प.पू. गुरुदेव की अपार कृपा से संत देखने गया एवं संत ही बन गया, एेसी अनुभूति लेनेवाले सनातन के १९ वें संत पू. रमेश गडकरीजी

मेरी साधना की यात्रा के संबंध में सटीक क्या लिखूं, यह मैं समझ नहीं पा रहा था; परंतु लगा कि गुरुदेव ही लिखवा लेंगे । उसके अनुसार बाल्यावस्था से एक एक घटनाक्रम का स्मरण होता गया । सनातन संस्था में आने से पूर्व के प्रसंग तथा जानकारी लिखते समय गुरुदेव ने मुझे किस प्रकार संभाला है, इसका भान होकर मेरा कृतज्ञताभाव बढ गया । एेसा नहीं है कि संस्था में आने के उपरांत ही परात्पर गुरुदेव ने मेरी चिंता की है, अपितु बाल्यावस्था से ही तथा पूर्व जन्मों में भी वे मेरी चिंता कर रहे थे, इसकी प्रतीति मुझे पूर्व प्रसंग लिखते समय हुर्इ ।

मेरे स्मरण में रहनेवाले प्रसंग एवं साधना की यह यात्रा हिमनग का केवल एक सिरा है । प्रत्यक्ष में गुरुदेव ने मुझे स्थूल आैर सूक्ष्म रूप से संभाला है । प्रत्येक अच्छे-बुरे प्रसंग में मुझसे साधना करवाकर मेरी प्रगति की तथा मुझे सदैव आनंद दिया है । श्रीविष्णुस्वरूप परात्पर गुरु डॉक्टरजी के कारण ही मेरी प्रगति हो पार्इ । मैं उनके चरणों में अनंत कोटि कृतज्ञता व्यक्त करता हूं । 

 

१. बाल्यावस्था

१ अ. पढने में रुचि होने के कारण अत्यधिक पढने के कारण वैचारिक बैठक उत्पन्न होना

मेरा जन्म ३०.७.१९५७ को कोल्हापुर में हुआ । मुझे बचपन से ही अन्य पुस्तकें पढने में रुचि थी । मुझे रहस्यमय उपन्यास पढने में रुचि थी । मर्इ की छुट्टियों में मामा के घर कोल्हापुर जाने पर उनके संग्रहालय में रखे ऐतिहासिक, सामाजिक तथा पौराणिक ग्रंथ एवं उपन्यास मैं पढता था । इसलिए मुझ पर उसी प्रकार के संस्कार होते गए । उससे मुझे अलग अलग विषयों का ज्ञान मिला एवं र्इश्वर की कृपा से वैचारिक बैठक प्राप्त हुर्इ ।

१ आ. पुरानी सामग्री से नर्इ वस्तुएं बनाने की रुचि उत्पन्न होना

मैं पुरानी सामग्री से अलग अलग यंत्र बनाता था । मेरे मामा की घडी की दुकान थी । मैंने सामग्री आैर यंत्रों को जोडकर चलचित्र का एक छोटा प्रोजेक्टर बनाया था । मेरे पिताजी विद्युत संबंधी निजि काम करते थे । मैं ५ वीं-६ वीं में था, तब उनके साथ सहायता के लिए जाता था । इसलिए र्इश्वर की दया से नर्इ नर्इ वस्तुएं बनाने की रुचि उत्पन्न हुर्इ । आगे सनातन संस्था में आने के पश्चात प्रसार तथा आश्रम के लिए आवश्यक वस्तुआें का आरेखन (ड्रॉईंग) आैर रचना मैं गुरुकृपा से सहजता से कर पाया ।

१ इ. बचपन से राष्ट्रप्रेम की घुट्टी मिलना

मैं नियमित संघ की शाखा में जाता था । वर्ष १९७१ के भारत-पाक युद्ध के समय मुझे लगता था कि सेना में जाकर वीरता दिखानी चाहिए । मुझे लगता है कि इस प्रकार र्इश्वर की कृपा से ही मुझे बचपन से राष्ट्रप्रेम की घुट्टी मिली ।

बचपन से ही मुझे निरंतर लगता था कि मुझे साधारण जीवन व्यतीत नहीं करना है । मुझे संसार से अलग कुछ बनना है; परंतु क्या बनना है, यह ज्ञात नहीं था ।

१ ई. अभिनय आैर संगीत कला से संबंध !

