अथवा नैमिषा भी कहा जाता है । नैमिषारण्य सत्ययुग का तीर्थस्थान है तथा उसे पृथ्वी का सबसे पहला तीर्थस्थान माना जाता है । यहां ३३ कोटि देवी-देवता एवं ८८ सहस्र ऋषी-मुनियों का नित्य वास होता है । अतः इसे सबसे पवित्र स्थान माना जाता है । यहां किया जानेवाला प्रत्येक कर्म फलिभूत होता है ।

 

२. ‘नैमिषारण्य’ नाम पडने का इतिहास

२ अ. जिस स्थानपर ब्रह्माजी का चक्र आकर गिरकर वहां पानी उछल गया, वही है यह चक्रतीर्थ !

नैमिषारण्य को ‘नेमिषारण्य’ भी कहा जाता है । ‘नेमी’ का अर्थ चक्र की किनार । इस स्थानपर ब्रह्माजी का मनोमय चक्र आकर गिरा था, वह स्थान है नेमिषारण्य !’ जिस स्थानपर चक्र की किनार भूमिपर गिर गई, वह है चक्रतीर्थ ! (चक्र के आकारवाला तीर्थस्थान) तथा उसका आसपास के अरण्य को नैमिषारण्य नाम से जाना जाने लगा ।

२ आ. नैमिषारण्य क्षेत्र में हुआ चक्रतीर्थ का निर्माण

विश्‍व की उत्पत्ति के पश्‍चात सभी ऋषीमुनी ब्रह्माजी के पास ग, और उन्होंने सभी पापों से मुक्त होने हेतु, अखंड साधना हेतु और ज्ञानप्राप्ति हेतु, साथ ही समस्त मनुष्यजाति के कल्याण हेतु आध्यात्मिक विधि के लिए योग्य स्थान कौनसा है, यह बताने की प्रार्थना की । तब ब्रह्माजी ने उनसे ‘‘उसके लिए मैं मनोमय चक्र भेजूंगा । वह जिस स्थानपर गिरेगा, वह स्थान आपके लिए अपेक्षित पवित्र स्थान का केंद्रबिंदु होगा’’, ऐसा बताकर उस चक्र के छोडा । तब सभी ऋषीमुनी उस चक्र के पीछे गए । समस्त विश्‍व की अनेक बार परिक्रमा करन के पश्‍चात वह चक्र एक निर्जन स्थानपर जाकर रुक गया ।

उस शक्तिशाली चक्र के बिजली की गति से पृथ्वीपर गिर जाने से पाताल लोक भंग होकर उससे बडी मात्रा में पानी उछलने लगा । तब ब्रह्माजी ने ललितादेवी को उस चक्र को रोकने के लिए कहा । तब ललितादेवी ने अपनी दिव्य शक्ति से उस चक्र को रोका और वे उस स्थानपर लिंगधारिणी के रूप में स्थिर हो गईं । तब से लेकर ब्रह्माजी का मनोमय चक्र जिस स्थानपर रुका तथा उसके आसपास के अरण्य को नेमिषारण्य अथवा नैमिषारण्य के नाम से जाना जाने लगा । पृथ्वीपर जहां यह चक्र गिरा और जहां से पानी उछला, वह चक्रतीर्थ बन गया । ऐसा कहा जाता है कि यह स्थान विश्‍व का केंद्र है । उसके पश्‍चात यह स्थान सभी संत एवं ऋषीमुनियों की ध्यानधारणा का केंद्रस्थान बन गया ।

 

३. ‘नैमिषारण्य’ की स्थानमहिमा

अ. व्यास मुनीजी ने नैमिषारण्य में ४ वेद, ६ शास्त्र और १८ पुराण लिखें । यही उनके प्रिय शिष्य जैमिनी ऋषीजी ने सामवेद की शिक्षा दी ।

आ. नैमिषारण्य में ही श्री सत्यनारायण व्रत का आरंभ हुआ ।

इ. यह एक शक्तिपीठ है तथा यहां नैमिषारण्य की प्रमुख देवता के रूप में श्री ललितादेवी का पूजन किया जाता है । सोमवती अमावस्या अथवा पूर्णिमा की तिथि को चक्रतीर्थ में स्नान कर श्री ललितादेवी को अर्पर देने से (अथवा हवन करने से) व्यक्तिद्वारा उसके जीवनभर में हुए सभी पापकर्मों से उसे मुक्ति मिलती है ।

– संग्राहक : श्री. विनायक शानभाग, देहली (२७.४.२०१९)

स्त्रोत : दैनिक सनातन प्रभात