सच्चिदानंद परब्रम्ह डॉ. जयंत आठवलेजी अद्वितीय कार्य एवं विशेषताओं का संक्षिप्त परिचय !

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सच्चिदानंद परब्रम्ह डॉ. जयंत आठवलेजी ने व्यापक अध्यात्मप्रसार के लिए ‘सनातन संस्था’की स्थापना की । उन्होंने शीघ्र ईश्वरप्राप्ति के लिए ‘गुरुकृपायोग’ साधनामार्ग की निर्मिति की । इस विषय में अधिक जानकारी अवश्य पढें ।

सच्चिदानंद परब्रम्ह डॉ. जयंत आठवलेजी

अनुक्रमणिका

१. आंतरराष्ट्रीय कीर्ति के सम्मोहन-उपचार विशेषज्ञ

१ अ. वर्ष १९७१ से वर्ष १९७८ तक ब्रिटन में सम्मोहन-उपचारपद्धति पर सफल शोधकार्य

१ अ १. सम्मोहन-उपचार के नए शोध

१ आ. ‘सम्मोहन उपचार विशेषज्ञ’ के रूप में मुंबई में व्यवसाय (वर्ष १९७८ से १९९४)

१ इ. वर्ष १९८२ में ‘भारतीय वैद्यकीय सम्मोहन एवं संशोधन संस्था’की स्थापना

१ ई. सम्मोहनशास्त्र एवं सम्मोहन-उपचार पर ६ ग्रंथों का प्रकाशन

२. साधना संबंधी मार्गदर्शन के लिए ‘सनातन भारतीय संस्कृति संस्था’की स्थापना (१.८.१९९१)

२ अ. वर्ष १९९५ तक महाराष्ट्र, गोवा एवं कर्नाटक राज्यों में अध्यात्म संबंधी अभ्यासवर्ग लेना, गुरुपूर्णिमा महोत्सव आयोजित करना इत्यादि

२ आ. वर्ष १९९६ से वर्ष १९९८ तक महाराष्ट्र, गोवा और कर्नाटक राज्यों में साधनासंबंधी सैकडों सार्वजनिक सभाएं लेना

३. साधना, राष्ट्ररक्षा, धर्मजागृति आदि विविध विषयों पर विपुल ग्रंथ-निर्मिति (वर्ष १९९५ से आरंभ) एवं ग्रंथ-प्रकाशन

३ अ. सनातन के ग्रंथों की कुछ प्रमुख विशेषताएं

१. कालानुसार आवश्यक साधना की सीख

२. साधना में अडचनें दूर कर साधना की दिशा देनेवाला मार्गदर्शन

३. अध्यात्म की प्रत्येक कृति के विषय में ‘क्यों और कैसे’ के शास्त्रीय उत्तर

४. विज्ञानयुग में पाठकों को समझ में आए इसप्रकार आधुनिक वैज्ञानिक (उदा. सारणी, प्रतिशतता) भाषा में ज्ञान
वर्तमान में विज्ञानयुग की पीढी को विज्ञान की भाषा में समझाने पर उसे शीघ्र विषय का आकलन होगा । इसलिए सच्चिदानंद परब्रम्ह डॉक्टर शास्त्रीय परिभाषा में ग्रंथ लिखते हैं । इन ग्रंथों में विषय स्पष्ट होने हेतु आकृतियां, सारणियां, प्रतिशतता, सूक्ष्मसंबंधी प्रयोग आदि होते हैं । इसके साथ ही लेखन का प्रस्तुतीकरण सूत्रबद्ध पद्धति से होता है ।

४ अ. प्रतिशतता के उदाहरण : गुरुकृपायोग में बताई अष्टांग-साधना के घटकों का व्यष्टि और समष्टि साधना में महत्त्व

 

व्यष्टि साधना (मात्रा-प्रतिशत) समष्टि साधना (मात्रा-प्रतिशत)
१. स्वभावदोष निर्मूलन  ५० ५०
२. अंह निर्मूलन १० १०
३. नामजप १०
४. सत्संग १०
५. सत्सेवा ११
६. भाव
७. त्याग
८. प्रीती
योग १०० १००
४ आ. सूत्रबद्ध पद्धति से प्रस्तुतीकरण

‘सनातन का प्रत्येक ग्रंथ ‘अध्यात्म विश्वविद्यालय की पाठ्यपुस्तक’ हैं । इसलिए इन ग्रंथों का लेखन १, १ अ, १ अ १, १ अ १ अ…. इसप्रकार सूत्रबद्ध पद्धति से प्रस्तुत किया है ।

५. तात्त्विक विवेचन ही नहीं, अपितु साधना कृति में लाने के विषय में मार्गदर्शन

६. व्यक्ति साधना करने से उस पर होनेवाले अच्छे परिणाम; अंग्रेजी अक्षर नहीं, अपितु देवनागरी अक्षर सात्त्विक होना; तीर्थक्षेत्रों की महिमा आदि के विषय में वैज्ञानिक उपकरणों द्वारा किए शोधन का अंतर्भाव

७. सात्त्विक वेशभूषा, आहार इत्यादि का व्यक्ति पर होनेवाला अच्छा परिणाम आदि के संदर्भ में सूक्ष्म स्तर पर प्रक्रिया दर्शानेवाले चित्र और लेखन

८. सनातन के कई ग्रंथों में २० प्रतिशत ज्ञान इतना अद्वितीय है जो आज तक पृथ्वी पर कहीं भी उपलब्ध नहीं !

