गुरुदेवजी के प्रति अचल श्रद्धा रखनेवाले सनातन के ७वें संत पू. पद्माकर होनपजी (आयु ७० वर्ष) की साधनायात्रा

‘सनातन के संतों की अद्वितीयता !’

सनातन के संत केवल संत ही नहीं, अपितु गुुरु ही हैं !

गुरु के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का दिन होता है गुरुपूर्णिमा ! सनातन में अब ८० से भी अधिक साधक संत बन चुके हैं । चाहे हम उन्हें ‘संत’ कहते हों; परंतु वे अपने संपर्क में रहनेवाले साधकों का साधना में मार्गदर्शन करते हैं और वह भी उनके देहत्यागतक ! इसका अर्थ उनका कार्य किसी गुुरु की भांति साधकों को साधना में मार्गदर्शन का है; इसलिए गुरुपूर्णिमा के उपलक्ष्य में सभी साधकों को उनकी जानकारी मिले तथा इन संतों से उन्हें कुछ सिखने का अवसर मिले; इसलिए ‘सनातन प्रभात’ में उनकी जानकारी प्रकाशित कर रहे हैं । इसके कारण साधकों को भी उनसे निकटता प्रतीत होने में सहायता होगी । 

१. बचपन

१ अ. मां का प्रसव के लिए माईके जाते समय प्रवास में पेटपर
गिर जाना; परंतु ईश्‍वर की कृपा से मां और गर्भ को कोई हानि न पहुंचना

मेरा जन्म ११.४.१०४८ को मेरे मामा के गांव में (मोहरी, तहसील जामखेड, जिला नगर, महाराष्ट्र) में हुआ । हमारा (होनपजी) का मूल गांव नान्नज, जो हैदराबाद संस्थान में था । वहां रजाकारशाही थी; इसलिए दिन में भी छिपकर रहना पडता था । उसके कारण मेरी मां मेरे जन्म के समय प्रसव के लिए अपने माईके गई थी । मां के माईके जाने के लिए बैलगाडी से यात्रा करनी पडती थी ।

मां जब माईके जा रही थी, तब मार्गपर एक स्थानपर बैलगाडी उलट गई और मां पेटपर गिर गई । इस दुर्घटना में गर्भ के अस्तित्व की हानि पहुंचकर कुछ भी हो सकता था; परंतु ईश्‍वर की कृपा से मां और गर्भ (मैं) दोनों ही बच गए । अब ‘साधना के लिए ही ईश्‍वर ने मुझे बचाया’, ऐसा मुझे लगता है ।

१ आ. पिता का अकाल ही देहांत होने से बचपन में कष्ट होना

मेरा बचपन गांव में बीत गया । मैं जब ७-८ वर्ष का था, तभी मेरे पिताजी का देहांत हुआ । मां, दादी, ३ बडे भाई, मैं और बहन इतने लोग नान्नज के घर में रहते थे । हमने ७वीं कक्षातक की पढाई वहीं पूर्ण की । मां और बडा भाई श्री. देवीदास ने अनेक संकटों का सामना कर हमारा पालन किया । तब मुझे संकटों का सामना कैसे करना चाहिए ?, यह सीखने के लिए मिला |

१ इ. बचपन से ही मुझे धार्मिक कृत्यों में रूचि थी । मंदिर जाना, धार्मिक कृत्य करना और त्योहार मनाना आदि कृत्य मैं बहुत रूचि से करता था ।

 

२. विद्यालयीन और महाविद्यालयीन शिक्षा

२ अ. पढाई करने दूसरे गांव में होने से वर्ष में एक अथवा दो बार ही घर जाना

मैं १२-१३ वर्ष का होने के पश्‍चात पढाई के लिए दूसरे गांव में था । उस समय मैं ६ मास अथवा १ वर्ष पश्‍चात ही मैं घर जाता था । उस समय मां मेरा बहुत स्मरण करती है; इसलिए हम घर जाएं, ऐसी स्थिति नहीं थी । इसके विपरीत मां कहती थी कि तुम जहां होंगे, वहां सुखी रहें । इस प्रसंग से ईश्‍वर ने ही ‘माया कैसे त्यागनी चाहिए ?, यह सिखाया ।

