भक्तों के मन में भाव एवं भक्ति निर्माण करनेवाले कळंब (जिला यवतमाळ) के प्रसिद्ध श्री चिंतामणी की महिमा !

श्री चिंतामणी

यवतमाळ-नागपुर राज्य महामार्ग पर यवतमाळ से २३ कि.मी. के अंतर पर श्री क्षेत्र कळंब गांव के प्रसिद्ध श्री चिंतामणी मंदिर लाखों भाविकों के श्रद्धास्थान हैं । इस प्रसिद्ध श्री चिंतामणी मंदिर के विषय में तथा श्री चिंतामणी की आख्यायिका जान लेते हैं ।

हिन्दू संस्कृति में किसी भी शुभकार्य का आरंभ अथवा किसी भी देवता की पूजा करते समय प्रथम श्री गणपतिपूजन करते हैं, इसके साथ ही वे विघ्नहर्ता होने से लोकनाट्य से लेकर विवाह तक, गृहप्रवेशादि सर्व विधियों का आरंभ श्री गणेशपूजन से होता है । ऐसे श्री गणपति के अनेक स्थान प्रसिद्ध हैं । इनमें से एक स्थान के विषय में हम जान लेते हैं ।

 

१. श्री चिंतामणि मंदिर की जानकारी और मूर्ति की विशेषताएं

यह मंदिर कळंब के भूभाग से ३५ फुट नीचे है । मंदिर के प्रवेशद्वार से अंदर बाईं ओर २९ सीढियां उतरकर नीचे जानेपर सामने ही श्री गणेशकुंड है । श्री गणेशकुंड के सामने ही मुख्य गर्भगृह में देवेंद्रवरद श्री चिंतामणी की नयनमनोहर एवं अनुपम मूर्ति है । देवराज इंद्र एवं अन्य असंख्य भक्तों पर कृपा करनेवाले देवता, ऐसी श्री चिंतामणीदेव की ख्याति है । इस मूर्ति की विशेषता यह है कि यह मूर्ति दक्षिणाभिमुख है । देवराज इंद्र उत्तर की ओर मुख कर तपस्या के लिए बैठे और उनके सामने श्री गणेश प्रकट हुए । उसी स्थान पर और उसी स्वरूप में मूर्ति की स्थापना होने से इस मूर्ति का मुख दक्षिण की ओर होना चाहिए, ऐसे कहा जाता है । मूर्ति के दोनों ओर शंकरजी की पिंडी हैं, इसके साथ ही श्री नग्नभैरव शिवपिंड है ।

इसी अष्टकोण कुंड में प्रत्येक १२ वर्षों में गंगा आती है । कुंड के पानी का स्तर बढता है और सामने गर्भगृह के श्रीचरणों का स्पर्श होते ही उस कुंड का पानी अपनेआप घटने लगता है ।
भूभाग से ३५ फुट नीचे कळंब का श्री चिंतामणि मंदिर

मंदिर के प्रवेशद्वार पर पुरातन चौमुखी गणेशमूर्ति है । इस मूर्ति की विशेषता यह है कि एक ही शिला में चारों दिशा में चार गणेशमुख होने से प्रत्येक मूर्ति के हाथ एक-दूसरे से मिले हुए हैं । कहते हैं, गांव के उत्तर की ओर प्राचीन गढी की खुदाई करते समय यह मूर्ति मिली थी । यह मंदिर किसने, कब ओर कैसे निर्माण किया, इसका उल्लेख नहीं मिलता है ।

 

२. देवराज इंद्र द्वारा चिंतामणी की स्थापना की आख्यायिका

श्री गणेशपुराण एवं श्रीमद् मुद्गल पुराण में कळंब क्षेत्र का उल्लेख पाया जाता है । उसमें से मुद्गल पुराण की कथा विस्तृत स्वरूप में होने से उसका सारांश आगे दिए अनुसार है ।

एक बार ब्रह्मदेव ने एक अभूतपूर्व रुपवती युवती निर्माण की । उसका नाम देवी अहिल्या था । देव, दानव, यक्ष, किन्नर, गंधर्व, नाग, राक्षस आदि सभी उसके सौंदर्य पर मोहित हो गए । उसे प्राप्त करने की कामना से प्रत्येक जन ब्रह्मदेव से प्रार्थना करने लगा । अंत में ब्रह्मदेव ने घोषित किया, जो कोई भी प्रथम पृथ्वीप्रदक्षिणा कर लेगा, उसे ही अहिल्या प्रदान की जाएगी । यह सुनकर सभी अपने-अपने वाहनों से वेग से निकले । यह समाचार आर्यावर्तात रहनेवाले महर्षि गौतम के कानों पर भी पडी । उनके आश्रम में उसी समय एक गाय प्रसूत हो रही थी । प्रसूतीशील गाय की प्रदक्षिणा करने पर पृथ्वी प्रदक्षिणा का पुण्य मिलता है, इस शास्त्रवचन के आधार पर उन्होंने उस अर्धप्रसूत गोमाता की प्रदक्षिणा लगाई और ब्रह्मदेव से देवी अहिल्या को मांगा । शास्त्र का आधार होने और उस समयसूचक ऋषिवर को ब्रह्मदेव ने अपनी कन्या यथाविधि सत्कारपूर्वक प्रदान की । पृथ्वी प्रदक्षिणा के लिए गए देवराज इंद्र सबसे पहले पृथ्वीप्रदक्षिणा पूर्ण कर लौट आए; परंतु उपयोग क्या ? इंद्र अत्यंत खिन्न हो गया । अब सीधे नहीं, तो कपट से मैं अहिल्या को प्राप्त करूंगा, ऐसा आत्मविनाशी विचार इंद्र के मन में आया और उसने एक दिन महर्षि गौतम जब आश्रम में नहीं थे, तब इंद्र ने महर्षि गौतम के वेश में जाकर अहिल्या के साथ दुराचार किया । यह बात महर्षि गौतम के ध्यान में आते ही उन्होंने क्रोधित होकर इंद्र को शाप दे दिया, तू शतक्षतीयुक्त महारोगी होगा । देवराज इंद्र बहुत घबरा गए । उन्होंने देवगुरु बृहस्पतिजी से विनती की । देवगुरु बृहस्पति इंद्रसहित महर्षि गौतम की शरण गए और क्षमा मांगी । महर्षि गौतम ने इंद्र को क्षमा कर, उन्हें गणेश षडाक्षर मंत्र का उपदेश दिया और विदर्भ के कळंबक्षेत्र में जाकर श्री चिंतामणी की तपस्या करने के लिए बताया ।