३ आ. ग्रंथ-प्रकाशन

अध्यात्म, धर्म, देवी-देवता, धर्मजागृति, राष्ट्ररक्षा आदि विषयों पर फरवरी २०२५ तक सनातन के ३६६ ग्रंथों में मराठी, हिन्दी, अंग्रेजी, गुजराती, कन्नड, तमिल, तेलुगु, मल्ल्यालम्, बंगाली, ओडिया, आसामी, पंजाबी और नेपाली, इन १३ भाषाओं में ९९ लाख १० सहस्र प्रतियां प्रकाशित हुई हैं ।

४. शीघ्र ईश्वरप्राप्ति के लिए ‘गुरुकृपायोग’ साधनामार्ग की निर्मिति

४. अ. जिसप्रकार सांप्रदायिक साधना बताई जाती है, उसप्रकार सभी को एक ही साधना नहीं बताई जाती, अपितु ‘जितने व्यक्ति उतनी प्रकृतियां, उतने ही साधनामार्ग’ इस सिद्धांतानुसार साधना बताई जाती है ।

४. आ. ‘अष्टांगसाधना (स्वभावदोष-निर्मूलन एवं गुणवृद्धि, अहं-निर्मूलन, नामजप, सत्संग, सत्सेवा, भावजागृति के लिए प्रयत्न, सत के लिए त्याग और प्रीति)’, ये इस साधनामार्ग की कुछ विशेषताएं हैं ।

५. हिन्दू राष्ट्र का (ईश्वरीय राज्य का)(टिप्पणी) स्थापना का उद्घोष और कार्यारंभ (वर्ष १९९८)

(टिप्पणी : हिन्दू राष्ट्र [ ईश्वरीय राज्य] – ‘हीनान् गुणान् दूषयति इति हिंदुः ।’ अर्थात ‘कनिष्ठ, हीन, ऐसे रज और तम गुणों का नाश करनेवाले वे हिन्दू !’ ऐसे सात्त्विक लोगों का राष्ट्र अर्थात ‘हिन्दू राष्ट्र’ !)

६. व्यापक अध्यात्मप्रसार के लिए ‘सनातन संस्था’की स्थापना (२२.३.१९९९)

६ अ. व्यक्ति को होनेवाले शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक कष्टों का मूल कारण है ‘प्रारब्ध और बुरी शक्तियां’, यह ध्यान में लाकर देना और उस पर कायमस्वरूपी उपाय अर्थात ‘साधना’ बताना

६ आ. जिज्ञासु और साधकों को सकाम साधना में न अटकने देना और निष्काम साधना सिखाकर ईश्वरप्राप्ति की दिशा दिखाना

६ आ १. व्यावहारिक लाभ के लिए अथवा अडचनों के संदर्भ में उपाय न बताते हुए केवल साधना के संदर्भ में आध्यात्मिक स्तर पर मार्गदर्शन करना

६ इ. साधना के संदर्भ में अडचनें और कष्टों के संदर्भ में शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक अडचनें ढूंढकर, उस अनुसार उपाय बताना

६ ई. सत्संग, व्याख्यान आदि का आयोजन करना; कुंभमेलों में अध्यात्मप्रसार करना; धर्मप्रसारकार्य में अडचनें दूर होने के लिए यज्ञयाग, धार्मिक विधि आदि करना; दूरचित्रवाहिनियों पर हिन्दू धर्म का पक्ष प्रस्तुत करना और उसके लिए ‘वक्ता प्रशिक्षण कार्यशाला’ आयोजित करना इत्यादि ।

६ उ. बुद्धि से समझने योग्य ज्ञान के परे जाकर ज्ञानप्राप्ति (From Known to UnKnown), उदा. ‘किसी मूर्ति में देवता का तत्त्व कितनी मात्रा में है’, इस विषय में ध्यान द्वारा अथवा सूक्ष्म से ज्ञान प्राप्त करना

६ ऊ. सनातन संस्था के जालस्थल – Sanatan.org : प्रतिमाह १ लाख २५ सहस्र से अधिक पाठकवर्गवाला जालस्थल  मराठी, हिन्दी, गुजराती, तमिल, कन्नड, तेलुगु, मल्ल्यालम्, नेपाली और अंग्रेजी, इन नौ भाषाओं में कार्यरत है । अध्यात्मशास्त्र, हिन्दू धर्म, देवी-देवता, साधना, आचारपालन आदि के विषय में जानकारी इस जालस्थलपर दी है ।

७. साधक तैयार करना

ईश्वरप्राप्ति के लिए, इसके साथ ही राष्ट्र और धर्म के कार्य के लिए तन, मन और धन का त्याग करनेवाले सहस्रों साधक तैयार किए ।

