आयु के बंधन को तोडकर परात्पर गुुरु डॉ. आठवलेजी का आज्ञापालन करनेवाले मध्य प्रदेश के दुर्ग के सनातन के १८ वें संतरत्न पू. छत्तरसिंह इंगळेजी (आयु ८८ वर्ष)

‘मध्य प्रदेश का एक स्थान दुर्ग में मार्गदर्शन के लिए कोई न होते हुए भी पू. छत्तरसिंह इंगळेजी ने साधना कर संतपद को प्राप्त किया और उसके पश्‍चात भी उन्होंने अपनी उन्नति चालू ही रखी हुई है । मार्गदर्शन के लिए कोई उपलब्ध न होनेवाले सभी साधकों के लिए यह बात दिशादर्शक है । ईश्‍वरप्राप्ति की यदि सच्ची तडप हो, तो ईश्‍वर कैसे सहायता करते हैं, इसका यह एक उत्कृष्ट उदाहरण है । उनकी आगे की उन्नति भी ऐसी ही चलती रहेगी, इसके प्रति मैं आश्‍वस्त हूं ।’  – परात्पर गुुरु डॉ. आठवलेजी

१. पारिवारिक जीवन तथा नौकरी

मेरा मूल गांव महराष्ट्र के बुलढाणा जनपद का खामगाव है । ५ भाई तथा ३ बहने, यह मेारा परिवार है । खामगाव में हम एकत्रित रहते थे । मैं आई.टी.आई. में नौकरी करता था । वहां में पहले टे्रनिंग ऑफीसर, उसके पश्‍चात उपप्राचार्य और सेवानिवृत्ति के समय में प्राचार्यपदपर कार्यरत था ।

२. सनातन के संपर्क में आने के पूर्व की गई साधना

२ अ. प.पू. गजानन महाराज के प्रति श्रद्धा होना, नियमितरूप से गीतापठन करना, तथा ‘भक्तिविजय’ ग्रंथ का वर्ष में २ बार पारायण करना

मुझे बचपन से ही धार्मिक कृत्यों में रूचि थी । मैं देवतापूजन करता था । मुझमें प.पू. गजानन महाराज के प्रति श्रद्धा थी । मैं नियमितरूप से गीतापठन करता था, साथ ही प.पू. गजानन महाराज के ‘ भक्तिविजय’ ग्रंथ का वर्ष में २ बार पारायण करता था । मैं नौकरी में होते हुए भी यह सब करता था । मेरी पत्नी भी धार्मिक थी । उसमें भी प.पू. गजानन महाराज के प्रति श्रद्धा थी ।

२ आ. गांव में गहिनीनाथ मंदिर का निर्माण किया जाना तथा वर्ष में एक बार गांव के मंदिर में दर्शन के लि, जाना

मैने चारधाम यात्रा की है । हमारे गांव के पास एक संत रहते थे । उन्होंने मुझे हमारे गांव में गहिनीनाथजी का मंदिर निर्माण करने के लिए कहा और उसके अनुसार मैने मंदिर का निर्माण किया । मैं नौकरी के कारण चाहे जहां भी होता था; परंतु वर्ष में एक बार गांव के इस मंदिर में दर्शन करने आता था । अब वयस्कता के कारण वह संभव नहीं होता ।

३. सनातन संस्था से संपर्क

३ अ. सत्संग में जाने के पश्‍चात तुरंत ही सनातन के ग्रंथों की खरीद कर उन्हें पढना तथा उससे ग्रंथवाचन में रूचि उत्पन्न होना

मैं दुर्ग में बंस गया । वर्ष १९९८ में वर्धा के श्री. श्रीकांत पाध्ये तथा श्रीमती अंजली पाध्ये दंपति प्रसार हेतु दुर्ग में आते थे । उनके द्वारा बताए जाने के अनुसार मैं ,क सत्संग में गया । वहां बताया गया साधना का विषय मुझे बहुत भा गया । मैने तुरंत सनातन के कुछ ग्रंथ खरीद लिए और उनका वाचन करने लगा । तत्पश्‍चात मुझे ग्रंथवाचन में रूचि उत्पन्न हुई ।

