अनुक्रमणिका
१. मर्दन करने की आवश्यकता

शरीर की क्षमता से अधिक परिश्रम करने पर, एकाएक आपातकालीन कृति करनी पड जाए अथवा कृति अनुचित पद्धति से की जाए तो अपने स्नायु थक जाते हैं अथवा उनमें अकडन उत्पन्न हो जाती है । ऐसे समय पर उनमें अशुद्ध द्रव्य निर्माण होते हैं । वे शरीर की वाहिनियों में पूर्णरूप से अवशोषित नहीं होते अथवा धीरे-धीरे अवशोषित होते हैं । इससे स्नायुओं में वेदना होने लगती है । फिर ऐसी स्थिति में काम करने में अधिक कष्ट होता है । इसके साथ ही वेदना के कारण कई बार रात में नींद भी नहीं लगती । वास्तव में जमा हुए द्रव्य पुन: मूल प्रवाह में आने के लिए रात में आरामदायी नींद लगना आवश्यक होता है ।
मर्दन करने से ये अशुद्ध द्रव्य मूल प्रवाह में प्रवाहित होने के लिए प्रवृत्त किए जाते हैं । ऐसा करने से स्नायुओं में जमा द्रव्यों का अधिकांश भाग निकल जाता है । इसलिए वेदना कम हो जाती है । शरीर हलका लगने लगता है । इससे आराम मिलता है । ये द्रव्य पुन: निर्माण होने तक थके हुए शरीर को नींद लग जाती है और निर्माण होनेवाले द्रव्य की गति अल्प होकर उसका नियमन होता है ।
२. मर्दन कब करना चाहिए ?
अ. अनेक दिनों से शरीर में सूजन होना
आ. स्नायुयों में अकडन
इ. स्नायुओं पर तनाव
३. मर्दन करने के लाभ
अ. स्नायुओं को आराम मिलता है ।
आ. मर्दन किए भाग के अशुद्ध द्रव्य जाकर शुद्ध रक्तप्रवाह पुन: पहले की भांति आरंभ हो जाता है ।
इ. मर्दन करने से बडे जख्मों की खपली त्वचा से चिपकती नहीं । ऐसा होने से मोटी खपली के कारण होनेवाली वेदना, इसके साथ ही जोडों की गतिविधियों में आनेवाली अडचनें दूर होती हैं ।
ई. सोने से पहले मर्दन करने से अच्छी नींद आती है और शारीरिक तनाव के कारण निर्माण होनेवाले द्रव्यों का नियमन होता है । हम कपडे धोते समय उनका मल निकाल बाहर करने के लिए उन्हें घिसते हैं, पटकते हैं और धोने के उपरांत उनका पानी निकालने के लिए उन्हें निचोडते अथवा झटकते हैं । मर्दन करते समय स्नायुयों पर भी ऐसी ही कपडों समान प्रक्रिया होनी अपेक्षित है । स्नायु थोडे नाजुक होने से हलके हाथों से उनका मर्दन करें ।
४. मर्दन करने की योग्य पद्धति
प्रकार १

तर्जनी एवं अंगूठा शरीर के बाधित भाग के चारों ओर फैलाकर रखें । तर्जनी एवं अंगूठे के हथेली के भाग से (webspace) शरीर के बाधित भाग पर धीरे से दबाएं । हाथ शरीर के निचले भाग से ऊपर के भाग की ओर लें । ऐसे करते समय हाथ बीच में ही न उठाएं । फर्श पर पडा हुआ पानी जैसे हम कपडे से आगे ढकेलते हैं, उसीप्रकार शरीर में जमा हुआ अशुद्ध द्रव्य हमें मर्दन कर दूर करना है, इसका भान रहना चाहिए । यह करते समय द्रव्य अनेक बार किनारे से सरक जाता है । ऐसा न हो; इसलिए तर्जनी और अंगूठा शरीर के बाधित भाग के सर्व ओर पूर्णत: फैलाना आवश्यक होता है । शरीर के उस भाग पर हाथ फेरते समय उसका दाब सर्वत्र समान होना चाहिए ।
प्रकार २