८. सच्चिदानंद परब्रम्ह डॉ. जयंत आठवलेजी के साधना संबंधी योग्य मार्गदर्शन के कारण साधकों की आध्यात्मिक क्षमता बढना, उनकी शीघ्र आध्यात्मिक उन्नति होना, इसके साथ ही कुछ साधक संतपद पर (गुरुपद पर), सद्गुरुपद और परात्पर गुरुपद पर आरूढ होना

८ अ. साधकों की आध्यात्मिक क्षमता बढना

कुछ साधकों को अध्यात्म के विविध विषयों पर ज्ञान मिलता है, जो पृथ्वी पर कहीं भी उपलब्ध नहीं है । कुछ साधक किसी वस्तु अथवा घटना का सूक्ष्म परीक्षण भी करते हैं । (अर्थात इन साधकों को उस वस्तु अथवा घटना के विषय में सूक्ष्म से ज्ञान मिलता है ।) कुछ साधक दूसरों का आध्यात्मिक स्तर भी समझ सकते हैं । कुछ साधकों को सूक्ष्म के अच्छे और बुरे स्पंदनों को भी पहचान सकते हैं ।

८ आ. साधकों की शीघ्र आध्यात्मिक उन्नति होना

मार्च २०२५ तक १३२ साधक संतपद पर आरूढ हुए हैं और ६० प्रतिशत और उससे अधिक आध्यात्मिक स्तर प्राप्त सहस्रों साधक संतत्व की दिशा में मार्गक्रमण कर रहे हैं ।

८ इ. अन्य संप्रदायों की तुलना में सनातन की एक अनोखी विशेषता

सच्चिदानंद परब्रम्ह डॉक्टरजी ने अनेक संत और साधक तैयार किए हैं । इसलिए सच्चिदानंद परब्रम्ह डॉक्टरजी समान ही सनातन के संत और साधकों के विषय में भी विपुल लेखन प्रकाशित होना : अधिकांश संप्रदायों में केवल उनके प्रमुखों के बारे में जानकारी होती है, शिष्यों की नहीं ! शिष्यों के संबंध में कोई जानकारी उपलब्ध नहीं होती । सच्चिदानंद परब्रम्ह डॉक्टरजी ने अनेक संत और साधकों को तैयार किया है । इसलिए सनातन के संत और साधकों द्वारा किया मार्गदर्शन, उनके विचार, उनके रचे काव्य के विषय में अन्य साधकों को हुई अनुभूतियां इत्यादि विपुल लेखन ‘सनातन प्रभात’में प्रकाशित होता है । सच्चिदानंद परब्रम्ह डॉक्टर अब सनातन के संतों के चरित्र भी प्रकाशित करनेवाले हैं ।

९. गुरुकुल समान ‘सनातन आश्रम’की निर्मिति और सच्चिदानंद परब्रम्ह डॉ. जयंत आठवलेजी की प्रेरणा के कारण अन्य आश्रमों की स्थापना

सच्चिदानंद परब्रम्ह डॉक्टरजी ने रामनाथी (गोवा) में तीर्थक्षेत्र समान चैतन्य की अनुभूति देनेवाले आश्रम की निर्मिति की है । इस आश्रम में साधक पूर्ण समय साधनारत हैं । यहां राष्ट्र और धर्म संबधी कार्य भी चलता है ।

१०. साधना संबंधी मार्गदर्शन करनेवाली श्रव्यचक्रिकाएं (ऑडियो सीडी) एवं धर्मशिक्षा देनेवाली दृश्य-श्रव्यचक्रिकाएं (वीडियो सीडी) की निर्मिति, इसके साथ ही समाज, राष्ट्र एवं धर्म की जागृति के लिए कुछ लघुचलचित्रों (डॉक्यूमेंट्री फिल्मों) की निर्मिति

११. ‘कला के लिए कला’ नहीं, अपितु ‘ईश्वरप्राप्ति के लिए कला’ इस विषय पर मार्गदर्शन और चित्रकला, मूर्तिकला, संगीत, नृत्य आदि विविध कलाओं के विषय में शोधकार्य

११ अ. साधकों को उनकी कला में वृद्धि करने के साथ ही साधना की प्रगति के विषय में भी मार्गदर्शन : सच्चिदानंद परब्रम्ह डॉक्टर चित्रकला, मूर्तिकला, संगीत, नृत्य, ध्वनिचित्रीकरण (ऑडियो-विजुअल) इत्यादि विषयों में साधकों का केवल उस-उस क्षेत्र में निपुण हों, केवल इसलिए मार्गदर्शन नहीं करते; अपितु उस माध्यम से साधकों की साधना में प्रगति होनी चाहिए । इसकी उन्हें लगन रहती है ।