२ आ. दूसरों के घर रहकर उनके घर के काम कर माध्यमिक शिक्षा पूर्ण करना

नान्नज में केवल ७वीं कक्षातक ही विद्यालय होने से मुझे आगे की शिक्षा के लिए तहसील के गांव में जाना पडा । ८वीं कक्षा से ११वीं कक्षातक की शिक्षा मैने दूसरों के घर रहकर पूर्ण की । मुझे उनके घर में साफसफाई करना, अनाज पीसकर लाना जैसे काम करने पडते थे, साथ ही उनके घर में देवतापूजन भी करना पडता था । मैं, मेरा दूसरा भाई श्री. मधुकर तथा तिसरा भाई श्री. सुधाकर ने भी इसी पद्धति से तत्कालीन ११वीं कक्षातक की पढाई पूर्ण की । इस स्थिति के कारण मुझे सेवा कैसी करनी चाहिए ?, यह सीखने के लिए मिला ।

२ इ. घर आनेपर चचेरी दादी द्वारा प्रेमपूर्वक विविध खाद्यपदार्थ खिलाए जाना

नान्नज में घर आनेपर हमारे पडोस में हमारे काका रहते थें । हमारी चचेरी दादी बहुत प्रेमल थी । उनके घर जानेपर वह हमें दूध और गूड के मिश्रण में जवार की लाई का आटा मिलाकर उसके एक-एक गोला बनानर खाने के लिए देती थी । उस समय लड्डू, गुजिया, पोहा जैसे पदार्थ केवल त्योहारों के समय ही बनाए जाते थे । कभी-कभी वह बासी पुरियों की कुसकरी बनाकर भी देती थी । वह पुरियों का कुसकरा महत्वपूर्ण नहीं था, अपितु उसमें विद्यमान प्रेम महत्त्वपूर्ण था । मुझे दादी से दूसरों के प्रति प्रेमभाव कैसे रखा जाता है, यह सीखने को मिला ।

२ ई. महाविद्यालयीन शिक्षा पहले नगर में और उसके पश्‍चात पुणे में होना

जामखेड में महाविद्यालय न होने के के कारण आगे की शिक्षा के लिए मुझे जिले के स्थानपर अर्थात नगर जाना पडा । महाविद्यालय में २ वर्षोंतक वाणिज्य शाखा में शिक्षा लेकर आगे की शिक्षा के लिए मैं पुणे गया । वर्ष १९६९ में मैने वाणिज्य शाखा में स्नातक बन गया ।

 

३. नौकरी

३ अ. नौकरी न मिलने से मुख्यमंत्री को पत्र लिखनेपर तुरंत नौकरी मिल जाना

शिक्षा पूर्ण होनेपर मैं नौकरी ढूंढ रहा था । स्नातक होकर १ से डेढ वर्ष बीतकर भी मुझे नौकरी नहीं मिल रही थी । उस समय एम्प्लॉयमेंट एक्स्चेंज के माध्यम से नौकरियां मिलती थीं । वहांपर नाम प्रविष्ट कर भी मुझे नौकरी के लिए कॉल नहीं आ रहा था; इसलिए मैंने तत्कालीन मुख्यमंत्री को पत्र लिखा । उसके पश्‍चात उस पत्र का संदर्भ देकर मुझे एम्प्लॉयमेंट एक्स्चेंज से मुझे बुलावा आ गया । वह नौकरी महाराष्ट्र शासन के वित्त विभाग में थी । उन्होंने मेरी परीक्षा लेकर उसी दिन साक्षात्कार किया । उसके अगले सप्ताह में मुझे नियुक्तिपत्र (एपॉईंटमेंट लेटर) मिला । दिसंबर १९७० में मुझे यह नौकरी मिली । केवल ईश्‍वर की कृपा से ही मुझे मुख्यमंत्री को पत्र लिखने की सद्बुद्धि मिली और उसके कारण ही मुझे नौकरी मिली ।(तत्कालीन मुख्यमंत्री की तुलना यदि उनके अगले समय के मंत्रियों से की जाए, तो अगले समय के मंत्री उस मुख्यमंत्री के साथ तुलना करने के भी पात्र नहीं हैं, यह इससे ध्यान में आता है ! – संकलक)

३ आ. घूमाऊ स्वरूप की नौकरी होने से गांव-गांव जाना पडना

मेरी नौकरी घुमाऊ स्वरूप की थी । ग्रामपंचायतों के लेखा परीक्षण के लिए मुझे गांव-गांव घूमना पडता था । उस समय अनेक गांवों में बस की सेवाएं भी नहीं थीं । उसके कारण अनेक समस्याआें का सामना करना पडता था ।

