निरपेक्ष प्रेम के कारण सदैव दूसरों का विचार करनेवाले तथा प्रत्येक कृत्य सुंदर तथा आदर्श पद्धति से करनेवाले सनातन के ११वें संत पू. संदीप आळशीजी

२७ जुलाई २०१८ को आषाढ पूर्णिमा अर्थात गुुरुपूर्णिमा थी । इस गुुरुपूर्णिमा के उपलक्ष्य में साधकों को लाभप्रद हो; इसके लिए गुुरुकृपायोग के माध्यम से तीव्रगति से आध्यात्मिक उन्नति कर संतपद को प्राप्त किए हुए सनातन के कुछ संतों की साधनायात्रा की जानकारी दे रहे हैं । फरवरी से जून २०१७ की अवधि में कु. गौरी मुदगल (आयु १७ वर्ष) पू. संदीप आळशीजी के लिए काढा बनाने की सेवा करती थी । इस कालावधि में उसे पू. संदीपभैय्या से सिखने मिले सूत्र तथा सेवा करते समय प्राप्त अनुभूतियां यहां दे रहे हैं । कु. गौरी के लेखन से उसकी सिखने की तडप ध्यान में आती है, साथ ही यदि ऐसी तडप हो, तो ईश्‍वर किस प्रकार से सहायता करते हैं तथा छोटे-छोटे कृत्यों से भी वह कैसे बनता है, यह ध्यान में आएगा

 

१. दूसरों का विचार करना

१ अ. स्वयं को काढा समयपर मिलने की अपेक्षा,
उसे देनेवाली साधिका की नींद पूर्ण होने के लिए प्रधानता देना

गुरुकृपा से मुझे पू. संदीपभैय्या को काढा बनाकर देने की सेवा मिल गई । पू. भैय्या को सुबह ८ बजने से पहले काढा देना होता था । उसके लिए मैं सुबह ६ बजे उठती थी । उसके पश्‍चात स्वयं का समेटकर ७.३० बजेतक काढा बनाकर मैं उसे पू. भैय्या को देने के लिए जाती थी । पू. भैय्या ने मेरा दिनक्रम जान लिया और कहने लगे, तुम इतना शीघ्र मत उठो । पहले तुम अपनी नींद पूरी करो । काढा उसके पश्‍चात ला दिया, तो भी चलेगा । काढा देने का समय १० मिनट आगे-पीछे होने से भी चलेगा ।

कभी-कभी मैं पू. भैय्या को कोई वस्तु देने के लिए जाती थी । तब वे कहते थे, तुम अपनी सेवा छोडकर इतनी सी बात के लिए शीघ्रता से २ सीढीयां चढकर उपर मत आना । (पू. भैय्या तिसरी मंजिलपर रहते हैं ।) जब अन्य किसी काम से तुम इधर आओगी, तब देने से भी चलेगा ।

१ आ. प्रसाद देने आए साधिका को पू. संदीपभैय्या द्वारा
स्वयंआसंदी लाकर दी जाना तथा उनमें समष्टि के प्रति अर्थात
प्रत्येक साधक के प्रति प्रेम होने से उनके द्वारा ऐसी कृती सहजता से होना

एक बार परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी द्वारा मुझे दिया गया प्रसाद मैं पू. भैय्या को देने गई थी । मेरे साथ बात करते-करते ही वे एक आसंदी ले आए । मुझे लगा कि उन्होंने अपने लिए आसंदी लाई होगी; परंतु वास्तव में उन्होंने मुझे ही उस आसंदीपर बैठने के लिए कहा । उसके पश्‍चात पू. भैय्या ने अत्यंत भावपूर्ण पद्धति से प्रार्थना कर प्रसाद ग्रहण किया ।

इस घटना से पू. भैय्या स्वयं की अपेक्षा दूसरों का अधिक विचार करते हैं तथा अपने कारण समष्टि को कष्ट न हो, यह उनका उद्देश्य होता है, यह मेरे ध्यान में आया । उन्हें ऐसे कृत्य करना सूझता है; क्योंकि उनमें समष्टि के प्रति अर्थात प्रत्येक साधके के प्रति बहुत प्रेम है !

