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अनुक्रमणिका
मृत्यु के उपरांत का क्रियाकर्म श्रद्धापूर्वक और विधिवत करने से मृत व्यक्ति की लिंगदेह भूलोक में अथवा मृत्युलोक में न अटकते हुए, उसे सदगति मिलकर वह अगले लोकों में जा सकती है । इसलिए उससे (पूर्वजों द्वारा) परिवारवालों को कष्ट होने की, साथ ही लिंगदेह के अनिष्ट शक्तियों के नियंत्रण में जाने की संभावना भी घट जाती है ।
६. मृतदेह को अग्नि देना (दहनविधि)

६ अ. दहनसंस्कार विद्युत्दाहिनी में न करते हुए चिता को अग्नि देकर विधिवत् करना चाहिए !
विधिवत् दहनसंस्कार के लिए स्मशानभूमि उपलब्ध न हो तो दत्तगुरु से प्रार्थना कर अपनी अडचन बताएं और ‘श्री गुरुदेव दत्त’ का जप करते हुए विद्युत्दाहिनीद्वारा दहनसंस्कार करें ।
६ आ. मृतदेह चिता पर रखना
अ. स्मशान में पहुंचने पर अर्थी सहित मृतदेह चिता पर रखते समय मृत व्यक्ति के पैर उत्तर दिशा में और सिर दक्षिण दिशा में हो, ऐसा करें ।
आ. अर्थी की सभी रस्सियां और बांस (अथवा अन्य लकडियां) खोल दी जाएं । इन दाेनों को भी चिता पर रख दें अथवा स्थानीय परंपरानुसार करें ।
इ. मृतदेह के हाथ-पैरों के बंधे अंगूठे खोल दें ।
६ इ. चिता प्रज्वलित करनेसे पूर्व की विधियां
अ. मृत व्यक्ति के मुख, नाक के दोनों छिद्रों एवं कान में तथा आंखों पर सोने के टुकडे रखें । सोने के टुकडे रखना संभव न हो, तो दर्भ के अग्रभाग से अथवा तुलसी के पत्तों से घी की बूंदें डालें ।
आ. पुरोहितों के बताए अनुसार मंत्रोच्चार करते हुए घी की कुछ आहुतियां दें ।
इ. मृत व्यक्ति का मस्तक, मुख, दोनों बाहू / भुजाएं तथा छाती, इन पांच स्थानोंपर सत्तू / चावल के आटे से बने सुपारी के आकार के गोले रखें । प्रत्येक गोले पर घी डालें ।
ई. कुछ प्रांतों में अंतिमयात्रा में आए लोग मृतदेह पर चंदन की लकडियां अथवा अन्य लकडियां, उदबत्ती अथवा कपूर रखते हैं । यह कृति धर्मशास्त्र में बताए अनुसार नहीं है अपितु लौकिक प्रथा है ।
६ ई. चिता को अग्नि देना
अ. कर्ता मटकी में लाई अग्नि की सहायता से पुरोहितों के बताए अनुसार चिता को मंत्रोच्चार सहित अग्नि दे ।
आ. प्रथम मृतदेह के (पुरुष हो तो) सिर (मस्तक)की ओर अथवा (स्त्री हो तो) पैरों की ओर एवं तत्पश्चात अप्रदक्षिणा द्वारा (घडी की सुई की विपरीत दिशा में) घूमते हुए सर्व ओर से चिता प्रज्वलित करे । चिता प्रज्वलित करने के लिए लाई गई अग्नि पर नारियल की कोई टहनी जलाकर उसका उपयोग करें ।
इ. चिता में ‘टायर’ जैसी वस्तुओं का उपयोग टालें । मिट्टी के तेल का उपयोग करना ही पड जाए, तो वह अत्यल्प करें । इसके स्थान पर तिल का तेल, नारियल का तेल, देसी घी आदि का उपयोग करें ।
ई. जहां तक संभव हो, चिता का धुआं अपने शरीर को न लगने दें ।