१ ई १. नाटकों में छोटी-बडी भूमिका करना

पांचवी कक्षा में मैंने मराठी नाटक ‘रायगडाला जेव्हा जाग येते’ में बाल राजाराम की भूमिका की थी । बडा होने पर रसायनी (जि. रायगड) में कला क्रीडा मंडल की आेर से होनेवाले नाटकों में छोटी-बडी भूमिकाएं करने का अवसर मिला, उदा. कवडीचुंबक, कोलंबस, काळोख देतो हुंकार इत्यादि ।

१ ई २. संगीत की रुचि

मेरी माताजी ने मुझे संगीत की कक्षा में भेजा था । इसलिए मुझे संगीत में रुचि उत्पन्न हुर्इ ।

१ ई ३. मामा के कारण मान्यवर व्यक्तियों से संपर्क होना

मेरे मामा का मित्रपरिवार बडा था । इसलिए कोल्हापुर के चलचित्र सृष्टि के कलाकार, प्राध्यापक, समाजश्रेष्ठी तथा धार्मिक क्षेत्र के व्यक्तियों से मेरा संपर्क हुआ ।

 

२. विद्यालयीन शिक्षा

२ अ. विद्यालयीन जीवन से साइकिल पर भ्रमण करने में रुचि उत्पन्न होना

पहली से छठवीं तक की शिक्षा मैंने पैदल चलकर ली । तत्पश्चात सातवीं से ग्यारहवीं तक हिन्दुस्थान ऑरगैनिक केमिकल्स के विद्यालय में पढकर ६० प्रतिशत अंक प्राप्त कर मैं ग्यारहवीं (एस.एस.सी.) की परीक्षा उत्तीर्ण हुआ । विद्यालयीन जीवन में मुझे साइकिल से भ्रमण करने में रुचि उत्पन्न हुर्इ । मैं वर्ष में एक बार साइकिल से महाड, पाली का गणपति तथा रामबाग (अलीबाग) घूमने जाता था । कुछ स्थानों पर मैं पैदल भ्रमण भी करता था ।

२ आ. महाविद्यालयीन शिक्षा

१९७८ में मैंने विद्युत अभियांत्रिकी की पदवी प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की । महाविद्यालय में मैंने निश्चित किया था कि नौकरी लगने पर तुरंत विवाह करूंगा । दो संतानों को जन्म देने के पश्चात ४५ वर्ष की आयु में नौकरी अथवा व्यवसाय जो भी हो, उसे बंद कर समाज, राष्ट्र अथवा धर्म में से एक कार्य को समर्पित हो जाऊंगा । तत्पश्चात एेसा ही होता चला गया ।

 

३. पारिवारिक वातावरण एवं देव-धर्म आदि में रुचि !

३ अ. परिजनों की भगवान नवनाथ की पोथी पर
श्रद्धा होने के कारण प्रतिदिन उस ग्रंथ के कुछ छंद पढने पडना

हमारे घर में धार्मिक वातावरण था । सबेरे की पूजा पुरुष ही करेंगे, एेसा नियम होने के कारण अधिकतर पूजा मुझे करनी पडती थी । परिजनों की श्रद्धा भगवान नवनाथ की पोथी पर होने के कारण प्रतिदिन उस ग्रंथ के कुछ छंद मुझे पढने पडते थे । किसी भी महत्त्वपूर्ण काम के लिए जाते समय भगवान नवनाथ की पोथी को बताकर जाने पर इच्छित कार्य संपन्न होता है, एेसी सबकी श्रद्धा थी ।

३ आ. दादाजी ने स्वर्णकार का काम छोडकर समाज के लिए पौरोहित्य करना

मेरे दादाजी स्वर्णकार थे; परंतु समाजबंधुआें के सम्मेलन में दैवज्ञ समाज के लिए पौरोहित्य करनेवाला कोर्इ नहीं है, यह प्रश्न उपस्थित होने से मेरे दादाजी अच्छा चलनेवाला स्वर्णकार का व्यवसाय छोडकर समाज के लिए पौरोहित्य सीख लिया आैर वे पौरोहित्य करने लगे ।

३ इ. दादी जागृत हनुमानजी की उपासक थीं तथा गांव के लोगों को आध्यात्मिक कष्ट होने
पर उनका नामजपादि उपचारों के लिए दादी के पास आना तथा उनके उपचारों से वे ठीक होना