३ इ. पदोन्नति के लिए दी गई सभी परिक्षाआें में उत्तीर्ण हो जाना

कुछ वर्ष पश्‍चात मैने पदोन्नति के लिए वित्त विभाग की परीक्षा दी । उस समय मेरे साथ के परीक्षार्थियों में मैं अकेला ही उत्तीर्ण हो गया । मेरे अल्पावधि में ही परीक्षा उत्तीर्ण होने से ही मुझे पूर्व वेतनवृद्धि मिल गई । उसके पश्‍चात भी मैने पदोन्नति के लिए परिक्षाएं दीं और उनमें भी उत्तीर्ण होने से वर्ष १९७९ में मुझे लेखाधिकारी के रूप में पदोन्नति मिली । वर्ष २००६ में मैं नौकरी से सेवानिवृत्त हुआ ।

 

४. वैवाहिक जीवन

४. अ. ‘विवाह करें’, ऐसा न लगते हुए भी मां की इच्छा के कारण
विवाह किया जाना तथा पत्नी ने भी उसके पिताजी के आग्रह के कारण विवाह करना

नौकरी लगने के ४-५ वर्ष पश्‍चात मेरा विवाह हुआ । वर्ष १९७६ में विवाह करना चाहिए, ऐसा मुझे न लगते हुए भी मां की इच्छा के कारण मैने विवाह किया । तब मैंने परेच्छा से आचरण किया, यह अब ध्यान में आता है ।

मेरी पत्नी श्रीमती निर्मला के पिता बहुत गुस्सैल और कठोर थे; इसलिए वह उनके बंधन में रही । वह सामान्यरूप से सायंकाल के समय घर से बाहर नहीं जाती थी । उसकी भी विवाह की इच्छा नहीं थी; परंतु उसकी पिता के इच्छा के कारण उसने विवाह किया ।

४. आ. स्वयं का संपूर्ण वेतन पत्नी के हाथ में सौंपना तथा उसके द्वारा मितव्यय कर गृहस्थी चलाई जाना

मेरी नौकरी घुमाऊ होने से मैं प्रत्येक रविवार को ही घर आता था । मेरा वेतन होनेपर मैं मेरा संपूर्ण वेतन मेरी पत्नी के हाथों में सौंप देता था । मैने उससे कभी भी पैसों का हिसाब नहीं पूछा और उसने भी मितव्यय कर गृहस्थी चलाई । इसके कारण मुझे परिवार के लिए किए जानेवाले व्यय की ओर ध्यान नहीं देना पडा । नौकरी में मेरा प्रत्येक ५ वर्ष पश्‍चात स्थानांतरण होता था । वर्ष १९८५ में मेरा स्थानांतर नासिक में हुआ और उसके पश्‍चात हम नासिक में ही रहने लगे ।

४ इ. घर के पास के मंदिर में कीर्तन सुनने के लिए जाना

नासिक में हमारे घर के पास ही भद्रकाली और कालाराम मंदिर था । मैं वहां नियमितरूप से दर्शन करने जाता था । नासिक के ४ मंदिरों में संपूर्ण वर्ष कीर्तन होता था । मैं पत्नी के साथ भद्रकाली मंदिर में कीर्तन सुनने के लि, जाता था । हमने बहुत कीर्तनकार देखें; परंतु वे सब कीर्तनपर अपनी जीविका चलानेवाले कीर्तनकार थे ।

 

५. सनातन संस्था से संपर्क

५ अ. भद्रकाली मंदिर में दर्शन करने जानेपर वहां सनातन का सत्संग
चलना तथा उसमें बताया गया विषय अच्छा लगने से सत्संग में सहभागी होना

वर्ष १९९८ में नासिकके भद्रकाली मंदिर में सायंकाल में सनातन का सत्संग चलता ता । एक दिन मैं जब देवी के दर्शन करने गया था, तब मैने सत्संग में बताया गया विषय सुना और मुझे वह अच्छा लगा । मुझे यह विषय अन्य प्रवचन तथा कीर्तन की अपेक्षा अलग लगा । मुझे समय न होने से मैने मेरी बडी लडकी कु. दीपाली तथा लडका श्री. राम को सत्संग में जाने के लिए कहा । उन्होंने भी सत्संग सुना और वे नियमितरूप से सत्संग में जाने लगे । मैं नौकरी के कारण बाहर होने से छुट्टी के दिन सत्संग होनेपर मैं भी सत्संग में जाता था । उस कालावधि में मैं सत्संग में जाना, गुरुचरित्र का पारायण करना इत्यादी साधना करता था ।