हाथ के अंगूठे से अथवा अंगूठे के नीचे हथेली के उभरे हुए भाग से (thenar eminence) अथवा छिगुनी (छोटी उंगली) के नीचे की हथेली के उभरे हुए भाग से (hypo-thenar eminence) रोगी के शरीर पर मध्यम से अधिक दाब देते हुए हाथ वर्तुलाकार घुमाएं । (घडी की अथवा उसकी विरुद्ध दिशा में भी घुमा सकते हैं ।) वर्तुलाकार घुमाते हुए बिना हाथ को उठाए शरीर के भाग पर ऊपर की दिशा में (स्प्रिंगसमान) ले जाएं । हाथ गोलाकार में घुमाते समय आधे वर्तुल में अधिक दाब दें, शेष आधे वर्तुल में दाब अल्प करें । पूर्ण वर्तुल दाब देकर भी देखें । जिसप्रकार से रोगी को अच्छा लगे, उसप्रकार से मर्दन करें ।
इस प्रकार से स्नायुओं में अशुद्ध द्रव्य वहां से बाहर निकाल दिया जाता है । यह प्रकार करने के पश्चात प्रकार १ पुन: करें । ऐसा करने पर प्रकार २ करने पर जो द्रव्य बाहर निकाल दिए जाते हैं, वे मूल प्रवाह में प्रवाहित किए जाते हैं ।
५. घाव सूखना आरंभ होने पर उसकी खपली मोटी होकर त्वचा के नीचे की परतों से चिपके नहीं; इसलिए किया जानेवाला मर्दन
कोई बडी शस्त्रक्रिया होने पर वहां टांके डालते हैं । उनके सूखने पर त्वचा के नीचे की परतों पर उनके चिपकने की संभावना होती है । उसीप्रकार किसी बडे घाव के सूख जाने पर उसकी खपली भी त्वचा के नीचे की परतों पर चिपक सकती है । इसलिए संबंधित जोडों की गतिविधि करने के समय अडचन आ सकती है । ऐसा न हो; इसलिए घाव सूखना आरंभ होने पर वैद्यकीय परामर्श लेकर उसपर धीरे से आगे दिए समान मर्दन करें ।
खपली के दोनों ओर अपने अंगूठे रखें । अंगूठे आमने-सामने न रखते हुए, एक अंगूठा दूसरे अंगूठे से थोडा नीचे रखें । फिर एक-एक कर अंगूठे से मध्यम दाब देकर खपली एक-एक कर एकओर ले जाएं । ऐसा करते हुए केवल खपली हिल रही है ना, इस ओर ध्यान दें । वैसा न हो रहा हो, तो नीचे की दिशा में दाब थोडा अल्प कर आडी दिशा में दाब दें । मर्दन से पहले सेक लेंगे तो उत्तम होगा । ऐसा करने से खपली अंदर से त्वचा को चिपकेगी नहीं और उसके बाद गतिविधि में अडचन नहीं आती ।
६. मर्दन करते समय ध्यान में रखी जानेवाली बातें
अ. मर्दन हमेशा शरीर के ऊपर की और बीच की दिशा में करें । उंगलियों से ऊपर जोडों की दिशा में अथवा शरीर के मध्यभाग में ऐसे करें ।
आ. मर्दन छोटे-छोटे भाग में करने से अधिक परिणामकारक होता है । पूरे पैर को मर्दन करने के बजाय पहले उंगलियों को, फिर तलुवे के, फिर टखने से घुटनों की ओर, घुटनों से जांघों तक करें । हाथ को मर्दन करते समय पहले उंगलियां, फिर हथेली, कलाई से कोहनी, कोहनी से कंधा अथवा कांख और कांख से छाती तक ऐसे करना चाहिए ।
इ. मर्दन करते समय तेल अथवा पावडर का उपयोग कर सकते हैं । औषधीय मलहम (क्रीम से) मर्दन करना संभवत: टालें । तेल अथवा पावडर के उपयोग का उद्देश्य से हाथ और त्वचा में घर्षण न्यून करना, होता है । घर्षण न्यून होने से हाथ त्वचा पर सहजता से फेर सकते हैं और रोगी को उसका कष्ट भी नहीं होता । औषधीय तेल से मर्दन करने पर उसका औषधीय परिणाम भी दिखाई देता है ।
ई. हाथ-पैरों में सूजन आई हो तो मर्दन करते समय वह भाग हृदय के स्तर से ऊपर होना चाहिए । उसके लिए वह २-३ तकियों पर रख सकते हैं ।
उ. चोट लगी हो अथवा मोच आ गई हो, तो पहले एक सप्ताह मालिश कर सकते हैं । तेल लगाना हो तो उसे हलके हाथों से लगाएं ।
ऊ. मर्दन करनेवाले के नाखून कटे हों ।
ए. मर्दन करनेवाले व्यक्ति को, इसके साथ ही बीमार व्यक्ति को कोई भी संसर्गजन्य, विशेषरूप से त्वचा का कोई रोग न हो ।
ऐ. मर्दन धीरे से और एक लय में करने से मज्जासंस्था प्रवृत्त होकर सभी नसें आरामदायी (relax) होती हैं । इसके परिणामस्वरूप रोगी को नींद आने लगती है । मर्दन (मॉलिश) करते समय अथवा करने के पश्चात नींद लग जाना, यह अच्छा लक्षण है ।
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