११ आ. चित्रकला और मूर्तिकला : सच्चिदानंद परब्रम्ह डॉक्टरजी के मार्गदर्शन में बनाए गए देवी-देवताओं के चित्रों में २७ से ३१.३ प्रतिशत, और श्री गणेशमूर्ति में २८.३ प्रतिशत तक उस देवता का तत्त्व आया है । (कलियुग में देवता के चित्र में अथवा मूर्ति में अधिकाधिक ३० प्रतिशत तक उस विशिष्ट देवता का तत्त्व आ सकता है ।) सच्चिदानंद परब्रम्ह डॉक्टरजी यह भी बताते हैं कि चित्र एवं मूर्ति में शक्ति, भाव, चैतन्य, आनंद एवं शांति के स्पंदन कितनी मात्रा में हैं ।

११ इ. सूक्ष्म चित्रकला : कुछ साधकों को किसी विषय के संबंध में सूक्ष्म से जो समझ में आता है अथवा अंतर्दृष्टि से जो दिखाई देता है, उस संबंध में उन्हें कागद पर बनाए गए चित्र को ‘सूक्ष्म ज्ञान के संबंधी चित्र’ कहते हैं । ‘सूक्ष्म ज्ञान के विषय का चित्रांकन’ अर्थात ‘सूक्ष्म चित्रकला’ इस चित्रकला की अभिनव शाखा सच्चिदानंद परब्रम्ह डॉक्टरजी ने ढूंढ निकाली और सूक्ष्म चित्रांकन करने की क्षमतावाले  साधकों को वह सिखाई । सच्चिदानंद परब्रम्ह डॉक्टरजी ने इन चित्रों के विविध प्रकार  (उदा. भासमान चित्र, काल्पनिक चित्र, कलात्मक चित्र, मायावी चित्र आदि प्रकार भी) ढूंढ निकाले । सूक्ष्म चित्रांकन करनेवाले साधकों द्वारा बनाए गए सूक्ष्म ज्ञानसंबंधी चित्रों की सत्यता सच्चिदानंद परब्रम्ह डॉक्टर जांचते हैं और उन चित्रों की सत्यता की प्रतिशतता बताते हैं ।

११ ई. अक्षर और अंक का लेखन : सच्चिदानंद परब्रम्ह डॉक्टरजी के मार्गदर्शन में निर्मित देवनागरी अक्षर और अंकों में ३१ प्रतिशत  सात्त्विकता आई है ।

११ उ. सात्त्विक रंगोलियां : सच्चिदानंद परब्रम्ह डॉक्टरजी के मार्गदर्शन में बनाई गई रंगोलियों में उस विशिष्ट देवता के (श्री गणपति, श्रीकृष्ण, श्री लक्ष्मी, दत्त और शिव का) लगभग ३ से ४ प्रतिशत तत्त्व और चैतन्य, आनंद आदि स्पंदन आए हैं, इसके साथ ही एक रांगोली में १० प्रतिशत गणेशतत्त्व आया है । (कलियुग में सात्विक रंगोलियों में अधिकाधिक १० प्रतिशत देवतातत्त्व और शक्ति, भाव, चैतन्य, आनंद और शांति के स्पंदन आ सकते हैं ।)

११ ऊ. सात्त्विक मेंहदी : सच्चिदानंद परब्रम्ह डॉक्टरजी के मार्गदर्शन में श्री सरस्वती, श्रीकृष्ण और श्री लक्ष्मी का २ से ४ प्रतिशत तक, तत्त्व आकर्षित करनेवाली मेंहदी की कलाकृतियां बनाईं हैं । (कलियुग में मेंहदी की कलाकृति में अधिकाधिक ५ प्रतिशत तक ही देवतातत्त्व आ सकता है ।)

११ ए. संगीत

१. गायन : सच्चिदानंद परब्रम्ह डॉक्टरजी के मार्गदर्शन में ‘शास्त्रीय संगीत’ से ‘विविध दैवीय नादों’ तक का अध्यात्मशास्त्रीय अभ्यास, ‘पश्चिमी संगीत’ एवं ‘भारतीय संगीत’ का सात्त्विकता की दृष्टि से तुलनात्मक अभ्यास, इसके साथ ही संगीत का व्यक्ति, प्राणि और वनस्पतियों पर होनेवाले परिणामों का अभ्यास किया जाता है । इसके साथ ही ‘संगीत-उपायों का मनुष्य के शारीरिक, मानसिक एवं आध्यात्मिक कष्टों पर होनेवाला परिणाम’ के विषय में भी शोधकार्य चल रहा है ।

२. वाद्यवादन : सच्चिदानंद परब्रम्ह डॉक्टरजी के मार्गदर्शन में पश्चिमी वाद्यों से सात्त्विक संगीत निर्माण करना, इसके साथ ही पश्चिमी वाद्य और भारतीय वाद्य, संतों का वाद्य (उदा. वीणा) बजाना और अन्य व्यक्ति द्वारा वाद्य (उदा. वीणा) बजाया जाना आदि का तुलनात्मक अध्ययन किया जा रहा है ।

