श्रीकृष्णजी का क्षेत्र गुजरात के प्राचीन गणपति मंदिर की विशेषता एवं महत्त्व !

साक्षात भगवान श्रीकृष्णजी द्वारा पूजित गणपतिपुरा के मंदिर में पूजित सिद्धिविनायक के दर्शन करती हुईं सद्गुरु (श्रीमती) अंजली गाडगीळजी

 

१. हिन्दू राष्ट्र स्थापना में उत्पन्न बाधाएं दूर होने हेतु सद्गुरु
(श्रीमती) अंजली गाडगीळजी गुजरात राज्य जाकर गणेशजी का नामजप करें !

१९.३.२०१९ को पू. (डॉ.) उलगनाथन्जी ने बताया, ‘‘परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी के हिन्दू राष्ट्र स्थापना के कार्य में उत्पन्न बाधाएं दूर होने हेतु सद्गुरु (श्रीमती) अंजली गाडगीळजी गुजरात राज्य की राजधानी के पास जो गणेशजी का प्राचीन मंदिर है, उस मंदिर में जाकर वहां बैठकर ५ मिनटतक नामजप करें तथा इस मंदिर की जानकारी लें ।’’

 

२. प्राचीन गणपति मंदिर का इतिहास !

महर्षिजी द्वारा बताए जाने के अनुसार जब हमने इस मंदिर की जानकारी ली, तब हमें निम्नांकित जानकारी मिली –

२ अ. भगवान श्रीकृष्ण एवं पांडवों द्वारा ५५०० वर्ष पूर्व ‘सिद्धिविनायक’ गणेशजी का पूजन किया जाना

‘गुजरात राज्य की राजधानी कर्णावती से ५० कि.मी. दूर गणपतिपुरा नामक एक गांव है । वहां गुजरात का सबसे प्राचीन स्वयंभु गणपति मंदिर है । इस मंदिर के पुजारियों ने हमें बताया, ‘‘‘५,५०० वर्ष पूर्व श्रीकृष्णजी एवं पांडवों ने इस गणपति की पूजा-अर्चना की थी । ऐसा कहा जाता है कि इस गणपति की पूजा-अर्चना के पश्‍चात श्रीकृष्णजी ने द्वारका में रहकर अनेक वर्षोंतक राज्य किया । इस गणपति का नाम ‘सिद्धिविनायक’ है । भगवान श्रीकृष्णजी इस गणेशजी की पूजा-अर्चना करते थे; इसलिए इस स्थान को पहले ‘गणेश द्वारका’ कहा जाता था । जब पांडव श्रीकृष्णजी से मिलने द्वारका जाते थष, तब प्रत्येक बार इस गणपति के दर्शन कर ही वे आगे बढते थे ।

२ आ. एक किसान को हल चलाते समय स्वयंभू गणेशजी की मूर्ति मिलना तथा
श्री गणेशजी की इच्छा से ही उस मूर्ति की उस स्थानपर स्थापना होकर उसे ‘गणपतिपुरा’ नाम पडना

कलियुग में अनेक वर्षोंतक किसी को इस मंदिर के विषय में जानकारी नहीं थी । ८०० वर्ष पूर्व कर्णावती के निकट स्थित ‘कोट’ नामक गांव को एक किसान को खेत में हल चलाते समय स्वयंभू गणेशजी की एक मूर्ति मिली, जो दाहिनी सूंडवाली थी ।

इस मूर्ति के कानों में कुंडल, पैर में सोने के तोडे, मस्तकपर मुकुट और कमर में कमरपट्टा भी था । इस मूर्ति के मिलते ही आसपास के गांवों के अनेक लोग वहां इकट्ठा हुए और प्रत्येक व्यक्ति को ऐसा लगने लगा कि हमारे गांव के मंदिर में ही इस मूर्ति की स्थापना होनी चाहिए । उसके पश्‍चात सभी की सहमति से इस मूर्ति को एक बिना बैलवाली बैलगाडी में रखा गया । मूर्ति रखनेपर बैलगाडी ने अपनेआप चलना आरंभ किया और वह एक स्थानपर रुक गई और उस गाडी से वह मूर्ति अपनेआप नीचे आ गई । उसी स्थानपर उस मूर्ति की स्थापना की गई और इस स्थान को ‘गणपतिपुरा’ नाम पडा । इस मूर्ति को घी और सिंदूर का लेप लगाए जाने से मूर्ति का रंग सिंदुरी है ।’

स्रोत : दैनिक सनातन प्रभात

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