मेरी दादी सांगली के निकट स्थित तुंग नामक गांव के जागृत हनुमानजी की उपासक थीं । वर्ष १९३३ में प्लेग के संक्रमण में संपूर्ण गांव संक्रमण के भय से घर छोडकर बाहर चला गया था; परंतु दादी भगवान की उपासना के लिए गांव में ही रुकी थीं । दादी को प्लेग की गांठ होने पर भी उन्होंने उपासना नहीं छोडी । प्रत्यक्ष हनुमानजी ने उनकी रक्षा की है, यह उनकी श्रद्धा थी । उनसे हनुमानजी प्रसन्न हैं, एेसी गांववालों की श्रद्धा थी । गांव में किसी को भी आध्यात्मिक कष्ट होने पर वे नामजपादि उपचारों के लिए दादी के पास आते थे । उनके उपचारों से वे ठीक भी हो जाते थे ।

३ ई. बचपन से समष्टि कार्य, आध्यात्मिक एवं धार्मिक सेवा की विरासत दादा-दादीजी से मिलना

शनिवार को तथा नवरात्रि की अवधि में दादी जी को संचार होता था । उस समय उनके मुख से हनुमान जी के भुःभुःकार के समान आवाज आती थी । घर में धार्मिक आैर आध्यात्मिक वातावरण था, तब भी मुझपर आधुनिक शिक्षा तथा तथाकथित आधुनिकतावाद का प्रभाव होने के कारण मुझे वह सर्व झूठ लगता था । दादी के नामजपादि उपचारों का अन्यों को होनेवाला लाभ मुझे केवल संयोग लगता था । कुछ धर्मद्रोही लोग जिस प्रकार परीक्षा लेते हैं, वैसा हम करते थे । लोगों में संचार होने पर हम साप आने की बात कहते थे । उस समय ढोंग करनेवाले भगत वहां से भाग जाते थे; परंतु दादी वहीं रुकती थीं । उन पर इसका कोर्इ परिणाम नहीं होता था । अब मुझे लगता है कि दादीजी को सूक्ष्म का ज्ञान था । आध्यात्मिक उपचार बताने का आत्मबल उनमें था तथा भगवान उनके माध्यम से अनेक दुःखी लोगों का काम करते थे ।

इस प्रकार बचपन से मुझे मेरे दादा-दादी से समष्टि कार्य, आध्यात्मिक तथा धार्मिक सेवा की विरासत मिली । मैं व्यवसायी था तथा र्इश्वर पर मेरी श्रद्धा थी; परंतु समाज तथा परिजनों में से धर्मकार्य करनेवालों की बातें आैर कृत्य के बीच जो भेद था, वह मेरे ध्यान में आता था । इसलिए मैं भगवान का कुछ नहीं करता था ।

 

४. नौकरी एवं विद्युत क्षेत्र का ठेकेदारी का व्यवसाय !

वर्ष १९७८ – १९७९ की अवधि में मैं सहायक विद्युत निरीक्षक (इलेक्ट्रिकल इन्स्पेक्टर) के पद पर मुंबई में नौकरी करता था; परंतु वहां के भ्रष्टाचारी जीवन से ऊबकर मैंने नौकरी छोड दी । वर्ष १९७९ – १९८० में देवगढ (जनपद सिंधुदुर्ग) में जीवन प्राधिकरण में कनिष्ठ विद्युत अभियंता पद पर नौकरी करता था । मुंबई की अपेक्षा कोकण भूमि सात्त्विक, प्राकृतिक सौंदर्य से युक्त आैर संतों की पुण्यभूमि होने के कारण र्इश्वर ने ही मुझे देवगढ में नौकरी लगार्इ । वर्ष १९८१ से २००३ तक मेरा उमेश इलेक्ट्रिकल्स के नाम से विद्युत क्षेत्र का ठेकेदारी का व्यवसाय था । मेरे पास ४० स्थार्इ तथा १०० रोजंदारी करनेवाले श्रमिक थे । इस व्यवसाय में मुझे अच्छा लाभ होता था ।

 