३. नृत्य : सच्चिदानंद परब्रम्ह डॉक्टरजी के मार्गदर्शन में ‘भारतीय नृत्यप्रकार’ और ‘पाश्चात्य नृत्यप्रकार’ का सात्त्विकता की दृष्टि से तुलनात्मक अध्ययन, इसके साथ ही नृत्य की विविध शारीरिक स्थिति एवं मुद्राओं का आध्यात्मिक दृष्टि से शोधकार्य शुरू है ।

१२. सूक्ष्म से अनिष्ट शक्तियों के प्रकार और उनके कार्य के विषय में विविधांगी शोधकार्य

अ. अनिष्ट शक्तियों में पाताल के ‘मांत्रिक’ सबसे शक्तिशाली शक्ति होती है, इस बात से जग को परिचित करवाना

आ. अनिष्ट शक्तियों की शक्ति को प्रतिशतता के अनुरूप नापने की पद्धति

इ. आध्यात्मिक कष्टवाले साधकों का कष्ट न्यून होने के लिए विविध आध्यात्मिक प्रयोग करना, उदा. गायन, वादन, नृत्य इत्यादि ।

ई. साधकों को कष्ट देनेवाली अनिष्ट शक्तियों के ज्ञान का उपयोग समष्टि के लिए करना

१३. मनुष्य को होनेवाले शारीरिक, मानसिक, अनिष्ट शक्तियों के कष्ट पर उपायपद्धतियों के विषय में शोधकार्य

 

१३ अ १. आध्यात्मिक उपायों की नई-नई पद्धतियों का शोध लगाना

अ. नामजप उपायों की विविध पद्धतियों का शोध, उदा. ‘एक के बाद दूसरा’ ऐसे दो नामजप बारी-बारी से करना

आ. देवताओं की सात्त्विक नामजप-पट्टियों के उपाय (देहशुद्धि, वास्तुशुद्धि एवं वाहनशुद्धि करने की पद्धतियों सहित)

इ. शरीर की कुंडलिनीचक्रों के स्थान पर देवताओं के सात्त्विक चित्र अथवा नामजप-पट्टियां लगाना

ई. सनातन-निर्मित सात्त्विक गणेशमूर्ति की परिक्रमा करना

उ. संतों द्वारा दीर्घकाल तक निवास किए गए वास्तु में अथवा कक्ष में बैठकर नामजप करना

ऊ. संतों द्वारा लंबे समय तक उपयोग में लाई गई वस्तुओं का आध्यात्मिक उपायों के लिए उपयोग करना

ए. पंचतत्त्वों के अनुसार (पंचमहाभूतों के अनुसार) उपाय : उदाहरण

पृथ्वीतत्त्व के उपाय : माथे पर सात्त्विक कुंकू लगाना,

आपतत्त्व के उपाय : तीर्थ प्राशन करना,

तेजतत्त्व के उपाय : विभूति लगाना,

वायुतत्त्व के उपाय : विभूति फूंकना और

आकाशतत्त्व के उपाय : संतों की आवाज में भजन सुनना

१३ अ २. विकार-निर्मूलन एवं आध्यात्मिक कष्टों के निवारण के लिए विविध उपायपद्धतियों का शोध

अ. स्पर्शविरहित बिंदूदाबन (एक्युप्रेशर) : इस पद्धतिनुसार अच्छे आध्यात्मिक स्तर वाले साधक रोगी को स्पर्श न करते हुए (थोडा अंतर रखकर) रोगी पर अधिक प्रभावीरूप से बिंदूदाबन उपाय कर सकते हैं ।

आ. खाली खोकों (गत्ते के बक्सों) के उपाय : खाली खोकों की रिक्ती में आकाशतत्त्व होता है । इस आकाशतत्त्व के कारण उच्च स्तर के  आध्यात्मिक उपाय होते हैं ।

इ. प्राणशक्ति (चेतना) वहन उपाय : हाथों की उंगलियों से बाहर निकलनेवाली प्राणशक्ति की सहायता से उपाय करने की यह सरल पद्धति है । इस पद्धति से स्वयं पर, इसके साथ ही सुदूर स्थित रोगी पर भी उपाय कर सकते हैं ।

१४. स्वयं की (सच्चिदानंद परब्रम्ह डॉ. जयंत आठवलेजी की) देह, नख, केश और त्वचा, इसके साथ ही स्वयं के उपयोग की वस्तुओं में दैवीय परिवर्तनों संबंधी शोधकार्य

१५. स्वयं के (सच्चिदानंद परब्रम्ह डॉ. जयंत आठवलेजी के) महामृत्युयोग का शोधनात्मक अध्ययन

१६. हिन्दू धर्म के आचारपालन की कृति और धार्मिक कृति, इसके साथ ही सूक्ष्म पंचमहाभूतों के कारण होनेवाली बुद्धिअगम्य घटनाओं का वैज्ञानिक उपकरणों (उदा. ‘युनिवर्सल ऑरा स्कैनर’) एवं  तंत्रज्ञान (उदा. ‘पॉलीकॉन्ट्रास्ट इंटरफेरन्स फोटोग्राफी’) द्वारा शोधकार्य