उ. मृतदेह की कपालक्रिया के पश्चात (कपाल फूटने की ध्वनि होने के पश्चात) कर्ता कंधे पर जल से भरी हुई मटकी लेकर मृत व्यक्ति के पैरों की ओर दक्षिण दिशा की ओर मुख कर खडा रहे । दूसरा कोई भी व्यक्ति कर्ता के पीछे खडे होकर श्मशान के ही छोटे पत्थर से (इस पत्थर को अश्मा कहते हैं) उस मटकी के गले के नीचे एक छिद्र करे । कर्ता मटकी का जल फैलाते हुए चिता के चारों ओर घडी की सुई की विपरीत दिशा में प्रथम परिक्रमा करे ।
दूसरा व्यक्ति मटकी पर पुनः प्रथम छिद्र के नीचे दूसरा छिद्र करे । कर्ता पुनः पूर्वानुसार दूसरी परिक्रमा करे । तत्पश्चात पुनः दूसरेके नीचे तीसरा छिद्र करें । कर्ता तीसरी परिक्रमा करे ।
तीसरी परिक्रमा के उपरांत मृत व्यक्ति पुरुष हो तो उसके सिर की दिशा में मृतक की ओर पीठ करें तथा मृत व्यक्ति स्त्री हो, तो उसके पैरों की दिशामें मृतक की ओर पीठ कर खडे होकर बिना पीछे मुडे मटकी कंधे से पीछे डालकर फोड दें ।
टिप्पणी – वर्तमान काल में चिता को अग्नि देने के पश्चात तुरंत उपरोक्त अनुसार कृति करते हैं ।
ऊ. मटकीपर छिद्र किया अश्मा कर्ता बिना भूले ध्यान से घर लेकर आए ।
७. दहनविधि के उपरांत की जानेवाली कृति
७ अ. धर्मशास्त्र द्वारा बताई गई पद्धति
अ. दहनविधिके पश्चात तुरंत नदी, तालाब अथवा कुएं पर कर्तासहित सभी परिजन स्नान करें ।
आ. परिजन पुरोहितों के बताए अनुसार अश्मा पर तिलांजली दें । जिनके पिता विद्यमान हैं, ऐसे व्यक्ति तिलांजली न दें ।
इ. स्मशान से घर आनेपर पहले अश्मा घर के बाहर सुरक्षित स्थान पर रखें ।
ई. स्मशान से लौटने पर घर में प्रवेश करने से पूर्व नीम की पत्ती चबाकर, उसे थूक दें । उसे निगलें नहीं । तत्पश्चात आचमन कर अग्नि का दर्शन कर तथा जल, गोमय, श्वेत राई आदि मांगलिक पदार्थों को हाथ से स्पर्श करते हुए पत्थर पर (घरकी दहलीज पर) पैर रखकर, प्रथम दायां पैर घर की दहलीज पर रखें । फिर धीरे-धीरे घर में प्रवेश करें । यदि घर के प्रवेशद्वार पर पत्थर न हो अथवा घर की दहलीज पत्थर की न हो तो प्रथम दायां पैर सीधे घर के अंदर रखकर घर में प्रवेश करें ।
७ आ. धर्मशास्त्रानुसार बाहर स्नान करना संभव न हो तो नीचे दिए अनुसार करें ।
अ. परिजन पुरोहितों के बताएनुसार अश्मा पर तिलांजली दें । जिनके पिता जीवित हैं, वे तिलांजली न दें ।
आ. अश्मा घर के बाहर सुरक्षित स्थान पर रखें ।
इ. घर में प्रवेश करने से पहले प्रत्येक को स्वयं पर गोमूत्र अथवा गोमूत्र-अर्क मिश्रित जल छिडककर शुद्धि करनी चाहिए ।
ई. घर में अन्यत्र कहीं भी स्पर्श न करते हुए ‘श्री गुरुदेव दत्त’ का नामजप करते हुए स्नान करें ।
उ. नीम के पत्ते चबाकर थूक दें; उसे निगलें नहीं ।
ऊ. फिर आचमन कर पाषाण, गोमय, अक्षता, दूर्वा, वृषभ, सफेद सरसों इत्यादि में से जो भी उपलब्ध हो, उसे दाएं हाथ से स्पर्श करें ।
८. दहनविधि के दिन भोजन कौन पकाए और वह कैसा होना चाहिए ?