 

२. निरपेक्ष प्रेम

२ साधिका से मिलना न होने से पू. भैय्या द्वारा उसका हाल पूछा जाना

कुछ दिन पश्‍चात मैं पू. भैय्या के लिए काढा बनाकर उसे कक्ष में रहकर तुरंत वापस जाने लगी । उसके कारण मेरी उनके साथ अधिक बात नहीं होती थी । ७.३.२०१७ को पू. भैय्या ने उनकी पत्नी श्रीमती अवनीदीदी के माध्यम से मेरा हाल पूछते हुए पूछा था, गौरी कैसी है ?, उसके मन की स्थिति कैसी है ?, यह सुनकर ईश्‍वर मेरी कितनी चिंता करते हैं, ऐसा लगकर मुझे बहुत कृतज्ञता प्रतीत हुई ।

२ आ. काढा बनाकर देना बंद होनेपर भी
वह मुझसे मिलने कभी भी आ सकती है, ऐसा पू.
भैय्या द्वारा बताया जाना तथा परात्पर गुुरु डॉक्टरजी
के कारण हम साधकों को इस प्रकार से संतों के निरपेक्ष प्रेम का
अनुभव होने के कारण साधिका को उस विषय में कृतज्ञता प्रतीत होना

कुछ दिन पश्‍चात वैद्यजी ने पू. भैय्या को काढा बंद करने के लिए कहा । तब मेरे मन में अब मुझे पू. भैय्या के पास जाने नहीं मिलेगा, इस विचार से अस्वस्थता उत्पन्न हुई । तब मैने मेरे मन को समझाया कि यह ईश्‍वरेच्छा ही है । उसके पश्‍चात मैं पू. भैय्या के पास गई । तब उन्होंने मुझसे कहा, काढा देने के कारण से तुमसे मेरा मिलना होता था । अब तुम नहीं आई, तब भी मुझे तुम्हारा स्मरण होगा । तब मैने कहा मुझे भी आपका स्मरण होगा । उसपर उन्होंने कहा, तुम मुझसे मिलने कभी भी आ सकती हो । मुझे कोई समस्या नहीं है । उनकी इन बातों से पू. भैय्या जैसे संतों का निरपेक्ष प्रेम कैसा होता है, यह मेरे ध्यान में आया ।

केवल गुरुदेवजी ने ही सभी को एकत्रित लाकर उनमें इस प्रकार का प्रेम उत्पन्न कर सभी को एक-दूसरे से जोडकर रखा है । इस प्रकार के दैवीय नाते का मुझे अनुभव होने से मुझे गुुरुदेवजी के प्रति कृतज्ञता प्रतीत हुई ।

 

३. पू. भैय्या की साधक सिद्ध करने की तडप

३ अ. साधक से चूक न हो, इस प्रकार से उसे सेवा समझाकर बताने की सरल पद्धति !साधक को कोई भी सेवा समझाकर बताने की पू. भैय्या की पद्धति अत्यंत सुंदर तथा सरल है । एक बार उन्होंने मुझे काढा बनाने की संपूर्ण कृती मुझे समझ में आएगी, इस भाषा में बताई तथा क्या तुम्हारी समझ में आया ?, ऐसा ही प्रेम से पूछा । उन्होंने कहा, हमें प्रत्येक सेवा योग्य पद्धति से तथा परिपूर्ण ही करनी चाहिए । आरंभ में चूकें होंगी, उसके कोई समस्या नहीं है; परंतु उस चूक से सीखकर साधक को आगे जाना चाहिए । जब मैं काढा बनाना आरंभ किया, तब उन्होेंने इस सेवा के लिए कितना समय लगता है ?, उसे बनाते समय कौनसी समस्याएं आती हैं ? तथा अधिक समय किस में लगता है ?, यह जान लिया और उसके पश्‍चात उन्होंने मुझे इन समस्याआें का समाधान कैसे किया जा सकता है, वह बताया । इससे सेवा के लिए जितना समय आवश्यक है, उतने ही समय में वह सेवा की जानी चाहिए तथा साधक की फलनिष्पत्ती भी अच्छी होनी चाहिए, यह उनकी तडप मेरे ध्यान में आई ।