५. आ.संस्था में आनेपर ‘भक्ति कैसी करनी चाहिए ?’, इसका प्रत्यक्ष अनुभव होना

प्रवचन एवं कीर्तन में भक्ति कैसी करनी चाहिए ?, भक्ति के प्रकार कौन से हैं ?, इस विषय में मैं सुनता था; परंतु मेरे द्वारा उसके अनुसार कृती नहीं होती थी और मुझे उसका अर्थ भी समझ में नहीं आता था । सनातन संस्था के मार्गदर्शन के अनुसार साधना आरंभ करने के पश्‍चात प्रत्यक्ष कृति कैसे करनी चाहिए ? भक्ति कैसे करनी चाहिए ?, यह सीखने को तथा उसका प्रत्यक्ष अनुभव करने को मिला ।

५ इ. गुरुदेवजी द्वारा पूर्णकालीन साधक होने का सुझानेपर
मेरे द्वारा उन्हें सेवानिवृत्ति के पश्‍चात पूर्णकालीन साधक होने की बात कही जाना

परात्पर गुुरु डॉ. आठवले नासिक आए थे । तब मेरी उनसे भेंट हुई । उसके पश्‍चात श्री. राम (मेरा छोटा लडका) नामजपादी उपायों के लिए उनके साथ मिरश्र आश्रम चला गया । उस समय उन्होंने मुझे भी पूर्णकालीन साधक होने के विषय में सुझाया । तब मैने उन्हें सेवानिवृत्ति के पश्‍चात पूर्णकालीन होने की बात कही । उस समय मेरी साधना की नींव कच्ची होने से मुझे उसका महत्त्व समझ में नहीं आया; परंतु अब ध्यान में आता है ।

५ ई. बच्चों से मिलने आश्रम जानेपर गुरुदेवजी द्वारा
‘आप भी आश्रम में रहकर साधना कर सकते हैं, ऐसा सुझाया जाना

कु. दीपाली तथा श्री. राम ये दोनों बच्चे सेवा के लि, रामनाथ आश्रम गए । मैं उनसे मिलने के लिए रामनाथी आश्रम गया था । तत्पश्‍चात २-३ दिनों में परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी ने आश्रम रहकर सेवा करने के लिए सुझाया ।

बाईं ओर से श्री. राम होनप, पू. पद्माकर होनपजी, कु. दीपाली होनप तथा मध्य में बैठी हुईं कै. पू. (श्रीमती) निर्मला होनपजी

६. रामनाथी आश्रम में रहकर पूर्णकालीन साधना करना

६ अ. आश्रम में रहना प्रारंभ करनेपर स्वभावदोष तथा अहं निर्मूलन प्रक्रिया समझकर लेना

१.८.२००६ से मैं रामनाथी आश्रम में रहकर पूर्णकालीन साधना करन लगा । उससे पहले मैं नामजप के अतिरिक्त कुछ नहीं करता था; इसलिए मुझे स्वभावदोष तथा अहं निर्मूलन प्रक्रिया की कोई जानकारी नहीं थी । मै जब इस प्रक्रिया से अवगत हुआ, तब मुझे क्या करना चाहिए और क्या नहीं करना चाहिए ?, इसका भान हुआ ।

६ आ. लेखा की सेवा को अचूकता के साथ करने का प्रयास किया
जाना तथा आश्रम में चूकों के सत्संग से बहुत कुछ सीखने को मिलना

मैं आश्रम में लेखा से संबंधित सेवा करता था । इस सेवा में अचूकता का बडा महत्त्व है । मैने उसके अनुसार सेवा का प्रयास किया । ब्यौरा सत्संग तथा व्यवस्थापन में सेवा करनेवाले साधकों द्वारा लिए गए चूकों के २ सत्संगों से मुझे बहुत कुछ सीखने को मिला । उससे ‘मैं कहां चूकता हूं ?’, इसका भान हुआ और उसके पश्‍चात इस प्रकार की चूकें पुनः नहीं होंगी, इसकी ओर गंभीरता से ध्यान दिया ।

