
१. तारापीठ का पौराणिक महत्त्व
‘५१ शक्तिपीठों में से ५ शक्तिपीठ बंगाल के बीरभूम जिले में हैं । बकुरेश्वर, नालहाटी, बंदीकेश्वरी, फुलोरादेवी एवं तारापीठ, ये वे शक्तिपीठ हैं । द्वारका नदी के तट पर महास्मशान में सती के तीसरे नेत्र की पुतली का तारा गिरा था, इसलिए इसे ‘तारापीठ’ कहते हैं । तारापीठ प्रसिद्ध तंत्रपीठ है । इस मंदिर की विशेषता यह है कि स्मशान में जलते हुए शव का धुआं श्री तारादेवी मंदिर के गर्भगृह तक जाता है । भारत में सभी नदियां उत्तर से दक्षिण दिशा की ओर बहती हैं; केवल यहां की द्वारका नदी दक्षिण दिशा से उत्तर की ओर बहती है, यह एक अनोखी विशेषता है ।
२. महर्षि वसिष्ठ ऋषि के चरणस्पर्श से पावन हु्आ तारापीठ !
तारापीठ राजा दशरथ के कुलपुरोहित महर्षि वसिष्ठ का सिद्धासन भी है । प्राचीन काल में महर्षि वसिष्ठ ने इस स्थान पर श्री तारादेवी की उपासना कर सिद्धी प्राप्त की थी । उस समय उन्होंने मंदिर की स्थापना की थी । काल के प्रवाह में वह मंदिर भूमि में धंस गया । कुछ काल बीतने के पश्चात जयव्रत नामक व्यापारी ने पुन: मंदिर का निर्माण किया ।
३. श्री तारादेवी की मूर्ति
श्री तारादेवी का रूप भले ही उग्र है, तब भी यहां के मंदिर में देवी की मूर्ति ‘देवी शिवजी को स्तनपान करा रही है’, इस रूप में है ।इस विषय में ऐसी कथा है कि, ‘देवताओं और दानवों ने समुद्रमंथन किया था । तब भगवान शिव ने समुद्रमंथन से निकले हालाहल विष का प्राशन किया और वे बेेसुध हो गए । तब देवताओं की आज्ञा अनुसार श्री तारादेवी ने भगवान शिव को स्तनपान करवाकर अमृतप्राशन करवाया । यह मूर्ति जयव्रत को यहीं के स्मशान में मिली थी । देवी का मुख छाेड, शेष संपूर्ण मूर्ति फूलों की मालाओं से ढकी होती है ।
४. तारापीठ का महास्मशान
तारापीठ मंदिर के सामने ही महास्मशान है । जिस स्मशान में १ करोड मृतदेहों का अग्निसंस्कार हो चुका होता है, उसे ‘महास्मशान’ कहते हैं । इस स्थान पर अब तक १ करोड से अधिक मृतदेहों का अग्निसंस्कार हुआ है । इसलिए यह सिद्धस्थान है । इस स्थान पर केवल लकडियों की चिता पर ही मृतदेहों का दहन किया जाता है । यहां विद्युतदाहिनी का उपयोग नहीं किया जाता । इस भाग में बिजली का उपयोग नहीं होता । कहते हैं, ‘देवी की इच्छा से ही इस स्थान पर बिजली नहीं चलती ।’ इस स्थान पर वैष्णवों के (विष्णु की उपासना करनेवालों की) मृतदेहों का दहन नहीं किया जाता, अपितु उनकी समाधि बनाई जाती है । इसलिए यहां पर अनेक साधु-संतों के समाधिस्थल हैं ।
एक पुजारी ने बताया, ‘‘जहां मृतदेह का दहन होता है, उस चिता को चितामाई कहते हैं । देवी का खरा रूप चितामाई है । जहां मृतदेह का दहन होता है, वह महाकाल-भैरवी का रूप है । इस चिता में दशमहाविद्याओं का रूप होता है ।’’
५. श्री तारादेवी के परमभक्त संत वामाखेपा
यहां संत वामाखेपा की समाधि है । श्री रामकृष्ण परमहंस के समकालीन वामाखेेपा तारापीठ के सिद्ध और परमभक्त थे । जिसप्रकार रामकृष्ण परमहंस को कालीमाता ने दर्शन दिए थे, उसीप्रकार संत वामाखेपा को भी श्री महाकाली देवी ने स्मशान में दर्शन देकर कृतार्थ किया और उन्हें दिव्य ज्ञान दिया । तारापीठ से २ किलोमीटर के अंतर पर आटला में संत वामाखेपा का जन्म हुआ था । उन्होंने देवी की उपासना की और अल्प अवधि में सिद्धी प्राप्त की ।
(संदर्भ : जालस्थल)
सनातन की श्रीचित्शक्ति (श्रीमती) अंजली गाडगीळ ने लिए श्री तारादेवी के दर्शन !‘वर्ष २०१३ में सनातन की श्रीचित्शक्ति (श्रीमती) अंजली गाडगीळ ने बीरभूम (बंगाल) मेें जाकर श्री तारादेवी के दर्शन लिए । इसके साथ ही उन्होंने हिन्दू राष्ट्र स्थापना की बाधाएं दूर होने और साधकों की रक्षा के लिए प्रार्थना भी की ।’ – श्री. विनायक शानभाग (२२.१०.२०२०) |
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