इंद्र की तपस्या से भगवान श्री गणेश प्रकट हुए । उन्होंने अपने हाथ के अंकुश से वहां एक कुंड निर्माण किया । उस कुंड के पानी से इंद्र रोगमुक्त हो गया । इंद्र ने वहीं पर श्री चिंतामणी की स्थापना की । यही है वह प्रसिद्ध श्री क्षेत्र कळंब !

 

३. श्री चिंतामणि मंदिर के श्री गणेशकुंड में होनेवाली पावन गंगा का आगमन

श्री चिंतामणी की मूर्ति के सामने श्री गणेशकुंड है । यह गणेशकुंड और २० मीटर के अंतर पर मंदिर के ही परिसर में स्थित कुंए के पानी का स्तर अलग-अलग है । श्री चिंतामणि की पूजा के लिए देवराज इंद्र गंगा लाए थे । उसकी प्रचीति आज भी आती है । प्रत्येक बारह-तेरह वर्षों में वहां पावन गंगा अवतरित होती है । इसलिए श्री गणेशकुंड के पानी का स्तर बढने लगता है । कुछ दिनों में गंगा को श्री चिंतामणि के चरणों का स्पर्श होते ही पानी अपनेआप घटने लगता है । ऐसी घटना वर्ष १९१८, १९३३, १९४८, १९५८, १९७०, १९८३ एवं १९९५ में हुईं हैं । अब तक श्री गणेशकुंड की पावन गंगा अवतरण की अवधि १२ वर्ष थी, तब भी उसमें थोडा-बहुत अंतर दिखाई दिया है ।

कळंब क्षेत्र में श्री चिंतामणि देवता की स्थापना देवराज इंद्र ने की है । उसके पीछे कथा इसप्रकार है । देवराज इंद्र गौतमऋषि के शाप से मुक्त होने पर उन्होंने वहीं श्री चिंतामणी गणेश की स्थापना की और पूजन के लिए पृथ्वी पर पानी का कैसे उपयोग करें, इस विचार से उन्होंने उन्हें प्रत्यक्ष स्वर्ग से गंगा का ही आवाहन किया । पूजन पूर्ण होने पर उसे आज्ञा की कि प्रत्येक बारह वर्षों में श्री प्रभु को स्नान करवाते रहना । तब से गंगा अवतरित होती हैं, ऐसी आख्यायिका गंगा आगमन के संबंध में बताई जाती है ।

जब गंगा प्रकट होती है, उस समय महाराष्ट्र और अन्य राज्यों के चिंतामणीभक्त, श्री चिंतामणी और गंगा के दर्शन के लिए लाखों की संख्या में आते थे ।

भक्तों की पुकार पर अविलंब आना आर उनकी चिंताआें का हरण करनेवाले श्री चिंतामणी के चरणों में कोटि-कोटि प्रणाम !

संदर्भ : महिमा चिंतामणी की, लेखक : डॉ. गोपाल पाटील

 

चिंतामणी नाम का अर्थ

चित्त की ५ भूमिकाएं हैं – क्षिप्त, मूढ, विक्षिप्त, एकाग्र और निरुढ ! उन्हें प्रकाशित करनेवाला, अर्थात चिंतामणी । चिंतामणी के भजन से चित्तपंचक का नाश होकर पूर्ण शांति का लाभ होता है । यह उपपत्ति मुद्गलपुराण में दी है ।

 

राष्ट्र और धर्म के कार्य की बाधाएं दूर होकर हिन्दू राष्ट्र की स्थापना होने हेतु श्री गणेश के चरणों में प्रार्थना करेंगे !

हे बुद्धिदाता और विघ्नहर्ता श्री गणेश, राष्ट्र और धर्म का कार्य करने हेतु हमें बुद्धि और शक्ति दें । इस कार्य में आनेवाले संकटों का निवारण करें ! हे श्री गणेश, आप प्राणशक्ति देनेवाले हैं । दिनभर उत्साह से कार्य करने हेतु सभी को शक्ति दें । आपकी कृपा से समस्त हिन्दू संगठित हों और शीघ्र ही हिन्दू राष्ट्र की स्थापना होने दें, यही आपके श्रीचरणों में अनन्यभाव से प्रार्थना है !

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