वैशि्वक हिन्दू राष्ट्र महोत्सव में सनातन संस्था का सहभाग


रामनाथी – हिन्दू धर्म दुराचार को अधर्म मानता है । विश्वकल्याण की भावना से काम करना भी धर्म है । योग्य कृति को ही धर्म कहा गया है । अभिव्यक्ति स्वतंत्रता के नाम पर अन्यों को पीडा देना, अधर्म है । अभिव्यक्ति स्वातंत्रता की मुख्य अडचन यह है कि अभिव्यक्ति स्वतंत्रता अथवा स्वैराचार ? इसे निश्चित कौन करेगा ? अभिव्यक्ति स्वतंत्रता वास्तव में कौनसी है ? इसकी दिशा भारतविरोधी शक्तियों ने निश्चित की है । इसमें वाममार्गीय शक्तियों का गठबंधन है । अभिव्यक्ति स्वतंत्रता का अनावश्यक प्रसार किया गया है । यह अभिव्यक्ति स्वतंत्रता साम्यवादी, वाममार्गीय, नक्सलवादी जैसी राष्ट्रविरोधी शक्तियों के पक्ष में झुकी है । संविधान के अनुच्छेद १९ (१ ए) अनुसार प्रत्येक को अभिव्यक्ति स्वतंत्रता है; परंतु १९ (२) अनुसार भारत के अखंडत्व की दृष्टि से अभिव्यक्ति स्वतंत्रता को प्रतिबंध भी लगाया गया है । वर्तमान में अभिव्यक्ति स्वतंत्रता का उपयोग सुविधानुसार किया जा रहा है । शबरीमला मंदिर में स्त्रियों के प्रवेश के लिए अभिव्यक्ति स्वतंत्रता का सूत्र उपस्थित किया जाता है; परंतु अन्य धर्मियों के विषय में ये अभिव्यक्ति स्वतंत्रतावाले मौन साध जाते हैं, ऐसे उद्गार सनातन संस्था के प्रवक्ता श्री. चेतन राजहंस ने किए । वे यहां हो रहे वैश्विक हिन्दू राष्ट्र अधिवेशन के छठे दिन उपस्थितों को संबोधित कर रहे थे ।
हिन्दू राष्ट्र के इस धर्मयुद्ध में चाहे कितनी भी बाधाएं आएं; परंतु हम निरंतर आगे बढते रहेंगे ! – पू. रमानंद गौडाजी, धर्मप्रचारक, सनातन संस्था


रामनाथी (फोंडा) – सभी धर्माभिमानी हिन्दू राष्ट्र स्थापना का धर्मयुद्ध लड रहे हैं । उसके कारण इस कार्य में स्थूल एवं सूक्ष्म स्तर पर विभिन्न बाधाएं आती रहती हैं; परंतु तब भी भगवान की कृपा से हम इन बाधाओं पर विजय प्राप्त कर निरंतर आगे बढने का प्रयास करते ही रहेंगे, ऐसा प्रतिपादन सनातन संस्था के धर्मप्रचारक पू. रमानंद गौडाजी ने ‘वैश्विक हिन्दू राष्ट्र महोत्सव’ के अंतिम दिन किया ।
उन्होंने आगे कहा,
१. यह धर्मयुद्ध लडते समय विभिन्न बाधाएं आती हैं; इसलिए उन पर विजय प्राप्त करने के लिए साधना करनी चाहिए । साधना से हमें आध्यात्मिक बल मिलता है, साथ ही हमारे कार्य को भगवान का अधिष्ठान प्राप्त होता है । उसके कारण हम अपना कार्य अधिक अच्छे ढंग से कर सकते हैं तथा निरंतर आगे बढते जाते हैं ।
२. साधना से हमारे इर्द-गिर्द सुरक्षाकवच निर्माण होता है, जिससे अनिष्ट शक्तियों से हमारी रक्षा होती है ।
३. प्रारब्ध के अनुसार प्रत्येक मनुष्य को सुख-दुख भोगना पडता है । धर्मकार्य करते समय कभी पुलिस प्रशासन का दबाव होता है, तो कभी समाज का भी विरोध होता है । हमारी साधना हो, तो ऐसी प्रतिकूल स्थिति में भी हम स्थिर रह सकते हैं, साथ ही हमारा कार्य अखंडित जारी रख सकते हैं ।
४. सनातन के साधकों की भगवान पर श्रद्धा होने से उनके मुख पर तेज होता है, साथ ही उनकी अनिष्ट शक्तियों से रक्षा होती है ।
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