राजस्थान में सवाई माधोपुर के त्रिनेत्र श्री गणेश मंदिर की विशेषताएं

राजस्थान में सवाई माधोपुर के त्रिनेत्र श्री गणेश मंदिर की विशेषताएं और श्री गणेश को संकटनिरसन के लिए प्रार्थना करने के लिए जाते समय हुए कष्ट और हुई अनुभूतियां देखेंगे ।

 

१. रणथंभोर के त्रिनेत्र गणेश मंदिर की विशेषताएं

त्रिनेत्र गणेश का चित्र

१ अ. रणथंभोर के जंगल की पहाडी के किनारे से स्वयंभू गणेश प्रकट होना

समुद्र की सतह से २ सहस्र फुट की ऊंचाई पर रणथंभोर के जंगल की एक पहाडी के किनारे से यह स्वयंभू गणपति प्रकट हुआ है । श्री गणेश की मूर्ति पूर्ण न होकर पहाडी से बाहर आए भाग में श्री गणेश का केवल मुख और सूंड का भाग हमें दिखाई देता है । श्री गणेशजी के दोनों ओर उनके पुत्र शुभ-लाभ और उनके समीप पत्नी रिद्धि -सिद्धि हैं । ऐसा गणेश पंचायतन है । त्रिनेत्री गणेश का तीसरा नेत्र अर्थात बुद्धि, ऐसा वहां के पुजारियों ने बताया । श्री गणेश के सामने श्रीविष्णु की मूर्ति है । उस मूर्ति में सजीवता और तारक-मारक भाव प्रतीत होता है ।

१ आ. पंचक्रोशी के भक्तों द्वारा किसी भी कार्य का प्रथम निमंत्रण श्री गणेशजी को देना

द्वापरयुग में भगवान श्रीकृष्ण का अवतार हुआ था । तब त्रिनेत्र गणेश प्रथम प्रकट हुए, ऐसा वहां के पुरोहित बताते हैं । त्रिनेत्र गणपति का यह पहला मंदिर है । पंचक्रोशी के भक्त किसी भी कार्य का पहला निमंत्रण श्री गणेश को देते हैं ।

 

२. आख्यायिका

२ अ. अल्लाउद्दीन खिलजी द्वारा मंदिर तोडने के लिए हाथी भेजा जाना और हाथी का मंदिर के सामने बैठे रहना तथा मंदिर में महान शक्ति के वास का उसे भान होना

अल्लाउद्दीन खिलजी ने यह मंदिर तोडने का प्रयत्न किया । उसके लिए उसने हाथी मंगवाए । पहला हाथी आया, वह नीचे बैठ गया । दूसरे और तीसरे भी बैठ गए । तब उसकी ध्यान में आया कि यहां एक महान शक्ति का वास है । वह श्रीगणेशजी की शरण चला गया और फिर उसने इस मंदिर के गर्भगृह को सुशोभित किया । उसने इसे गणेश-पीर से संबोधित किया था । तब से इस देवालय में मुसलमान श्रीगणेशजी के दर्शन के लिए आते हैं । वे अपने परिवार में किसी के भी विवाह आदि का प्रथम निमंत्रण भगवान को देते हैं । वहां मुसलमानों की परंपरानुसार कांच से सुशोभित की हुई भीत (दीवार) और छत आज भी देखने मिलते हैं । रणथंभोर के इस किले पर गुप्त गंगा का भी स्थान है । – श्री. प्रणव मणेरीकर

 

३. त्रिनेत्र गणेश के दर्शन के लिए जाते समय हुई अनुभूति

३ अ. प्रवास में हुए कष्ट

३ अ १. मंदिर में पहुंचने से पूर्व शारीरिक कष्ट होना, एकाएक गाडी के सामने गाय का आना, गाडी के सामने गाय आना, चालक द्वारा गाडी नियंत्रण में लाई जाना और आए संकट को गाय का अपने ऊपर लेना, ऐसा सद्गुरु (श्रीमती) अंजली गाडगीळ का बताना

रणथंबोर पहुंचने से ४० कि.मी. की दूरी पर मुझे एकाएक दाब लगना, निरुत्साही लगना और मितली आने जैसे कष्ट हुए । मैंने रक्षा के लिए प्रार्थना करने पर कुछ ही मिनटों में वहां एकाएक गाय आ गई । चालक ने समय पर ब्रेक दबाकर गाडी नियंत्रण में लाई । सद्गुरु (श्रीमती) अंजली गाडगीळ को यह घटना बताने पर उन्होंने कहा, गाय ने संकट स्वयं पर ले लिया । – पू. (डॉ.) चारुदत्त पिंगळे

३ अ २. प्रवास के व्यक्ति को रास्ता पूछने पर खराब रास्ता बताया जाना और तदुपरांत उस व्यक्ति को अनिष्ट शक्ति का कष्ट है, ऐसा प्रतीत होना