३ आ. सनातन का कार्य अच्छा लगने से साधकों को रहने के लिए निःशुल्क घर दिया जाना

आरंभ में मेरा कार्य में कोई सहभाग नहीं था । एक बार पाध्ये दंपति ने सनातन का प्रसारकार्य बढाने के लि, दुर्ग में रहने की इच्छा व्यक्त की तथा उसके लिए मुझे घर देखने के लिए कहा । मैने उन्हें कहा, ‘‘आप मेरे ही घर की पडछत्ती में रह सकते हैं ।’’ इतने बडे घर का किराया बहुत होगा, इस आशंका से उन्होंने मुझे पूछा, तब मैने उन्हें निःशुल्क घर उपलब्ध कराने का और केवल बिजली का भुगतान करने के लिए कहा । आगे जाकर मुझे सनातन का कार्य इतना अच्छा लगा कि जब एक मास पश्‍चात जब श्री. पाध्ये मुझे बिजली का बिल देने आए, तब मैने उसे स्वीकार नहीं किया ।

३ इ. घर में ही सेवाकेंद्र का आरंभ होना तथा सेवाकेंद्र में गुुरुपूर्णिमा मनाई जाना

मेरा घर तो सेवाकेंद्र ही है । यहां साधक सत्संग के लिए आते हैं । सद्गुुरु (डॉ.) चारुदत्त पिंगळेजी तथा सद्गुुरु नंदकुमार जाधवजी इस सेवाकेंद्र में कई बार आ चुके हैं ।

दुर्ग में साधकसंख्या अल्प होने से हम सेवाकेंद्र में ही गुरुपूर्णिमा मनाते हैं । उस समय सभी साधक आते हैं । इस दिन हम भंडारा कर सभी साधकों के परिजनों को महाप्रसाद हेतु आमंत्रित करते हैं ।

३ ई. विविध प्रकार की सेवाएं करना तथा परात्पर गुुरु डॉ. आठवलेजी द्वारा संतपदपर विराजमान किया जाना 

मैं पाध्ये दंपति के साथ प्रसार में जाने लगा । मैं मंदिर में ग्रंथप्रदर्शनी लगाता था । कुछ मास पश्‍चात मुझे दुर्ग क्षेत्र के कार्य का दायित्व दिया गया । मैने उनसे सेवाएं सीख लीं तथा ग्रंथ प्रदर्शनी लगाना, विज्ञापन लाना, साप्ताहिक सनातन प्रभात के वर्गणीदार बनाकर साप्ताहिक का वितरण करना, गुुरुपूर्णिमा के समय अर्पण एकत्रित करना, ग्रंथप्रदर्शनीस्थलपर आनेवाले जिज्ञासुआें को साधना बताना जैसी सेवाएं मैं करता था । मैने मेरे पौत्र के विवाह के समय चाळीसगाव में फ्लेक्स प्रदर्शनी तथा ग्रंथ प्रदर्शनी लगाई थी । वर्ष २०१२ से राजीम में अर्धकुंभ का आयोजन किया जानेवाला था । मैने वहां सनातन के ग्रंथ तथा सात्त्वि क उत्पादों की प्रदर्शनी लगाना आरंभ किया । उसी वर्ष परात्पर गुुरु डॉ. आठवलेजी ने मुझे संतपदपर विराजमान किया ।

४. परात्पर गुुरु डॉ. आठवलेजी द्वारा नामजप तथा समष्टि के लिए प्रार्थना का दायित्व दिया जाना

मैं जब रामनाथी आश्रम में गया था, तब परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी ने मेरी प्रशंसा करते हुए कहा, ‘‘आप निर्विचार अवस्था में होते हैं । आप अखंडित नामजप करते हैं । यह बहुत अच्छा है ।’’ वास्तव में मुझे इसका कोई ज्ञान नहीं है । मैं केवल उनके आज्ञापालन का प्रयास करता हूं । मैने उनसे कहा, ‘‘मैं दुर्ग सेवाकेंद्र की स्वच्छता बहुत रूचि के साथ करता हूं ।’’ तब उन्होंने कहा, ‘‘आप इसके आगे मत करिए। अब आप केवल समष्टि के लिए प्रार्थना और नामजप करें ।’’ अब दुर्ग की साधिका बीच-बीच में सेवाकेंद्र की स्वच्छता करती हैं ।