१७. आध्यात्मिक एवं सांस्कृतिक मूल्य सहस्रों वस्तुओं का जतन

१८. उच्च स्वर्गलोक, महर्लोक एवं जनलोक से पृथ्वी पर जन्मे दैवीय (सात्त्विक) बालकों को पहचानना और उनसे संबंधित शोधकार्य (अबतक २ बालक-संतों की पहचान समाज को बताई है ।)

१९. ज्योतिषशास्त्र (फलज्योतिष, हस्तसामुद्रिक और पादसामुद्रिक शास्त्र) एवं नाडीभविष्य (नाडीपट्टियों पर लिखकर रखा भविष्य) द्वारा विविधांगी शोधकार्य

२०. स्वभाषारक्षा के लिए दिशादर्शन, भाषा के सूक्ष्म पहलुओं संबंधी शोधकार्य और भाषा की विशेषताओं का संग्रह

अ. मराठी लेखन में विदेशी भाषाओं के शब्दों का उपयोग टालना और  लेखन व्याकरण की दृष्टि से शुद्ध होना, इस ओर सच्चिदानंद परब्रम्ह डॉक्टरजी बहुत ध्यान देते हैं ।

आ. सच्चिदानंद परब्रम्ह डॉक्टरजी ने आध्यात्मिक शोधकार्य कर यह दिखा दिया कि ‘संस्कृत के उपरांत सर्वाधिक सात्त्विक भाषा मराठी है ।’

इ. मराठी भाषा के अनेक अर्थ शब्द एवं वाक्यों का संग्रह करने का अभूतपूर्व कार्य भी उन्होंने किया है, उदा. ‘पूज्य’ इस शब्द का ‘शून्य’ और ‘पूजनीय’ ऐसे २ भिन्न-भिन्न अर्थ होते हैं । ‘चित्र बनाया !’, इसके ‘लेखनी से चित्र बनाया’ और ‘चित्र भीत (दीवार) पर बनाया’, ऐसे २ अर्थ होते हैं । ऐसे शब्द और वाक्यों का यह संग्रह आगे ग्रंथरूप में प्रकाशित किया जाएगा ।

२१. ज्योतिषशास्त्र (फलज्योतिष, हस्तसामुद्रिक एवं पादसामुद्रिक शास्त्र) एवं नाडीभविष्य (नाडीपट्टियों पर लिखकर रखा भविष्य) के द्वारा विविधांगी शोधकार्य

२२. धर्माधिष्ठित हिन्दू राष्ट्र की (ईश्वरीय राज्य की) स्थापना के लिए कटिबद्ध प्रखर हिन्दुत्वनिष्ठ नियतकालिक ‘सनातन प्रभात’के  संस्थापक और प्रथम संपादक (२८ अप्रैल १९९८ से १९ अप्रैल २००० तक)

२२ अ. ‘सनातन प्रभात’ नियतकालिक समूह

दैनिक – मराठी (४ आवृत्तियां)
साप्ताहिक – मराठी एवं कन्नड
पाक्षिक – हिन्दी एवं अंगेजी
जालस्थल :SanatanPrabhat.org
२२ आ. विशेषताएं

१. राष्ट्र एवं धर्म की जागृति के लिए दैनिक वर्तमानपत्र, साप्ताहिक, पाक्षिक और मासिक नियतकालिक विविध भाषाओं में आरंभ किए ।

२. समाचारों पर ‘राष्ट्राभिमानी और धर्माभिमानी पाठकों का दृष्टिकोण कैसे होना चाहिए’, यह समझ में आए इसलिए समाचारों पर टिप्पणियां लिखना आरंभ किया । ऐसा करनेवाला ‘सनातन प्रभात’ एकमेव नियतकालिक है ।

२२ इ. ‘इंटरनेट’ (सूचना जाल) पर ‘हिन्दू वार्ता’ वृत्तवाहिनी के संकल्पक : २९.१२.२०१४ से २९.१.२०१६ तक ‘हिन्दू वार्ता’ इस उपक्रम द्वारा हिन्दुओं की वृत्तवाहिनी की नींव रखी ।

२३. धर्माधिष्ठित हिन्दू राष्ट्र की (ईश्वरीय राज्य की) स्थापना के लिए कार्य

अ. लोकतंत्र की दुष्प्रवृत्तियों के निर्मूलन के लिए वैध मार्ग से कार्य

आ. हिन्दू राष्ट्र-स्थापना के विषय में ग्रंथमालाओं की निर्मिति, इसके साथ ही नियतकालिक और जालस्थल द्वारा मार्गदर्शन

इ. संत, संप्रदाय, हिन्दुत्वनिष्ठ, देशभक्त और सामाजिक कार्यकर्ताओं का संगठन और उन्हें आध्यात्मिक स्तर पर दिशादर्शन