मृत व्यक्ति के घर के सदस्यों को अन्य कुल के पडोसी अथवा स्नेहियों के घर में पकाए अन्न (उदा. कडी-चावल, दाल-चावल की खिचडी जैसे सादे पदार्थ) खाएं । यदि संभव न हो, तो घर में अन्य कुल की महिलाओं से भोजन बनवा लें । परिस्थितिनुरूप अन्न बाहर से खरीद कर ला सकते हैं; केवल मृत व्यक्ति के घर में उसके कुल का काेई भी व्यक्ति भोजन न बनाएं ।
९. अस्थिसंचय (अस्थियां एकत्र करना)
१. दहनसंस्कार के दिन अथवा उसके दूसरे, तीसरे, चौथे, सातवें अथवा नौवें दिन अस्थियां एकत्र करें ।
२. द्विपाद, त्रिपाद और कर्ता के जन्मनक्षत्र, इन नक्षत्रों के दिन अस्थियां एकत्र न करें ।
३. संभव हो तो रविवार, मंगलवार और शनिवार को लाना टालें ।
४. संभव हो तो प्रतिपदा, षष्ठी एवं एकादशी को टालें ।
इसमें कुछ अडचन हो तो पुरोहितों से पूछकर निर्णय लें ।
१०. अस्थिविसर्जन
अस्थिसंचय करने के पश्चात उसी दिन अथवा व्यक्ति की मृत्यु के पश्चात दस दिनों के अंदर अथवा दसवें दिन उन अस्थियों का विसर्जन बहते पानी में करें । (तब तक ‘अस्थियां कहां रखनी हैं ?’, यह पूरोहितों से पूछ लें ।)
कुछ कारणवश दस दिनों के पश्चात अस्थिविसर्जन करना हो तो उसके लिए योग्य दिन और उस अनुसार आवश्यक विधि पुरोहितों से पूछकर करें ।
११. पिंडदान करना
१. धर्मशास्त्रानुसार पहले दिन से १० वें दिन तक प्रतिदिन तिलांजली, पिंडदान और विषम दिन पर विषम श्राद्ध करें । ‘पिंडदान कहां करें ?’, यह ‘मृत्यु किसकी हुई है ? कौन से प्रकार का श्राद्ध है ? श्राद्ध की कौन-सी पद्धति उपयोग की है ?’ आदि के अनुसार निश्चित होता है । अंत्येष्टी का पिंडदान सामान्यत तीर्थक्षेत्र, नदी के तट पर, घाट पर, स्मशान में अथवा घर के बाहर किया जाता है । १० वें दिन किया जानेवाला पिंडदान विधि में पिंड को कौए का स्पर्श करना महत्वपूर्ण समझा जाता है ।
पुरोहितों की अनुपलब्धता के कारण, कर्ता की आयु अनुसार अथवा अन्य कुछ कारणवश प्रतिदिन सर्व विधि करना संभव न हो, तो पुरोहितों की सलाहानुसार ९ वें अथवा १० वें दिन विधि प्रारंभ करें ।
२. दसवें दिन पिंडदान विधि होने के पश्चात अश्मा पर थोडा-सा नारियल का तेल डालकर उसे बहते पानी में विसर्जित करें ।
१२. ११ वें एवं १२ वें दिन की जानेवाली कृतियां
१. ११ वें दिन स्नान होने के पश्चात वास्तु में पंचगव्य होम कर घर में पंचगव्य छिडकें । सभी पंचगव्य प्राशन करें ।
२. ११ वें अथवा १२ वें दिन कर्ता को मृत व्यक्ति के उद्देश्य से वृषोत्सर्ग, एकोद्दिष्ट श्राद्ध, रुद्रगणश्राद्ध, वसुगणश्राद्ध, इसके साथ ही सपिंडीकरणश्राद्ध करने का अधिकार मिले इसलिए षोडशमासिकश्राद्ध (टिप्पणी), विविध दान इत्यादि पुरोहितों के परामर्श अनुसार करें ।
३. १२ वें दिन सपिंडीकरण श्राद्ध (टिप्पणी) करें । सपिंडीकरण श्राद्ध करने से मृत जीव को ‘पितृ’ की संज्ञा प्राप्त होकर उसे पितृलोक में स्थान मिलता है ।
टिप्पणी – वास्तव में, १६ मासिक श्राद्ध उस उस माह में करना और सपिंडीकरण श्राद्ध वर्षश्राद्ध के अगल दिन करना उचित होता है; परंतु आजकल वर्षभर उत्तरीय सहित सभी नियमों का पालन करना संभव नहीं होता, इसके साथ ही घर में उस काल में अन्य मांगलिक कार्यक्रम करना संभव नहीं होता । इसलिए यह विधि ११ वें अथवा १२ वें दिन की जाती है ।
१३. १३ वें दिन की जानेवाली निधन शांतिविधि (शांतोदक)
१३ वें दिन निधन शांतिविधि करें और सभी को बुलाकर मीठा भोजन करवाएं ।
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