५. साधना के कारण आए परिवर्तन

५ अ. परेच्छा से तथा सभी से प्रेमपूर्वक व्यवहार करना

पहले मुझे बहुत क्रोध आता था । मैं बच्चोंपर बहुत क्रोधित होता था । ‘मैं जो कहूंगा, वही उन्हें करना चाहिए’, यह मेरी अपेक्षा होती थी । मैं उनके साथ किसी तानाशाह जैसा व्यवहार करता था; परंतु अब मैं परेच्छा से आचरण करता हूं । अब मुझे क्रोध नहीं आता । मैं केवल मेरे परिजनों से नहीं, अपितु सभी के साथ प्रेमपूर्वक व्यवहार करता हूं ।

५.आ माया से अलिप्त

मैं प्रत्येक बात में दूसरों का विचार करता हूं । अब मेरा संपूर्ण ध्यान केवल सनातन की ओर ही होता है । परिवार तथा धन के प्रति मेरी आसक्ति अब बहुत न्यून हुई है । किसी परिजन के घर विवाह हो, तो मैं वहां नहीं जाता, अपितु बच्चों को जाने के लिए कहता हूं ।

६. अनुभूति

६ अ. पहली छत्ती के छतपर संतुलन खोकर उल्टे गिर जाना और तब ‘प.पू. गजानन महाराजजी ने मुझे अपने हाथों में झेलकर बाजू के घर की सज्जापर बिठाया’, ऐसा प्रतीत होना

वर्ष १९८५ में घर की पहली छत्ती के कक्ष के छत का क्रांक्रीट करना था । मैं छतपर जाकर उसे देख रहा था । अकस्मात ही मेरा संतुलन खो गया और मैं उल्टा गिर पडा । भूमि से स्लैब २० फीट की ऊंचाईपर था । तब मुझे ‘प.पू. गजानन महाराजजी ने अपने हाथ में झेलकर बाजू के घर की सज्जापर बिठाया’, ऐसा प्रतीत हुआ । सभी को लगा कि अब मेरी मृत्यु हुई होगी; परंतु कुछ ही समय मेरे घर लौटने का देखकर सभी आश्‍चर्यचकित रह गया ।

६ आ. दोपहिया वाहन दुर्घटनाग्रस्त होने से मूर्च्छित होकर गिर जाना, ‘प्राण शरीर से बाहर जा चुका है तथा कुछ समय पश्‍चात शरीर से निर्गमित प्राण का पुनः शरीर में आ जाना’, ऐसा प्रतीत होना 

एक बार जब मैं प्रसार के लिए जा रहा था, तब मेरा दोपहिया वाहन दुर्घटनाग्रस्त हो गया । तब मैं मूर्च्छित हो गया था । तब मुझे यह प्रतीत हुआ कि मेरा प्राण शरीर से बाहर जा चुका है; परंतु शरीर में एक स्थानपर अवकाश बन जाने के कारण मेरी आत्मा शरीर से बाहर नहीं निकल सकती । वहां इकट्ठा लोगों को ऐसा लगा कि मेरी मृत्यु हो गई है । कुछ समय पश्‍चात शरीर से निर्गमित प्राण मेरे शरीर में पुनः प्रवेश कर गया और मैं उठकर बैठ गया । इससे वहांपर इकट्ठा लोग आश्‍चर्यचकित रह गए । अब मेरे यह ध्यान में आता है कि ईश्‍वर को मुझ से सनातन संस्था के माध्यम से साधना करवा लेनी थी; इसलिए उन्होंने मुझे बचाया ।

६ इ. एक बार मुझे सेवाकेंद्र में परात्पर गुुरु डॉक्टरजी के दर्शन हुए ।

६ ई. मुझे घर में सुगंध आती है ।

६ उ. चाहे आज मैं वयस्क हूं; परंतु केवल परात्पर गुुरुदेवजी की कृपा से मैं आज भी किसीपर निर्भर नहीं हूं ।

६ ऊ. देवताआें के चित्र तथा परात्पर गुुरु डॉ. आठवलेजी के छायाचित्र की नीला हो जाना 

पूजाघर में विद्यमान गणेशजी, श्रीकृष्णजी, हनुमानजी तथा अन्य देवताआें के चित्र, साथ ही परात्पर गुरुदेवजी के छायाचित्र नीले होते जा रहे हैं । यह उनका निर्गुण की ओर अग्रसर होने का प्रतीक है ।

चत्तरसिंहजी इंगळेजी, दुर्ग, छत्तीसगढ

स्त्रोत : दैनिक सनातन प्रभात