६ इ. दी गई सेवा को मन से करना

लेखा सेवा के अतिरिक्त मैं अन्य सेवाएं भी करता था । ऐन समयपर साधक उपलब्ध न होनेपर भोजनकक्ष समेटना, अनाज चुनना, अल्पाहार की पूर्वसिद्धता करना, ध्यानमंदिर में आरती उतारना जैसी सेवाएं मैं मन से करता था ।

६ ई. ईश्‍वर द्वारा छोटी-छोटी इच्छाएं भी पूर्ण की जाना

आश्रम में होते समय मुझे होनेवाली कोई इच्छा तुरंत पूर्ण हो जाती थी । किसी दिन मीठा पदार्थ खाने की इच्छा हुई, तो उस दिन के महाप्रसाद में वही पदार्थ होता था अथवा अन्य कोई मुझे वह पदार्थ लाकर देता था ।

६ उ. भावपूर्ण सेवा कैसी करनी चाहिए, इसे गुुरुदेवजी द्वारा दूसरों के उदाहरण के माध्यम से सिखाया जाना

एक बार एक नई साधिका टंकण कर रही थी । उस समय उसे ‘मुझसे चूक होगी’, ऐसा ल रहा था । तब वह प्रार्थना कर तथा ईश्‍वर को पुकारकर सेवा कर रही थी । उसके टंकण में अनेक चूकें होते हुए भी गुुरुदेवजी ने उसके टंकण को अच्छा बताया, तो दूसरी बार एक बार एक अनुभवी साधिका ने टंकण किया था । उसके टंकण में पहली नई साधिका की अपेक्षा अल्प चूकें थीं, तब भी गुरुदेवजी ने उसकी सेवा में अनेक चूकें होने का बताया । इससे यह ध्यान में आया कि साधक द्वारा उसकी स्थिति के अनुसार की गई भावपूर्ण सेवा गुुरुदेवजी को अच्छी लगती है । इससे मुझे भावपूर्ण सेवा का महत्त्व ध्यान में आया ।

६ ऊ. दूसरों का आनंद देखकर बहुत आनंद मिलना

आश्रम में रहनेवाली कोई साधिका मुझे जब ‘आनंदित कैसे रहना चाहिए ?’, ऐसा पूछती थी, तब मैं उसे निरंतर सत् में रहना, निरंतर ईश्‍वर के अनुसंधान में रहना, सकारात्मक होना इत्यादि सूत्र बताता था । उसके २ दिन पश्‍चात वह पूछती थी, ‘‘अब मैं कैसे दिखती हूं ? आनंदित दिखती हूं न ?’’ तब मेरे आनंद में भी बढोतरी होती थी । इस आनंद का मैं शब्द में वर्णन नहीं कर सकता ।

 

७. परात्पर गुरुदेवजी के प्रति श्रद्धा बढानेवाले प्रसंग

७ अ. पत्नी को पक्षाघात का झटका आनेपर उसे चिकित्सालय में
प्रविष्ट न कर आश्रम में ही रखने से अंततक उसकी सेवा करना संभव हो जाना

वर्ष २००८ में पत्नी को पक्षाघात का झटका आने से वह आश्रम के कक्ष में ही रहने लगी । उस समय उसे अनेक वैद्यों को दिखाया गया; परंतु उसका कोई उपयोग नहीं हुआ । इसलिए उसे चिकित्सा के लिए मुंबई ले जाना सुनिश्‍चित हुआ । अधिक जानकारी लेनेपर मुझे यह ज्ञात हुआ कि वहां के आधुनिक वैद्य उसे चिकित्सालय में प्रविष्ट कर कोमा में रखकर लाखों रुपए वसूलेंगे और उसके साथ संपर्क भी नहीं रहेगा । अंततः उसे आश्रम में ही रखने का निर्णय हुआ । उससे मुझे और बच्चों को अंततक उसकी सेवा का अवसर मिला । तब यह सब परात्पर गुुरु डॉ. आठवलेजी के कारण ही संभव हो सका, यह मेरे ध्यान में आया ।