प्रवास में रणथंभोर पहुंचने के लिए १५ कि.मी. के अंतर पर हमने एक व्यक्ति से रास्ता पूछा । वह व्यक्ति अन्य धर्मीय था । उसने गड्डे वाले रास्ते पर न जाकर, दूसरा रास्ता बताया । आगे ३ कि.मी. जाने पर एक व्यक्ति को रास्ता पूछने पर उसने गांव का खराब रास्ता बताया । तदुपरांत हमें प्रतीत हुआ कि उस व्यक्ति को अनिष्ट शक्तियों का कष्ट था । उसके बताए मार्ग पर जाते समय अनेक स्थान पर रास्ता खराब था । अनेक स्थान पर पानी जमा था और रास्ता संकरीला था । – श्री. प्रणव मणेरीकर

३ आ. अच्छी अनुभूति

३ आ १. अत्यल्प नींद होने पर भी थकान न होकर आनंद और उत्साह प्रतीत होना

१५.८.२०१६ को सद्गुरु (श्रीमती) अंजली गाडगीळ का त्रिनेत्र गणेश को जाकर संकल्प लेने के विषय में दूरभाष आया । सवेरे ७ बजे पूजाविधि करना निश्‍चित हुआ । जयपुर से त्रिनेत्र गणेश का मंदिर १६५ कि.मी. की दूरी पर है । हमने ७ बजे पहुंचने के लिए सवेरे ३ बजे प्रवास आरंभ करना निश्‍चित किया । रात्रि १.३० बजे तक कुछ सेवाएं चल रही थीं । २ बजे उठकर स्नान कर निकलना था । अत्यंत अल्प नींद होने पर भी किसी भी प्रकार की थकान अथवा सुस्ती नहीं आई । गणेशदर्शन के लिए निकलते समय उत्साह था । गाडी में जाते समय नामजप चल रहा था और आनंद प्रतीत हो रहा था ।

३ आ २. बिना कोई शारीरिक कष्ट हुए अल्प कालावधि में पू. पिंगळेकाका का २०० से अधिक सीढियां चढ जाना

मंदिर पहाडी पर बने किले में था । हमें बताया गया था कि वहां चढने के लिए १०० सीढियां हैं, परंतु वास्तव में २०० से अधिक सीढियां हैं । ७ बजने में २० मिनट शेष थे । इतने अल्प समय में पहुंचना संभव न होने के कारण पू. पिंगळेकाका ने मुझे आगे जाने के लिए कहा । मैं लगभग दौडते हुए ही ७ से पहले मंदिर पहुंचा । मेरे पीछे-पीछे पू. पिंगळेकाका ७.०५ मिनट पर वहां पहुंच गए । वैसे पू. काका को अधिक चलने तथा सीढियां चढने से थकान आती है, स्नायू अकड जाते हैं और श्‍वास फूलती है; परंतु उस समय वैसा कुछ नहीं हुआ और वे शीघ्र चढ सके ।

३ आ ३. महर्षि की आज्ञा अनुसार पू. पिंगळेकाका का श्री गणेशजी के चरणों में संकल्प करना

सवेरे ७ से ९, इस अवधि में पुरोहितों को त्रिनेत्र गणपति का अभिषेक कर विधिवत् पूजा की । तदुपरांत पू. पिंगळेकाका ने संकल्प किया । संस्था पर आए सर्व विघ्न-बाधाएं दूर होने हेतु परात्पर गुरु डॉ. जयंत आठवलेजी का मृत्युयोग टालने के लिए, सद्गुरु (श्रीमती) अंजली गाडगीळ, सद्गुरु (श्रीमती) बिंदा सिंगबाळ और अन्य साधकों की रक्षा होने हेतु श्रीगणेशजी के चरणों में संकल्प किया ।

३ आ ४. मंदिर के परिसर में भ्रमणभाष का नेटवर्क उपलब्ध न होते हुए भी वह उपलब्ध हो गया और पू. पिंगळेकाका सद्गुरु (श्रीमती) अंजली गाडगीळ से बोल पाए

श्री त्रिनेत्र गणेश मंदिर, जंगल में और एक पहाडी पर बने किले में है । वहां भ्रमणभाष पर बोलने के लिए किसी भी आस्थापन का नेटवर्क उपलब्ध नहीं था । पूजाविधि करने के उपरांत किले से नीचे उतरते समय पू. पिंगळेकाका ने सहज ही भ्रमणभाष की ओर देखा, तो नेटवर्क उपलब्ध था । इसलिए वे सद्गुरु अंजलीताईं से बात कर पाए । उनके संभाषण के समय किले पर चढनेवाले एक व्यक्ति ने पूछा, आपका कौन-से आस्थापन का नेटवर्क है ? मैंने बताया, एअरटेल । तो उसने बताया कि उसका भी वही है, परंतु उसके भ्रमणभाष पर नेटवर्क नहीं आ रहा है । तब ध्यान में आया कि भगवान ने ही यह अनुभूति दी है ।

३ आ ५. पू. पिंगळेकाका के हरिणों के प्रकार बताते समय बारहसिंगा दिखाई देना

दर्शन लेकर लौटते समय पू. पिंगळेकाका हरिणों में चितळ, सांबर, कस्तुरी, बारहसिंगा इत्यादि प्रकार बता रहे थे । उसी समय हमें ३ बारहसिंगा वृक्ष के नीचे बैठे दिखाई पडे । प्रवास में और मंदिर के परिसर में मोर, बंदर, चीतल, सर्प, गाय, लोमडी जैसे अनेक प्राणी और पक्षी थे ।

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