३ आ. साधिका को समस्या का समाधान बताते समय
पू. संदीपभैय्या द्वारा किया गया सर्वांगीण मार्गदर्शन तथा वह सुननेपर पू. भैय्या
की साधक को बनाने में होनेवाली तडप के विषय में साधिका द्वारा किया गया चिंतन

एक बार मैं पू. संदीपभैय्या को मेरी समस्या बताई कि कुछ बातें मेरे ध्यान में न आने से साधक मुझपर हंसते हैं । उससे मुझे बुरा लगता है । उसपर पू. भैय्या ने निम्न सूत्र बताए, जिससे कि मैं उस नकारात्मक स्थिति से बाहर आ गई ।

१. हमें दूसरों की बातों में लिप्त न होकर उन शब्दों के अगले चरण में जाना चाहिए । हम यदि निरंतर सिखनी की स्थिति में रहे, तो यह ध्यान में आता है कि ईश्‍वर हमें एक-एक सीढी आगे-आगे ही ले जाते हैं ।

२. प्रत्येक साधक की क्षमता के अनुरूप ईश्‍वर उसे सेवा देते हैं ।

३. साधकों की प्रकृतियां भिन्न-भिन्न होने से वे उस पद्धति से बात करते हैं । उसका बुरा नहीं मान लेना चाहिए । साधक मुझे क्या कहते हैं ?, इसकी अपेक्षा मैं ईश्‍वर के अनुसंधान में कैसे रह सकता हूं ? तथा मैं ईश्‍वर की कैसे अनुभूति कर सकता हूं ?, इसकी ओर ध्यान देना चाहिए । ऐसी घटनाआें की अनदेखी कर ईश्‍वर ने हमें क्या दिया है, इस विषय में कृतज्ञताभाव बढाने के लिए प्रयास करने चाहिएं ।

४. अब आश्रम ही हमारा घर होने से सभी साधक अपने ही हैं । इसके पश्‍चात पू. भैय्या ने अन्य साधकों द्वारा ऐसी चूक न हो, इसके लिए अज्ञानवश भी साधकों को आहत करना पाप है !, इस अर्थ की एक चौकट भी बनाकर दी ।

पू. भैय्या के उपर्युक्त विवेचन से ऐसा लगा कि वे प्रत्येक घटना का परिपूर्ण पद्धति से अध्ययन करते हैं । प्रत्येक साधक को साधना में आगे जाने के लिए क्या करना चाहिए ?, इसपर भी वे विचार करते हैं । इसके पश्‍चात मेरे मन में व्याप्त सभी अर्थहीन विचार न्यून होकर मेरा मन हल्का बन गया । साधना में मेरी उन्नति हो, इसकी तडप मेरी अपेक्षा पू. भैय्या में ही अधिक होने का प्रतीत होकर मुझे उनके प्रति कृतज्ञता प्रतीत हुई ।

३ इ. परिपूर्ण सेवा के विषय मे मार्गदर्शन

एक बार परिपूर्ण सेवा के विषय में बोलते हुए पू. भैय्या ने कहा, ईश्‍वर प्रत्येक साधक को उसकी प्रकृति तथा क्षमता के अनुसार अलग-अलग सेवाएं देते हैं । तुम जिस प्रकार से चित्र बनाती हो अथवा कलाकृति बनाती हो, वैसा मुझे नहीं आता और मेरी जो लेखन की सेवा है, वह तुझे आएगी, ऐसा नहीं है । हमें चाहे स्वच्छता की सेवा ही क्यों न मिले; परंतु वह सेवा हमें मन से और भावपूर्ण करनी चाहिए । वह सेवा अधिक अच्छे प्रकार से कैसे होगी, इस दिशा में हमारे परिश्रम तथा तडप होनी चाहिए ।