७ आ. साधकों का मार्गदर्शन करते हुए कूछ सूत्र अपनेआप सूझना

वर्ष २०११ में जब मैं कुछ जिलों के दौरेपर था, तब साधकों के लिए आवश्यक सूत्र मुझे अपनेआप ही सूझ जाते थे और अपनेआप ही साधकों को बताए जाते थे । तब मैने क्या बताया ?, यह भी मेरी समझ में नहीं आता था । उस समय उनके द्वारा पूछे गए प्रश्‍नों के वास्तविक उत्तर मुझे ज्ञात भी नहीं होते थे । ‘यह सब कौन करते हैं ?, इसका चिंतन करनेपर उस समय मेरे माध्यम से डॉ. आठवलेजी ही बोलते थे, यह बात मेरे ध्यान में आ गई ।

७ इ. उत्तर भारत में लेखा की सेवा करते समय वहां के विषम
मौसम से कष्ट न होना, साथ ही लंबी दूरी की यात्रा भी संभव हो जाना

वर्ष २०१२ के पश्‍चात मैं लेखा की सेवा के लिए उत्तर भारत में था । तब मुझे १२-१४ घंटों की लंबी दूरी की यात्रा करनी पडती थी; परंतु मुझे उससे कोई कष्ट नहीं हुआ । उस कालावधि में मुझे उत्तर भारत के साधकों का प्रेमभाव अनुभव करने को मिला । वहां गर्मी के समय अतिगर्मी और ठंड के मौसमें अतिठंड, इस प्रकार का विषम मौसम होता था; परंतु परात्पर गुुरु डॉ. आठवलेजी से मिलनेवाले निरंतर चैतन्य के कारण उसका मेरे शरीरपर कोई दुष्प्रभाव नहीं पडा ।

७ ई. घर और खेती की बिक्री के समय अनेक बाधाएं आकर भी लेन-देन पूर्ण हो जाना

वर्ष २०१६ में हमारा नासिक का घर बेचते समय अनेक बाधाएं आईं । सुनिश्‍चित लेन-देन भी रद्द हुआ; परंतु २ वर्षों में बिना किसी कष्ट के घर बेचा गया । यह केवल परात्पर गुुरु डॉ. आठवलेजी की कृपा थी ! मैने खेती भी बेचना सुनिश्‍चित किया था । यह लेन-देन न हो; इसके लिए कुछ बाहरी व्यक्तियों से प्रयास किए गए; परंतु तब भी परात्पर गुुरु डॉ. आठवलेजी के कारण ही खेत की भी बिक्री हो गई । इससे ‘प्रत्येक प्रसंग में ईश्‍वर ही सहायता  करते हैं’, यह ध्यान में आया ।

७ उ. मेरा लडका श्री. राम होनप को तीव्र आध्यात्मिक कष्ट हैं । ‘वह अभीतक जीवित है, वह केवल परात्पर गुुरु डॉ. आठवलेजी के कारण ही !,  इसका मुझे भान होकर मुझे नामजपादी आध्यात्मिक उपायों का महत्त्व ध्यान में आया ।

 

८. ६० प्रतिशत से लेकर ७० प्रतिशत
आध्यात्मिक स्तर की यात्रा में विद्यमान विशेषतापूर्ण सूत्र

८ अ. एक ही वर्ष पति-पत्नी के आध्यात्मिक स्तर घोषित हो जाना

अक्टूबर २००८ में  पहले श्रीमती निर्मला द्वारा ६० प्रतिशत आध्यात्मिक स्तर प्राप्त किए जाने का घोषित किया गया । उसके १५ दिन पश्‍चात मेरा आध्यात्मिक स्तर ६० प्रतिशत होने का घोषित किया गया । मेरा ६० प्रतिशत स्तर घोषित किया जाना तथा उसके पश्‍चात संतपद प्राप्त करने का घोषित किया जाना, यह ‘न भूतो न भविष्यति’, ऐसा था । आध्यात्मिक स्तर घोषित हो जाना, तो केवल परात्पर गुुरु डॉ. आठवलेजी की कृपा ही थी, दूसरा कुछ नहीं था ।

८ आ. आरंभ में साधकों के लिए किया गया नामजप परिणामकारक होना, उसके
पश्‍चात उसका परिणाम होना हुआ न दिखने का ध्यान में आना, तब अब अगले चरण का
सूक्ष्म का युद्ध आरंभ होने से उसके लिए आध्यात्मिक स्तर बढाने की आवश्यकता ध्यान में आना