५. दासबोध में बताए अनुसार साधना करने के लिए किए हुए प्रयास

५ अ. व्यवसाय में आर्थिक तनाव तथा उस अनुषंग से घर के तनाव के कारण घर से निकल जाना

वर्ष १९८४ में व्यवसाय के आर्थिक तनाव एवं उसके अनुषंग से घर में उत्पन्न तनाव के कारण मैंने घर छोडने का निश्चय किया । मैं घर से निकल गया; परंतु जाते समय मित्र से लाया हुआ ग्रंथ दासबोध मेरे साथ था । मैंने कहां जाना है, यह निश्चित नहीं किया था । मेरे साथ दोपहिया वाहन तथा थोडी नगद राशि थी । जहां दो मार्ग सामने आते थे, वहां दायें मार्ग पर दोपहिया वाहन मोड देता था, एेसा करते हुए मैं गोवा के मार्ग पर पहुंच गया ।

५ आ. शिवथर घळ पहुंचने पर दासबोध पढना तथा वहां की दादी ने
तुम घर बताकर आए हो न, यह पूछकर चूक का भान करवाकर घर जाने हेतु कहना

महाड तक पहुंचने पर दोपहिया वाहन का र्इंधन समाप्त हो गया आैर रात भी हो गर्इ थी । इसलिए मैं एक विश्रामगृह में रुक गया । रात्रि के दासबोध पढने बैठा । तब प्रस्तावना पढते समय मुझे पता चला कि महाड स्थित शिवथर घळ दासबोध का जन्मस्थान है । वहां जाकर नया जीवन प्रारंभ करने का निश्चय कर सबेरे मैं शिवथर घळ पहुंचा । वहां एक वृद्ध दंपत्ति सेवा करते थे । मैंने उन्हें बताया कि दासबोध पढना है एवं वहां रह गया । मैं प्रातः ४ बजकर उठकर ठंडे जल से स्नान कर दिन भर किसी से बात न करते हुए दासबोध पढता था । दो दिन होने के पश्चात वहां की दादी ने मुझे पूछा कि तुम किसी से बोलते नहीं हो । तुम घरपर बताकर आए हो न ? मैंने उन्हें सत्य स्थिति बतार्इ । तब दादी ने मुझे मेरी चूक का भान करवाया आैर तुरंत घर लौटने हेतु कहा ।

५ इ.दासबोध पढने के कारण संसार छोडकर जाना कायरता है, यह ध्यान में आकर घर लौटना

दासबोध पढते समय मेरे ध्यान में आ गया था कि तनाव से घबराकर संसार छोडना कायरता है । दूसरे दिन मैंने दादी से कहा कि मेरा दासबोध का पारायण पूर्ण हो रहा है, मैं घर लौट जाऊंगा । दूसरे दिन मैं घर लौट आया । इन ३ दिनों में परिजनों ने अनेक स्थानों पर खोजकर भगवान की प्रतिमाएं पानी में रखी थीं ।

५ ई. दासबोध में बताए अनुसार आचरण का प्रयास करने पर
बाह्यतः वर्तन सुधरना; परंतु स्वयं में आंतरिक परिवर्तन प्रतीत न होना

इसके पश्चात मैं प्रति वर्ष शिवथर घळी में दासबोध नवमी के उत्सव में जाने लगा । शिवथर घळी के जीर्णोद्धार के लिए मैंने घर-घर जाकर अर्पण एकत्रित किया । आगे लगभग २ वर्ष तक मैंने दासबोध में बताए अनुसार वर्तन करने का प्रयास किया । इसलिए बाह्यतः वर्तन सुधरने पर भी मुझे स्वयं में परिवर्तन प्रतीत नहीं हो रहा था तथा मेरे व्यवसाय के कारण झूठ न बोलना, दूसरें को आहत न करना आदि साधारण बातों पर आचरण करना मेरे लिए कठिन हो रहा था । इसलिए मुझे छटपटाहट होती थी । इस प्रकार २ वर्ष साधना के प्रयास करने पर भी मुझे अपेक्षित आनंद नहीं मिला ।

 

६. सनातन से संपर्क !

६ अ. प्रवचन सुनने पर ध्यान में आना कि व्यावसायिक एवं प्रापंचिक
समस्याएं मंद प्रारब्ध है एवं नामजप करना प्रारंभ करने पर ८ दिनों में ही व्यवहारिक बाधाएं घटना