३ ई. साधको को प्रोत्साहित करना

११.३.२०१७ की सुबह मैं पू. भैय्या को काढा देने के लिए गई थी । मैं जब काढा रख रही थी, तब उन्होंने एक कटोरे में मुझे प्रसाद दिया और कहने लगे, यह मिठाई तुम्हारे लिए है । तुम मुझे सदैव मिठाई देती हो न ! आज मैं तुम्हें मिठाई दे रहा हूं । उसके पश्‍चात मैने उन्हें मेरे मन के विरुद्ध घटी एक घटना तथा पू. भैय्या द्वारा पहले किए गए मार्गदर्शन के अनुसार मेरे द्वारा किए गए प्रयास के विषय में बताया । तब उन्होंने कहा, तुमने अच्छे प्रयास किए हैं । उसके कारण तुम्हारी अच्छी उन्नति हो रही है ।

 

४. तीव्र आध्यात्मिक कष्टपर जीत पाना

पू. भैय्या को तीव्र आध्यात्मिक कष्ट होते हुए भी वे उसपर जीत प्राप्त कर सेवा करते हैं । उनमें यह क्षात्रवृत्ति आदर्श है । वे सदैव आनंदित होते हैं । कई बार वे अस्वस्थ होते हुए भी उनके मुखमंडलपर वैसा दिखाई नहीं देता । वे ईश्‍वर के साथ अंतर्मन से जुडे हुए हैं; इसलिए वे उब चुके हैं, ऐसा मैने कभी नहीं देखा है ।

 

५. साधकों की आध्यात्मिक स्तरपर सहायता करना

एक बार मैने पू. भैय्या से कहा, मुझे रात में नींद नहीं आती । उसपर उन्होंने मुझे एक मुद्रा तथा हनुमानजी का जाप करने के लिए कहा । उन्होंने मुझे रात में सोने से पहले अपने आसपास सूक्ष्म से नामजप की पेटी कैसे बनाई जाती है ?, यह भी सिखाया । उसके अनुसार प्रयोग करने से मुझे तुरंत नींद आ गई और सुबह में समयपर जग गई ।

 

६. पू. भैय्या का आदर्श आचरण

६ अ. पू. भैय्या का ठीकठाक कक्ष

पू. भैय्या के कक्ष में सभी वस्तुएं ठीकठाक रखी होती हैं । पू. भैय्या के कक्ष से बाहर ही न आऊं, ऐसा मुझे लगता है ।

६ आ. पू. भैय्या का धीमे स्वर में बोलना तथा भावपूर्ण प्रार्थनाएं करना

पू. भैय्या की बातें अत्यंत शांत, विनम्र तथा धीमे स्वर में होने से उन्हें सुनते ही रहें, ऐसा लगता है । पू. भैय्या द्वारा की जा रही प्रार्थना भी सुनते रहने का मन करता है । उनकी प्रार्थना की कृति को देखकर मेरी भावजागृति होती है और उन्हें प्रार्थना से चैतन्य मिल रहा है, ऐसा मुझे प्रतीत होता है ।

६ इ. कृतज्ञताभाव

एक बार पू. भैय्या की आंखों में एक औषधि डालनी थी । उन्होंने कहा कि यह औषधि किसी प्राणी का मूत्र है तथा परात्पर गुुरु पांडे महाराजजी ने उन्हें यह औषधि डालने के लिए कहा है । पृथ्वीपर स्थित प्राणियों का मनुष्य को इतना लाभ होता है, यह हमें ज्ञात ही नहीं होता । परात्पर गुुरु पांडे महाराजजी के कारण हमें प्राणियों के प्रति भी कृतज्ञ रहना चाहिए, यह ध्यान में आया ।

 