जब मेरा आध्यात्मिक स्तर ६० प्रतिशत होने के पश्‍चात मैं बीच-बीच में साधकों के लिए नामजप करने की सेवा करता था । तब मुझे ‘साधकों को किस प्रकार से अनिष्ट शक्तियों के कष्ट हो रहे हैं ?’, यह ध्यान में आया । पहले साधकों के लिए नामजप करनेपर उसके परिणामकारक होने के विषय में साधक बताते थे; परंतु कुछ कालावधि के पश्‍चात अब नामजप का बहुत कुछ परिणाम नहीं दिखाई देता, यह ध्यान में आया । तब अब ६ठे और ७वें पाताल में विद्यमान बडी अनिष्ट शक्तियों से सूक्ष्म का युद्ध चल रहा है और उससे होनेवाले कष्ट न्यून हानेे के लिए न्यूनतम ७० प्रतिशत आध्यात्मिक स्तर की आवश्यकता है, ऐसा मैने दैनिक सनातन प्रभात में पढा और तब ‘साधकों के लिए नामजप करना हो, तो मेरा आध्यात्मिक स्तर बढना आवश्यक है, इसका मुझे भान हुआ ।

८ इ. वर्ष २०१० में ६६ प्रतिशत आध्यात्मिक स्तर होना और अगले वर्षतक संत बनने का लक्ष्य रखना

वर्ष २०१० की गुरुपूर्णिमा को मेरा आध्यात्मिक स्तर होने का घोषित हुआ और उससे मुझे उत्साह बढ गया । वर्ष २०११ में गुरुपूर्णिमातक मैने ७० प्रतिशत स्तर प्राप्त करने का (संत बनने का) लक्ष्य रखा । उस समय मैं समष्टि हेतु नामजप करना, अनिष्ट शक्तियों के कष्टवाले साधकों के लिए नामजप करना तथा साधकों को व्यष्टि साधना का मार्गदर्शन करना, ये प्रयास किए ।

८ ई. सद्गुुरु राजेंद्र शिंदे द्वारा मेरा संतपद प्राप्त करने का घोषित किए जानेपर आनंदावस्था में जाना

११.६.२०११ को आश्रम में आए एक संतजी को सम्मानित करने हेतु मैं चित्रीकरण कक्ष (स्टुडियो) में था । वहां मैं उन संतजी की प्रतीक्षा में था, तब सद्गुुरु राजेंद्र शिंदेजी ने मेरे संत बनने की घोषणा की । मुझे केवल इतना ही स्मरण है । उसके पश्‍चात क्या हुआ ?, मैने क्या बोला ?, इसका भी मुझे स्मरण नहीं है । ईश्‍वर ने ही मुझे आनंदावस्था में ले जा कर मुझसे ४ शब्द बुलवा लिए । उस समय आनंद की स्थिति में होने के कारण मैं बोलने की स्थिति में नहीं था । वहा आनंद तथा उस स्थिति का मैं शब्दों में वर्णन नहीं कर सकता । उस समय ईश्‍वर के चरणों में मुझसे कृतज्ञता व्यक्त हुई ।

९. पत्नी के देहांत के समय ‘दुख भी नहीं और आनंद
भी नहीं’ की स्थिति होना तथा समष्टि के लिए साधना आरंभ हो जाना

१२.८.२०१० को पत्नी श्रीमती निर्मला का निधन हुआ । उसके निधन के पूर्व उसका स्वास्थ्य अच्छा न होने से ‘अब उसके जीवन के कुछ ही दिन बचे हैैं’, यह मेरे ध्यान में आ गया । उसी समय आश्रम में प.पू. पेठेदादीजी तथा कु. मंगल मयेजरजी का भी देहांत हुआ था । उस समय मेरे मन को कुछ नहीं लगा था । मैने ‘दुख भी नहीं और आनंद भी नहीं’, ऐसी स्थिति श्रीमती निर्मला के देहांत के समय भी अनुभव करना सुनिश्‍चित किया । उसके कारण मुझे स्थिर रहना संभव हुआ । वह मैने मेरे मनपर प्राप्त की हुई बडी विजय थी । उसके पश्‍चात मुझे मेरा मूल्य शून्य है, इसका भान हुआ । ‘मैं कौन हूं ?, तो कोइ नहीं’, इसका मुझे गंभीरता से भान हुआ । उसके पश्‍चात अब स्वयं के लिए कुछ नहीं करना है, जो कुछ करना है वह समष्टि के लिए करना है’, यह मैने सुनिश्‍चित किया और उसके अनुसार मुझ से समष्टि हेतु नामजप की सेवा आरंभ हो गई ।