मैं एक रविवार को रसायनी, पनवेल स्थित बाजार गया था, तब मुझे बस स्थानक के निकट एक कपडे का फलक दिखार्इ दिया । उस पर लिखा था अच्छा साधक कैसे बनें ? मैंने दासबोध पढा था । अतः साधक, साधना शब्दों को मैं निकट से जानता था । तब यह प्रवचन सुनने के लिए मैं वहां पहुंचा । वहां नागोठणे के श्री. बापू रावकर ने प्रवचन दिया । उसका शास्त्रीय विश्लेषण दासबोध से मिलता जुलता था । वहां नामजप के संबंध में एवं मंद, मध्यम आैर तीव्र प्रारब्ध के संबंध में बताया गया । तब मेरे ध्यान में आया कि मेरी व्यावसायिक एवं सांसारिक समस्याएं मेरा मंद प्रारब्ध है । ये समस्याएं केवल कुलदेवता की ६ मालाएं आैर दत्त भगवान की ९ मालाएं जप करने से हल हों जाएंगी । मैंने ॐ ऐं र् हीं क्लीं चामुंडाएै विच्चै । यह कुलदेवता का मंत्रजप हजारों माला किया था । इसलिए मुझे ६ तथा ९ माला जप एकदम सरल प्रतीत हुआ । मैंने वैसा जप किया करने पर ८ दिन में ही मेरी व्यावहारिक बाधाएं घट गर्इं ।

६ आ. एक वर्ष साधना करने पर भी परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी
के अभ्यासवर्ग में न जाना आैर यह अभ्यासवर्ग अंतिम है, यह ज्ञात होने पर उस वर्ग में जाना

तत्पश्चात श्री. नाना वर्तक, वैद्य विनय भावे (वर्तमान पू. विनय भावे), आदि साधकों के प्रवचन सुनकर मैं सनातन के बताए अनुसार गुरुकृपायोगानुसार साधना करने लगा । इससे मुझे इतने दिन न मिलनेवाला आनंद मिलने लगा । उस समय परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी प्रत्येक मास पनवेल आकर स्वयं अध्यात्मशास्त्र के अभ्यासवर्ग लेते थे । मुझे इस वर्ग में आने के लिए श्री. बापू रावकर बताते थे; परंतु मैंने निश्चित किया था कि किसी भी बाबा के चक्कर में नहीं पडना है, इसलिए मैं एक वर्ष साधना कर भी इस वर्ग में नहीं गया । एक बार श्री. बापू रावकर ने बताया कि यह अंतिम अभ्यासवर्ग है आैर इसके पश्चात प.पू. गुरुदेव वर्ग नहीं लेंगे । तब अध्यात्म को शास्त्रीय भाषा में समझानेवाले व्यक्ति को देखने मैं उस वर्ग में गया ।

६ इ. संत कैसे होते हैं ?, यह जिज्ञासा होना तथा परात्पर गुरु
डॉ. आठवलेजी की कृपा से संतदर्शन का तथा संत बनकर संतों के साथ रहने का भाग्य मिलना

नौकरी करते समय मेरे मन में विचार आते थे कि क्या वर्तमान में वास्तव में संत होते हैं ? इस संबंध में मैंने अपने मामा से चर्चा कर रहा था, तब उन्होंने मुझे पिंगुळी, कुडाळ के संत राऊळ महाराज का नाम बताया । तब संत देखने की जिज्ञासा से मैं पिंगुळी, कुडाळ अनेक बार गया; परंतु आश्चर्य है कि मुझे राऊळ महाराज का एक बार भी दर्शन नहीं हुआ । उस समय मुझे लगा कि मैं साधना में न्यून पड गया हूं । वर्ष १९९३ में सनातन संस्था में आने पर मेरी यह इच्छा प.पू. गुरुदेवजी ने पूर्ण की । उस समय प.पू. गुरुदेवजी की कृपा से मुझे प.पू. भक्तराज महाराज, घाटकोपर के प.पू. जोशीबाबा, सावंतवाडी के प.पू. भाऊ मसूरकर, प.पू. रामानंद महाराज आदि संतों का दर्शन आैर सत्संग मिला । आगे प्रसार के लिए जाने पर मुझे गुरुकृपा से अनेक संतों का सत्संग मिला । उन्हीं की कृपा से मुझे सनातन के आश्रम में सनातन के संतों के साथ रहने का भाग्य मिला । संत तुकाराम महाराज ने कहा है, देव देखने गया तथा देव ही बन गया । उसी प्रकार प.पू. गुरुदेव की अपार कृपा से संत देखने गया आैर संत ही बन गया, एेसी बडी अनुभूति मुझे गुरुदेव ने दी ।

– (पू.) श्री. रमेश गडकरी, सनातन आश्रम, देवद, पनवेल.

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