साधकों से होनेवाली चूकों अथवा अनुचित विचारों के पीछे उनके स्वभावदोष एवं अहं होते हैं । इसके अतिरिक्त, प्रारब्ध, कालमाहात्म्य के अनुसार कालगति और अनिष्ट शक्तियों से उत्पन्न होनेवाले कष्ट भी होते हैं ।
१. प्रारब्ध : बुद्धि कर्मानुसारिणी, अर्थात पूर्व जन्मों के कर्म (प्रारब्ध) जैसे होते हैं, उसी प्रकार के कर्म करने का विचार वर्तमान में बुद्धि को सूझता है ।
२. कालगति : युधिष्ठिर धर्मराज थे, फिर भी उन्हें द्यूत में सर्वस्व लगाने की बुद्धि हुई । यह कालगति के ही कारण हुआ !
३. अनिष्ट शक्तियों से होनेवाले कष्ट : विशेषतः तीव्र आध्यात्मिक कष्ट से पीडित लोगों के विषय में यह बात अधिक लागू होती है ।
आजकल साधकों से अधिक चूकें हो रही हैं अथवा उनसे अनुचित विचार होते हैं । इससे वे हताश होते हैं । उनके मन में नकारात्मक विचारों की श्रृंखला आरंभ होती है कि यह विचार मेरे मन में आया ही कैसे, मुझे ऐसा आचरण नहीं करना चाहिए था, मुझसे साधना के प्रयत्न ठीक से नहीं होते, अब मुझसे साधना ठीक से नहीं होगी …। ऐसे विचारों से उनकी साधना का समय एवं ऊर्जा, दोनों व्यर्थ जाते हैं । साधक अपनेआप को ऐसी विचारश्रृंखलाआें में न जकडें, अपितु उपर्युक्त दृष्टिकोण अपनाकर उनसे शीघ्र बाहर निकलने को विशेष महत्त्व दें । भूतकाल से सीखना (चूक का मूल स्वभावदोष और अहं का प्रकार समझना), वर्तमान को संवारना (स्वभावदोष और अहं निर्मूलन के लिए स्वसूचना लेेना और आवश्यकतानुसार आध्यात्मिक उपाय करना) तथा भविष्य में सतर्क रहना (भविष्य में मन की स्थिति अस्थिर न हो, इसके लिए अच्छे साधक से बात कर मन की रुकावटें हटाना अथवा अधिक उचित दृष्टिकोण जानना तथा मन पर ठीक से प्रक्रिया करना), इस त्रिसूत्री के अनुसार साधना करें । ऐसा करने पर, साधकों की साधना का अमूल्य समय और शक्ति बचेगी तथा प्रगति शीघ्र होगी ।
– (पूज्य) श्री संदीप आळशी । (२४.६.२०१६)

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