ई. आध्यात्मिक स्तर पर कार्य

ई १. सच्चिदानंद परब्रम्ह डॉक्टरजी के अस्तित्व से कार्य होना : अत्युच्च आध्यात्मिक स्तर के संतों के केवल अस्तित्व से ही कार्य होता है । इसीलिए स्वास्थ्य साथ न देने के कारण वर्ष २००७ से सच्चिदानंद परब्रम्ह डॉक्टर कहीं भी बाहर नहीं जाते, तब भी उनके अस्तित्व से हिन्दू राष्ट्र-स्थापना का कार्य वृद्धींगत हो रहा है, उदा. अनेक संतों का कार्य के लिए आशीर्वाद मिला है, अनेक राष्ट्रप्रेमी और धर्मप्रेमी हिन्दू राष्ट्र-स्थापना के लिए संगठित और सक्रीय हो रहे हैं ।

२४. भावी भीषण आपातकाल के दृष्टिकोण से कार्य

२४ अ. भावी भीषण आपत्काल का विचार उन्होंने अपने द्रष्टापन के कारण अनेक वर्ष पहले ही प्रस्तुत किया था । उन्होंने आपातकाल में आधुनिक वैद्य (डॉक्टर), वैद्य, औषधियां इत्यादि उपलब्ध न होने पर जीवनरक्षा के लिए उपयुक्त विविध उपचारपद्धतियों के विषय में विपुल जानकारी संग्रहित करना और आगे उस विषय में ग्रंथ भी प्रकाशित करना

२४ आ. प्रथमोपचार प्रशिक्षण, आपातकालीन सहायता प्रशिक्षण और अग्निशमन प्रशिक्षण संबंध में जनजागृति करना

२४ इ. ‘भावी भीषण आपातकाल में जीवनरक्षा होने के लिए अभी से साधना के अतिरिक्त पर्याय नहीं’, यह समाजमन पर अंकित करना

२५. नाडीपट्टी-वाचक और ज्योतिषियों के गौरवोद्गार  -‘सच्चिदानंद परब्रम्ह डॉक्टरजी का कार्य जगभर फैलनेवाला है !’

अ. तमिलनाडु के पू. डॉ. ॐ उलगनाथन्, पुणे के श्री. मुदलियार गुरुजी आदि ५ – ६ नाडीपट्टी-वाचकों ने बताया कि ‘सच्चिदानंद परब्रम्ह डॉ. आठवलेजी राष्ट्र और धर्म का महान कार्य कर रहे हैं और यह कार्य आगे बहुत बढेगा । जग भर में इसका विस्तार होगा !’

आ. सच्चिदानंद परब्रम्ह डॉक्टरजी के हाथ-पैरों की छाप देखकर कल्याण की श्रीमती इंदिरा सोनवणे, डोंबिवली के डॉ. उदयकुमार पाध्ये आदि ७ – ८ ज्योतिषियों ने भी उपरोक्त अनुसार गौरवोद्गार कहे, जबकि उन्हें पता भी नहीं था कि वे छाप किसके हैं ।

इ. सच्चिदानंद परब्रम्ह डॉक्टरजी का महामृत्युयोग टले और उनके राष्ट्र और धर्म कार्य में आनेवाली बाधाएं दूर हों, इसलिए कुछ संत, नाडीपट्टी-वाचक और ज्योतिषी स्वयं ही अनुष्ठान, धार्मिक विधि आदि के माध्यम से सहायता कर रहे हैं ।

२६. भावी हिन्दू राष्ट्र का दायित्व, इसके साथ ही धर्मसत्ता की धुरा संभालने के लिए अगली पीढियों को सक्षम बनाना

अ. साधना का संस्कार दृढ हुए धर्मप्रसारक तैयार करना

आ. विविध सेवाक्षेत्रों में सेवारत (आध्यात्मिक शोधकार्य, ग्रंथनिर्मिति, कला, ध्वनिचित्रीकरण आदि क्षेत्रों के) अनेक साधकों को वे जो कार्य कर रहे हैं उसे उत्तम ढंग से करने के लिए सक्षम बनाना

इ. दैवीय (सात्त्विक) बालकों को भावी हिन्दू राष्ट्र संभालने की दृष्टि से  सक्षम करना : ईश्वर ने गत कुछ वर्षाें में उच्च लोकों से सैकडों जीवों को पृथ्वी के अनेक देशों में जन्मा है । जन्म से ही आध्यात्मिक स्तर अच्छा होनेवाले ये बालक ‘दैवीय बालक’हैं । ‘उनमें विद्यमान सुप्त गुणों को पहचानकर, उन्हें विविध सेवाएं सिखाना और अगले चरण की साधना बताकर उनका संतपद तक का मार्गक्रमण करवा लेना’, इस प्रकार उन्हें हिन्दू राष्ट्र संभालने की दृष्टि से सक्षम बनाना शुरू है ।

२७. भारतीय संस्कृति के जागतिक प्रसारार्थ ‘भारत गौरव पुरस्कार’ देकर फ्रांस की संसद में सम्मान (५ जून २०२४)

अधिक वृत्त पढें : फ्रांस के सीनेट में ‘भारत गौरव पुरस्कार’ देकर सनातन संस्था के संस्थापक सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. जयंत आठवलेजी का सम्मान !