 

१०. स्वयं में आए परिवर्तन

१० अ. क्रोध की मात्रा घट जाना

पहले मुझे बहुत क्रोध आता था । मेरे कार्यालय से घर आनेपर परिवार के सभी सदस्य मुझे डरते थे; परंतु अब मेरा क्रोध बहुत ही न्यून हुआ है । पहले मैं मेरे मतपर अटल रहता था, अब वह भी अल्प होकर दूसरों की बात सुनने का भाग बढा है ।

१० आ. बहिर्मुखता न्यून हो जाना

पहले मुझ से हंसी-मंजाक करना, व्यंग कर बोलना जैसी कृतियां होती थीं; परंतु अब उसकी मात्रा घटी है । अब पहले की अपेक्षा उपहास करना, व्यंग करना जैसी कृती होती थीं, जिसकी मात्रा न्यून हुई हैं, साथ ही पहले की अपेक्षा प्रतिक्रियाआें की मात्रा भी न्यून हुई हैं ।

१० इ. साक्षीभाव की स्थिति आना

प्रत्येक प्रसंग कुछ सीखने के लिए होता है, इसे ध्यान में लेकर उसकी ओर साक्षीभाव से देखने का प्रयास होता है । किसी का विवाह सुनिश्‍चित हुआ अथवा किसी को पुत्रलाभ हुआ, तो उससे बहुत आनंद होता है, ऐसा नहीं और उसी प्रकार से किसी की मृत्य होनेपर भी दुख होता है, ऐसा भी नहीं है । मुझे इसका कुछ नहीं लगता ।

 

११. प्राप्त अनुभूतियां

११ अ. संत भक्तराज महाराजजी के प्रकटदिवसपर वे लाठी से मुझे मार रहे हैं, ऐसा दिखाई देना

संत भक्तराज महाराजजी के प्रकटदिवसपर सभागार में उनका प्रतिमापूजन चल रहा था । मैने उनके चरण पकड लिए हैं और वे मुझे लाठी से मार रहे हैं, ऐसा मुझे सूक्ष्म से दिखाई दिया । वे बहुत समयतक मुझे लाठी से मार रहे थे; परंतु मुझे उनकी लाठी की मार नहीं लगी, जिसका अर्थ मुझे कुछ समय पश्‍चात ध्यान में आ गया । उन्होंने मुझे लाठी से मारकर मेरा प्रारब्ध समाप्त कर मेरी आध्यात्मिक उन्नति करवा ली । इस अनुभूति को देने के लिए तथा मेरी उन्नति करवा लेने के लिए मैं ईश्‍वर के चरणों में कृतज्ञ हूं ।

११ आ. आरती की सेवा के समय चंदन घिसते समय ईश्‍वर से
आर्तता के साथ प्रार्थना होना और तब श्रीकृष्णजी द्वारा प्रत्युत्तर किए जाने का सुनाई देना

आश्रम की सनातन पुरोहित पाठशाला के पुरोहितों के घर जाने से ३ दिनोंतक ध्यानमंदिर में सुबह की आरती की सेवा मेरे पास थी । आरती की सेवा करते समय मैं चंदन घिस रहा था । उस समय मुझसे ‘मुझ में आरती उतारने की क्षमता नहीं है; इसलिए आप ही मुझ से यह सेवा करवा लें’, यह प्रार्थना हुई । तब श्रीकृष्णजी ने मुझे सूक्ष्म से बतााया, ‘घिसता हूं नाथजी के घर चंदन ।’ अर्थात चंदन तो मैं ही घिस रहा हूं । तब ईश्‍वर ही सब कर रहे हैं, इसका भान होकर कृतज्ञता व्यक्त हुई ।’

– पू. श्री. पद्माकर होनपजी, सनातन आश्रम, देवद, पनवेल (७.७.२०१८)

संतों की विशेषताआें को केवल पढें नहीं, अपितु उनका स्वयं में अंतर्भाव का प्रयास करें, जिससे कि इस लेखमाला का सार्थक होगा ।’ -परात्पर गुुरु डॉ. आठवलेजी