सप्तलोक की संकल्पना पर आधारित और प्रगत स्थापत्य शास्त्र का नमुना : इंडोनेशिया का प्रंबनन् अर्थात परब्रह्म मंदिर !

सद्गुरु (श्रीमती) अंजली गाडगीळ के नेतृत्व में महर्षि
अध्यात्म विश्‍वविद्यालय के गुट का इंडोनेशिया की अध्ययन यात्रा का वृत्तांत

१५ वीं शताब्दी तक इंडोनेशिया में हिन्दू राजाआें का राज्य था । किसी समय विश्‍वभर में फैली हिन्दू संस्कृति के अध्ययन के लिए महर्षि अध्यात्म विश्‍वविद्यालय की ओर से सद्गुरु(श्रीमती) अंजली गाडगीळ सहित ४ विद्यार्थी साधक इंडोनेशिया की यात्रा पर थे । उन्होंने भेंट दिए स्थलों की विशेषताएं, मान्यवरों से भेंट और वहां के हिंदु संस्कृति के पदचिह्न दर्शानेवाली यह लेखशृंखला !
सद्गुरु (श्रीमती) अंजली गाडगीळ

‘जहां समद्रुमथंन हुआ, वह भभूाग है आज का इंडोनेशिया ! समुद्रमंथन की मथानी बना सुमेरू पर्वत भी इसी भाग में है । संसार का सबसे बडा द्वीपराष्ट्र है इंडोनेशिया । १७ सहस्र से अधिक द्वीप युक्त यह राष्ट्र हिंद महासागर और प्रशांत महासागर के बीच १ सहस्र ७०० मील क्षेत्र में फैला हुआ है । इसके पर्वू से पश्‍चिम तक विैश्‍वक स्तर पर १३९ घातक ज्वालामखुी हैं ।

इंडोनेशिया के प्रंबनन् स्थित सहस्रों वर्ष प्राचीन मंदिरों का समूह

‘योग्यकर्ता’ शहर इंडोनेशिया की राजधानी जकार्ता से कुल ५८० कि.मी. दूर है । इस शहर को स्थानीय ‘जावानीस’ भाषा में ‘कोटा योग्यकर्ता’ भी कहते हैं । कोटा का अर्थ है किला । २०० वर्ष पूर्व डच लोगों ने यहां राज्य किया और किला बनाया; इसलिए इसका नाम ‘योग्यकर्ता किला’, पडा होगा । मातरम्, शैलेंद्र, श्रीविजय, मजपाहित आदि हिन्दू सम्राटों ने राज्य किया था, इसलिए इस शहर की अपनी एक संस्कृति है । इंडोनेशिया के प्रसिद्ध ‘बाटिक’ शैली के कपडों का यह नगर है; इसीलिए इसे इंडोनेशिया की ‘सांस्कृतिक राजधानी’ के रूप में पहचाना जाता है ।

१. ‘पृथ्वी के सबसे ऊंचे मंदिर’ के रूप में विख्यात योग्यकर्ता स्थित प्रंबनन् (परब्रह्मन्) मंदिर योग्यकर्ता शहर से १७ कि.मी. दरू प्रबंनन् नामक गांव है । यहां ‘चंडी प्रंबनन्’ नामक मंदिरों का समूह है । ‘चंडी’ का अर्थ है मंदिर और ‘प्रंबनन्’ अर्थात परब्रह्मन् ! किसी समय इसे ‘पृथ्वी का सबसे ऊंचा मंदिर’, कहा जाता था । वर्ष १००६ में हुए ज्वालामुखी विस्फोट में वह गिर गया और ज्वालामुखी की राख के नीचे लुप्त हो गया । इस मदिंर परिसर में ३ मुख्य मदिंर हैं । मध्यभाग में शिवमदिंर, उसके बाएं आरे श्री ब्रह्मदवे का मदिंर आरै दाईं आरे श्रीविष्णु का मदिंर है । प्रबंनन् मदिंर परिसर के मुख्य शिवमदिंर में ‘अगस्त्य’ ऋषि का भी मदिंर है । ९ वीं शताब्दी में बनाए गए प्रबंनन् मदिंर में दवेताओं की सभी मूर्तिर्यां खडी स्थिति में हैं ।

२. देवता के वाहनों के मंदिर तीन मुख्य मंदिरों के सामने उस विशिष्ट देवता के वाहन का मंदिर है । शिवमंदिर के सामने नंदी मंदिर, ब्रह्मदेव मंदिर के सामने हंस मंदिर और श्रीविष्णु के मंदिर के सामने गरुड मंदिर है । किसी समय इन तीन मदिंरों के परिसर में २०० से अधिक परिवार मंदिर थे । अब उन मंदिरों के गिरे हुए पत्थर एकत्रित कर परिवार देवताओं के मदिंरों का निमार्ण कार्य किया जा रहा है । (सदंर्भ : wikipedia.org/ wiki/prambanan)