(संपूर्ण परिचय के लिए पढें – सनातन का ग्रंथ ‘सच्चिदानंद परब्रम्ह डॉ. आठवलेजी के सर्वांगीण कार्य का संक्षिप्त परिचय’)

सच्चिदानंद परब्रम्ह डॉक्टरजी के ‘अपने कार्य और विशेषताओं के संबंध में परिचय’ पढने के पश्चात उनके मन में ईश्वर के प्रति निर्माण हुआ कृतज्ञताभाव !

सच्चिदानंद परब्रम्ह डॉ. जयंत आठवलेजी का अद्वितीय कार्य और विशेषताओं का संक्षिप्त परिचय !’ यह लेख पढने के उपरांत मेरे मन में विचार आया, ‘इतनी अल्प अवधि में इतने विविधांगी कार्य मेरे हाथों कैसे हुए ? ग्रंथलेखन; चित्रकला, संगीत आदि कला; आश्रम की वास्तु का निर्माणकार्य जैसे अनेक क्षेत्रों में शिक्षण न लेते हुए भी मैं उन क्षेत्रों में साधकों को आध्यात्मिक स्तर पर मार्गदर्शन कैसे कर सकता हूं ? शारीरिक स्वास्थ्य ठीक न रहने से कक्ष के बाहर जाना भी कठिन होता है । ऐसे में राष्ट्र और धर्म के संदर्भ में कार्य की अभिनव कल्पना मुझे कैसे सूझती है ? अनेक राष्ट्रप्रेमी और धर्मप्रेमियों को मैंने देखा भी नहीं है तब भी उनके मन में मेरे विषय में ‘पूज्य’ भाव कैसे निर्माण होता है और वे सनातन के कार्य से कैसे जुड जाते हैं ?’ इन सभी का उत्तर एक ही है और वह है ‘साधना’ ! मैं साधना करता हूं इसलिए भगवान मुझे उस उस समय जो योग्य है वह मुझे सुझाते हैं । ऐसा प्रतीत होता है जैसे वे मेरा हाथ थामे हुए आगे ले जा रहे हैं । पहले साधकों के प्रश्न पूछने पर मुझसे अपनेआप उत्तर दिए जाते थे । आगे-आगे मेरे मन में कोई प्रश्न निर्माण होने पर तुरंत ही भगवान मुझे उस प्रश्न का उत्तर भी सुझाते हैं । अब मन में प्रश्न भी निर्माण नहीं होते और अपने आप ही जो भी योग्य  होता है वह सूझता जाता है और उस अनुसार कृति करने पर कार्य अच्छा होता है । संक्षेप में ‘इदं न मम ।’ (भावार्थ : यह मुझसे नहीं हुआ ।) इसकी मानो भगवान ही मुझे प्रचीति दे रहे हैं । इससे ‘मैं बहुत कार्य करता हूं । मुझे बहुत प्रसिद्धी मिले’, ऐसा अहं भी मुझमें निर्माण न हो, इसकी भगवान ही ध्यान रखते हैं । इसलिए मैं भगवान के चरणों में अनंत अनंत बार कृतज्ञ हूं ।’

– डॉ. आठवले

संत रहीम के सुवचन अनुभव करनेवाले सच्चिदानंद परब्रम्ह डॉ. जयंत आठवले !

‘संत रहीम का एक दोहा है ‘एकै साधे सब सधै ।’, अर्थात ‘एक साध्य करने पर सब साध्य होता है’, यह सुवचन मैं प्रतिदिन अनुभव करता हूं । मेरे संदर्भ में ‘एक साध्य’, अर्थात ‘ईश्वर का आशीर्वाद’ और ‘सर्व साध्य’, अर्थात विविध विषयों के अंतर्गत सेवा कर पाना, उदा. चित्रकला, संगीत, मूर्तिकला, शास्त्रीय शोधकार्य इत्यादि अनेक विषयों की कुछ भी जानकारी न होते हुए भी उस संदर्भ में मैं साधकों को मार्गदर्शन कर सकता हूं ।’

– डॉ. आठवले

वाईट शक्ति : वातावरण में अच्छी और बुरी शक्तियां कार्यरत होती हैं । ‘अथर्ववेद में अनेक स्थानों पर बुरी शक्ति, उदा. असुर, राक्षस, पिशाच इसके साथ ही जादू-टोना, करनी, भानामती इत्यादि को प्रतिबंधित करने के लिए मंत्र दिए हैं । अनिष्ट शक्तियों के कष्टों के निवारणार्थ विविध आध्यात्मिक उपाय वेदादि धर्मग्रंथों में बताए हैं ।

सूक्ष्म : व्यक्ति का स्थूल अर्थात प्रत्यक्ष दिखाई देनेवाले अवयव नाक, कान, आंखें, जीभ और त्वचा भी पंचज्ञानेंद्रिय हैं । ये पंचज्ञानेंद्रियां, मन और बुद्धि के परे अर्थात ‘सूक्ष्म’ । इस ‘सूक्ष्म’के ज्ञान के संबंध में विविध धर्मग्रंथों में उल्लेख है ।

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