७. पू. भैय्या की सेवा करते समय प्राप्त अनुभूतियां

७ अ. पू. भैय्या के माध्यम से परात्पर गुुरु डॉक्टरजी के हंसने का प्रतीत होना

९.३.२०१७ को मैं पू. भैय्या को काढा देने के लिए गई थी । तब वे मेरी ओर देखकर हंस रहे थे । उसका कारण मेरी समझ में नहीं आया; परंतु उस समय गुुरुदेव ही मेरी ओर देखकर हंस रहे हैं, ऐसा मुझे प्रतीत हुआ ।

७ आ. पू. भैय्या के कक्ष के पास जाने के पश्‍चात
थकान दूर हो जाना तथा उन्हें देखनेपर बदनदर्द रुक जाना

एक बार सुबह उठनेपर मुझे बहुत बदनदर्द हो रहा था और थकान आ गई ती । उसके पश्‍चात मैं पू. भैय्या को काढा देने के लिए मैं उनके कक्ष के द्वार के पास गई, तब मेरी सभी थकान भी दूर हो गई । पू. भैय्या काढे का गिलास लेते समय हंस पडे और तब मेरा बदनदर्द भी रुक गया । इससे संतों में बहुत चैतन्य होता है, इसकी मुझे अनुभूति हुई ।

७ इ. पू. भैय्या के कक्ष में बहुत सुगंध आना

१४.३.२०१७ को मैं पू. भैय्या के कक्ष के बाहर खडी थी । तब उनके कक्ष से बहुत सुगंध आ रहा था और उसके कारण मेरा बदनदर्द रुक गया । पू. भैय्या के कक्ष में अलग-अलग सुगंध आते हैं ।

७ ई . पू.. भैय्या का कक्ष परात्पर गुरु डॉक्टरजी के कक्ष की भांति लगना

पू. भैय्या के कक्ष में मुझे बहुत शांति का अनुभव होता है । वहां बहुत चैतन्यदायक तरंग प्रतीत होते हैं तथा मैं गुुरुदेवजी के कक्ष में ही हूं, ऐसा मुझे प्रतीत होता है ।

७ उ. पू. भैय्या द्वारा मेरी आंख में फंसे कण को निकालने के लिए
साधिका को बताए जानेपर वह कण वहां से अपनेआप ही निकल जाना
तथा पू. भैय्या द्वारा इस अनुभूति का श्रेय साधिका में व्याप्त भाव को दिया जाना

एक बार मैं पू. भैय्या के कक्ष में जाने से पहले उनके आंख में कुछ गया था । मुझे आंख मलते हुए देखकर पू. भैय्या ने मुझे इस विषय में पूछा तथा उस कण को कैसे निकालना है, यह बतााया । उसके पश्‍चात मैं जब पू. भैय्या के लिए थर्मास में रखा पानी गिलास में डाल रही थी, तब यह मेरे ध्यान में आया कि मेरी आंख से वह कण निकल गया है । इससे पू. भैय्या के मन का विचार ईश्‍वर तुरंत पूर्ण करते हैं, इसका मैने अनुभव किया । मैने यह बात पू. भैय्या को बताकर उनसे कहा, पू. भैय्या, आपमें व्याप्त चैतन्य के कारण ही ऐसा हुआ । उसपर उन्होंने कहा, तुममें भाव है; इसलिए ईश्‍वर तुम्हें अलग-अलग अनुभूति देते हैं ।

प.पू. डॉक्टरजी, पू. संदीपभैय्या को तीव्र आध्यात्मिक कष्ट होते हुए वे वे दिन-रात सेवारत होते हैं; परंतु मैं थोडी सी शारीरिक कष्ट से थक जाती हूं । हे गुुरुदेवजी, आप ही मुझे मुझ में व्याप्त स्वभावदोषोंपर जीत पाना सिखाईए । मुझे उनसे सीखने मिले सूत्रों का मेरे द्वारा अधिकाधिक क्रियान्वयन हो तथा मुझे आपको अपेक्षित ऐसा बनना संभव हो, यह आपके चरणों में प्रार्थना !

