श्रीवैष्णोदेवी मंदिर हिन्दू धर्मियों के लिए एक पवित्र स्थल है । श्रीवैष्णोदेवी को ‘माता रानी’ कहकर भी संबोधित करते हैं । श्रीवैष्णोदेवी का मंदिर समुद्रतल से ५ सहस्र २०० फुट की ऊंचाई पर है । यह मंदिर जम्मू जिले के कटरा से १४ किलोमीटर चढाई करने के पश्चात एक पहाडी पर है । यह अत्यंत जागृत देवस्थान के रूप में प्रसिद्ध है । इस स्थान पर देशभर से लाखों श्रद्धालु दर्शन के लिए आते हैं ।
१. प्रभु श्रीराम की आज्ञा से उत्तर भारत के माणिक पहाडी पर ध्यानस्थ श्रीवैष्णोदेवी !

१ अ. पुराणों में देवी की महिमा का वर्णन किया है । दक्षिण भारत के रत्नाकर सागर के घर वैष्णोदेवी अवतरित हुईं । वैष्णोदेवी को बचपन में ‘त्रिकुटा’ नाम से संबोधित किया जाता था; परंतु भगवान श्रीविष्णु के वंश में जन्म लेने से उनके नाम ‘वैष्णवी’ पडा । जब त्रिकुटा ९ वर्ष की थी, तब उसने अपने पिता से समुद्रतट पर तपस्या करने की अनुमति मांगी ।
१ आ. समुद्रकिनारे तपस्या करते समय त्रिकुटा ने रामरूप में श्रीविष्णु से प्रार्थना की । सीता की खोज में श्रीराम जब अपनी सेना के साथ समुद्रतट पर पहुंचे । तब ध्यानमग्न दिव्य बालिका ने उनका ध्यान आकृष्ट किया । त्रिकुटा ने आंखें खोलीं और प्रभु श्रीराम से बोली, ‘‘मैंने आपको अपना पति मान लिया है ।’’ श्रीराम उससे बोले, ‘‘इस अवतारकाल में मैंने केवल सीता से एकनिष्ठ रहने का व्रत लिया है ।’’ तदुपरांत भगवान ने उसे आश्वासन दिया, ‘‘कलियुग में मैं कल्की के रूप में अवतार लूंगा, तब तुम्हारी यह इच्छा पूर्ण होगी ।’’
१ इ. श्रीराम ने त्रिकुटा को उत्तर भारत की माणिक पहाडी पर त्रिकुटा की पर्वत श्रृंखलाओं की गुफा में ध्यानमग्न रहने के लिए कहा । तदुपरांत ‘रावण के विरुद्ध श्रीराम विजयी हों, इसलिए त्रिकुटा ने ‘नवरात्र’ उपासना की । श्रीराम ने उसे वचन दिया था कि ‘त्रिकुटा श्रीवैष्णोदेवी के रूप में प्रसिद्ध होगी और सदैव अमर रहेगी । संपूर्ण विश्व श्रीवैष्णोदेवी की स्तुति गाएगा ।’

२. भक्त श्रीधर के भंडारे में आनेवाली बाधा दूर कर भैरवनाथ नामक असुर का भी कल्याण करनेवाली माता श्रीवैष्णोदेवी !
२ अ. भक्त श्रीधर के भंडारे की बाधा दूर करना : श्रीवैष्णोदेवी का श्रीधर नामक एक भक्त था । एक बार उसे देवी ने सुंदर कन्या के रूप में दर्शन दिए और उसे भिक्षुक तथा भक्तों के लिए भंडारा करने के लिए कहा । इस भंडारे के लिए भैरवनाथ नामक स्वार्थी राक्षस भी आया था । ‘भंडारा कैसे संपन्न होगा’, इसकी श्रीधर को चिंता थी । तब देवी ने बालिका के रूप में आकर श्रीधर को आश्वस्त किया और देवी की कृपा से भंडारा संपन्न हुआ ।
२ आ. श्रीवैष्णोदेवी के बाण से उगम हुई ‘बाणगंगा नदी’ ! : भैरवनाथ को ध्यान में आया कि बालिका में अलौकिक शक्ति है । उसे ऐसा लग रहा था कि वह देवी का अवतार है । इसलिए उसने देवी की परीक्षा लेने का निश्चय किया । उसने ९ माह तक इस दिव्य बालिका को ढूंढा । भैरव से दूर भागते हुए देवी ने पृथ्वी पर एक बाण मारा । उससे पानी बाहर आया । यही ‘बाणगंगा’ नदी के नाम से पहचानी जाती है । इस नदी के तट पर देवी के कदमों के चिन्ह हैं । वे आज भी वैसे ही हैं । उन्हें ‘चरणपादुका’, कहा जाता है ।
२ इ. तपस्याभंग करने से भैरवनाथ असुर का सिर उसके धड (शरीर) से अलग करना : श्रीवैष्णोदेवीने ९ माह तपस्या की । इससे आध्यात्मिक ज्ञान और शक्ति प्राप्त की । इस स्थान पर भैरवनाथ को उनका पता लग गया और उनकी तपस्या भंग हो गई । अंत में देवी ने श्री महाकाली का रूप लेकर उसका सिर धड से अलग कर दिया । उसका सिर पवित्र गुफा से ढाई किलोमीटर के अंतर पर गिरा । आज उस स्थान पर श्री भैरवनाथ मंदिर है ।
२ ई. भैरवनाथ की मोक्षप्राप्ति की इच्छा जानकर उसे जन्म-मृत्यु के फेर से मुक्त करना : देवी को पता था कि भैरवनाथ ने मोक्षप्राप्ति की इच्छा से उनकी तपस्या भंग की है । इसलिए देवी ने उसे जन्म-मृत्यु के फेर से मुक्त किया और वरदान दिया कि, ‘जब तक भक्तगण मेरे दर्शन के उपरांत तुम्हारे दर्शन नहीं लेते, तब तक उन्हें मेरे दर्शन की पूर्ण फलप्राप्ति नहीं होगी ।’ फिर वैष्णोदेवी ने ३ पिंडियों सहित (मस्तकों सहित) एक बडी शिला का आकार ले लिया और ध्यानमग्न हो गईं । अब श्रीवैष्णोदेवी माता के मंदिर में इसी शिला के दर्शन सभी को मिलते हैं ।
भक्त श्रीधर देवी को ढूंढते हुए यहां तक आते हैं । वे वहीं उस शिलारूपी देवी की सेवा करने लगते हैं । तब से श्रीधर का घराना पीढी दर पीढी देवी की पुजारी के रूप में सेवारत है ।
जिस स्थान पर श्रीवैष्णोदेवी ने भैरवनाथ का वध किया, यह स्थान ‘भवन’ नाम से प्रसिद्ध है । इस स्थान पर देवी श्री काली (दाईं ओर), देवी श्री सरस्वती (बाईं ओर) और देवी श्री लक्ष्मी (मध्यभाग में) पिंडी के रूपों में गुफा में विराजमान हैं । इन पिंडियों के एकत्रित रूप को वैष्णोदेवी कहा जाता है ।’
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