३. अगस्त्य ऋषि द्वारा लिखे वास्तुशास्त्र एवं शिल्पशास्त्र के अनुसार रचना ‘प्रंबनन् मंदिर परिसर में किसी समय बडा गुरुकुल था’, ऐसा उत्खनन से ध्यान में आया है । इस भूभाग के पास सर्वत्र ज्वालामुखी हैं, इसलिए मंदिर के पत्थर ज्वालामुखी पर्वत से मिले हैं । वे काले पत्थर हैं । कहा जाता है कि अगस्त्य ऋषि द्वारा लिखे वास्तुशास्त्र और शिल्पशास्त्र के अनुसार प्रंबनन् मंदिर की निर्मिति की गई है ।

 

परब्रह्म मंदिर का भव्य परिसर

१. निर्माण कार्य में सीमेंट का उपयोग न कर विशेष
पद्धति से एक दूसरे में करोडों पत्थर फंसाकर मंदिर बनाना

एक दूसरे में फंसाने के लिए (इंटरलॉकिंग’ के लिए) विशिष्ट आकार दिया गया मंदिर का पत्थर

इंडोनेशिया के योग्यकर्ता गांव के परब्रह्म मंदिर में करोडों में पत्थरों का उपयोग किया गया हैं । यह देखकर प्रश्‍न उपस्थित होते हैं कि ‘उस समय इसमें किस तकनीक का उपयोग किया होगा ? इतनी बडी मात्रा में पत्थर कहां से लाए गए होंगे ?’ मार्गदर्शक सेे (गाईड’ सेे) यह प्रश्‍न पूछने पर उसने बताया कि ‘‘पीछे एक बहती नदी है, वहां से ये पत्थर उठाकर लाए होंगे ।’’ इससे समझ में आया कि कई करोड पत्थर लाना और उनसे मंदिर बनवाना; इससे उस समय का तकनिकी ज्ञान कितना विकसित रहा होगा !

मंदिर का परिसर बहुत बडा है, साथ ही सभी मंदिरों का शिखर बहुत ऊंचा है । विशेष बात यह है कि मंदिर के निर्माण कार्य में कहीं भी सीमेंट का उपयोग हुआ दिखाई नहीं देता । सर्वत्र यह विशेष ‘इंटरलॉकिंग’ पद्धति है । (छायाचित्र क्रमांक १ देखें ।) इसमें पत्थर एक दूसरे में विशेष प्रकार से फंसाऐ हैं । ऐसी रचना से मंदिर सात्त्विक दिखता है । इससे यह ध्यान में आता है कि हमारे पूर्वज कितने बुद्धिमान थे ।

 

२. नैसर्गिक आपदा में भी मूर्ति की हानि
न हो, इस प्रकार से की गई मंदिर की रचना

परब्रह्म मंदिर समूह का एक मंदिर । भूकंप के समय इस मंदिर का कलश गर्भगृह में न गिरकर बाहर की ओर गिरा । (वह स्थान छायाचित्र में चौकोन में दिखाई दे रहा है ।) ऊपर के चौकोन में गिरा हुआ कलश

यहां शिवस्वरूप और जीवित ज्वालामुखीवाला ‘मेरापी’ नामक पर्वत है । उसमें से निरंतर राख और धुआं बाहर निकलता रहता है । यह ज्वालामुखी वर्ष १००६ मेें जागृत हुआ था । उस समय योग्यकर्ता गांव के परिसर में भूकंप आया था । इस कारण कई छोटे छोटे मंदिर गिर गए । तत्पश्‍चात वर्ष १५६४ में ज्वालामुखी का उद्रेक होकर भूकंप आया था, तब भी ये मंदिर थरथराए थे । तदुपरांत वर्ष २००६ के भूकंप में पुनः वहां के कुछ मंदिर गिर गए ।

मार्गदर्शक ने बताया कि जब भूकंप में मंदिर का कलश गिरा, तब वह मंदिर के गर्भगृह में न गिरकर दोनों ओर से उखडकर गिरा । इस कारण भीतर मंदिर की मूर्ति की कोई हानि नहीं पहुंची । (छायाचित्र क्रमांक २ देखें) इस पद्धति से मंदिर की रचना की गई थी । विपत्ति आने पर भी देवता की मूर्ति को कोई हानि न पहुंचे, इसका भान उस समय के लोगों में था । मंदिर पुनः बनाया जा सकता है; किन्तु मूर्ति में आया देवत्व बनाए रखना बहुत कठिन है’, इतना व्यापक विचार किया यहां दिखाई देता है ।’

– (सद्गुरु) श्रीमती अंजली गाडगीळ, इंडोनेशिया.

भारत से ४ सहस्र किलोमीटर दूरी के इंडोनेशिया में पुरातन समय से ही हिन्दू संस्कृति किस प्रकार विद्यमान थी, यह निकट से देखने का भाग्य हमें मिला । इसलिए हम महर्षि अध्यात्म विश्‍वविद्यालय के संस्थापक परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी के चरणों में कोटि-कोटि कृतज्ञता व्यक्त करते हैं ।’

स्त्रोत : दैनिक सनातन प्रभात