– कु. गौरी मुद्गल (आयु १७ वर्ष), सनातन आश्रम, रामनाथी, गोवा (३.६.२०१७)

पू. संदीप आळशीजी की गुणविशेषताएं !

श्री. संजय मुळ्ये

 

८. परिपूर्णता, तुम्हारा दूसरा नाम पू. संदीप आळशीजी !

अक्टूबर २०१७ में सनातन के देवीविषय के शक्ति नामक लघुग्रंथ का पुनर्मुद्रण करना था । इस लघुग्रंथ में देवी की उपासना, नवरात्रि आदि विषय अंतर्भूत हैं । पुनर्मुद्रण के लिए उस लघुग्रंथ में अंतर्निहित करने के लिए मैने कुछ सूत्र चुने तथा उन्हें जोडकर मैने इस लघुग्रंथ की संगणकीय धारिका पू. संदीपभैय्या को देखने के लिए रखी । यह सेवा मेरी दृष्टि से कुछ बहुत बडी नहीं थी । मैने केवल २-३ अधिक सूत्र उस लघुग्रंथ में अंतर्भूत की थी । पू. भैय्या ने मैने रखी गई धारिका को पढकर उसमें अनेक छोटे-छोटे; परंतु महत्त्वपूर्ण सूत्र उस लघुग्रंथ में अंतर्भूत करने के लिए कहा, उदा. गरबा खेलने की आड में धर्मांधों द्वारा किया जानेवाला लव जिहाद, नवरात्रि के समय देश में बढनेवाली गर्भनिरोधक की बिक्री, नवरात्रोत्सव में मंडलों द्वारा देवी की छोटी मूर्ति न लाकर बडी मूर्ति लाई जाना इत्यादि । पू. भैय्या इस संदर्भ में कहने लगे, चाहे यह लघुग्रंथ है; परंतु उसका पुनः-पुनः पुनर्मुद्रण नहीं होता । लघुग्रंथ में चाहे ऐसे सूत्रों का विवेचन करने के लिए स्थान (पृष्ठसंख्या)अल्प हो; परंतु तब भी इन सूत्रों को छोडना नहीं चाहिए । हम आवश्यक जानकारी को अल्प शब्दों में देंगे । उसके पश्‍चात मुझे उनमें से कुछ सूत्रों का विवेचन अल्प शब्दों में रखना संभव नहीं हो रहा था । उन्होंने उसे भी सूत्ररूप से कैसे रखना है, वह दिखा दिया । उसे सुनकर मेरे मन में यह विचार आया, अरे, यह तो कितना सरल था ! किसी भी ग्रंथ-लघुग्रंथ का संकलन परिपूर्ण पद्धति से कैसे करना है, पाठक को यथासंभव सभी सूत्र कैसे देने हैं; लेखन को क्लिष्ट न बनाकर सरल कैसे बनाना है, सेवा केवल पूर्ण ही नहीं, अपितु परिपूर्ण कैसे करनी है, यह उन्होंने मुझे कई बार दिखा दिया है । उससे मेरे मन में एक वाक्य उभरकर आता है, हे परिपूर्णता, तुम्हारा दूसरा नाम है पू. संदीप आळशीजी !

 

९. शब्दों के उचित उपयोग के विषय में सदैव सतर्क पू. संदीपभैय्या !

सितंबर २०१७ में उन्हें प्राप्त एक धारिका उन्होंने मुझे ठीक संकलन करने के लिए दी । उन्होंने कहा, इस धारिका में सूत्रों की मिलावट हुई है । कुछ समय पश्‍चात उन्होंने मुझे दूरभाष कर कहा, कुछ समय मैने भेसळ, इस शब्द का प्रयोग किया था, वह उचित नहीं था, तो वहां सरमिसळ, ऐसा मुझे कहना चाहिए था !

– श्री. संजय मुळ्ये, सनातन आश्रम, रामनाथी, गोवा (१५.७.२०१८)

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