विवाहविधि द्वारा वधु-वर सहित उपस्थितों का आनंदप्राप्ति की दिशा में मार्गक्रमण होने के लिए कैसे प्रयत्न करने चाहिए, वह इस लेख में प्रस्तुत है ।
१. विवाहमंडप में व्यासपीठ पर सभी को दिखाई दे, ऐसी पद्धति से श्री गणेश, कुलदेवता, उपास्यदेवता और गुरुप्राप्ति हुई हो तो गुरु का चित्र / छायाचित्र लगाकर उनकी पूजा करें । वह स्थान पुष्पों से सुशोभित कर वहां अखंड दीपप्रज्ज्वलन करें ।
२. वर-वधु, इसके साथ ही कटुंबीय, नाते-रिश्तेदार, मित्र परिवारों में से पुरुष धोती / पायजमा-कुर्ता और महिलाएं छ: गज / नौ गज की साडी पहनें ।

३. विवाहस्थल पर ध्वनिक्षेपक पर शहनाईवादन की श्रव्य चक्रिका अथवा यदि संभव हो तो संतों द्वारा रचे गए अथवा गाए गए भजनों की दृश्य-श्रव्यचक्रिका लगाएं ।
४. विवाहविधि के लिए आए सभी कुंकू अथवा तिलक लगाएं ।
५. विवाह शीघ्र समाप्त करने के लिए उसमें अंतर्भूत विधियों को टालें नहीं अथवा उसके लिए पुराहितों पर भी दबाव न डालें । उन्हें वे धर्मशास्त्रानुसार परिपूर्ण करने बताएं ।
६. फिल्मी गीतों की धुनों पर रची हुई अथवा अपनी संस्कृति का अनादर करनेवाले मंगलाष्टक न बोलें ।
७. मंगलाष्टकों के समय वधु-वर पर अक्षता न डालें । वधु-वर के एकदूसरे को पुष्पमाला पहनाने के पश्चात उनके मस्तक पर अक्षता चढाएं ।

८. वधु-वर को शुभकामनाएं देते समय सभी लोग अपने जूते-चप्पल निकालें ।
९. वधु-वर को शुभकामनाएं देते समय अथवा अतिथियों का स्वागत करते समय हस्तांदोलन (शेकहैंंड) न करते हुए हाथ जोडकर नमस्कार करें ।
१०. जब विवाह-विधियां हो रही हों, तब पुरोहित से उन विधियों का अर्थ एवं महत्त्व उपस्थितों को समझाकर बताने का निवेदन करें अन्यथा स्वयं बताएं ।
११. किसी भी धार्मिक कार्य के समय कोलाहल करना अयोग्य है । इसलिए विधियों के चलते समय शोरगुल न हो, इस विषय में कुटुंबीय, नाते-रिश्तेदार आदि सभी ध्यान रखें ।
१२. अत्यंत तेलीय, मिर्च-मसालेदार युक्त पदार्थ अथवा डबलरोटी (ब्रेड), कृत्रिम शीतपेय जैसे तामसिक पदार्थ भोजन में न रखें । इनके स्थान पर दाल-चावल-घी, कचूमर, लड्डू जैसे सात्त्विक पदार्थ भोजन में रखें ।
१३. पश्चिमी प्रथा का प्रतीक स्वरुचि-भोजन (बुफे) पद्धति नहीं, अपितु पारंपरिक भारतीय पद्धति होनी चाहिए ।

१४. अन्न पूर्णब्रह्म होने से थाली में इतना भोजन न परोसें कि उसे फेंकना पडे ।
१५. विधि के चलते समय वर / वधु को ऊपर उठाना, वर-वधु को एकदूसरे पर ढकेलना इत्यादि अपप्रकार न हों, इसकी दक्षता लें ।

विवाहसमारोह का अध्यात्मीकरण करने के लिए नाते-रिश्तेदार एवं मित्रों का सहयोग मिले, इसके लिए आवश्यक सूचना (उदा. अक्षता वधु-वर के सिर पर चढाएं, विधि के समय शोरगुल न करें, वधु-वर को हस्तांदोलन करके शुभकामनाएं न देते हुए नमस्कार करते हुए शुभकामनाएं दें आदि) ध्वनिक्षेपक (लाउडस्पीकर) द्वारा दें, जिससे आपको सभी का सहयोग मिलेगा ।
विवाह के उपरांत भी मायके का उपनाम लगाकर हिन्दू संस्कृति में पति एवं उसके घरवालों से एकरूप होने का तत्त्व अस्वीकारनेवाली स्त्रीमुक्ति किस काम की ?

हिन्दू संस्कृति में विवाह के उपरांत महिला को अपने नाम के साथ ससुराल का उपनाम लगाने की प्राचीन परंपरा है । वर्तमान में आधुनिकतावाद के खूंटे से बंधी कुछ महिलाएं महिलामुक्ति के नामपर मायके एवं ससुराल के, दोनों ही उपनाम लगाती हैं । ‘स्व को त्याग कर दूसरे में विलीन होना’, यह हिन्दू धर्म का मूलभूत सिद्धांत है । प्राचीन परंपरानुसार विवाह के उपरांत लडकी के ससुराल का उपनाम लगाने के पीछे यही उद्देश्य था कि वह ससुराल के कुटुंब में विलीन हो !’
अध्यात्मशास्त्र के अनुसार पुण्यवान पुरुष के पुण्यकर्म और साधना करनेवाले पुरुष की साधना का आधा फल उसकी पत्नी को मिलता है । इस फलप्राप्ति के कारण उसका कल्याण होता है ! जीवन सार्थक होता है; परंतु उसे अपने पति से अधिकाधिक एकरूप होना आवश्यक है । इसलिए उसे अपना नाम, मायके के उपनाम का त्याग करना, पति के कुटुंबियों से एकरूप होने का प्रयत्न करना इत्यादि महत्त्वपूर्ण हैं । वह साध्य होने पर स्त्री का अहंभाव न्यून होकर उसे विवाह का आध्यात्मिकदृष्टि से पूर्ण फल प्राप्त हो सकता है । इससे हमारे ध्यान में यह भी आता है कि पुरुष को पत्नी के कुटुंबियों से एकरूप होना, यह उसे मानसिक स्तर पर सुख देनेवाला है, जबकि स्त्री का अपने पति से और उसके परिवारवालों से एकरूप होना, उसे आध्यात्मिक स्तर पर लाभ देनेवाला है ।
अनेक संतों ने भी अपने शिष्यों के नाम बदले हैं । इसके अनेक उदाहरण देखने मिलते हैं । शिष्यों के नाम बदलने के पीछे यह संकल्पना है कि ‘नाम के साथ आए सभी संस्कार और अहंभाव त्यागकर गुरु से एकरूप हो जाएं ।’ स्त्री को विवाह के उपरांत मायके का नाम त्याग कर, ससुराल का नाम स्वीकारने के पीछे भी यही प्रक्रिया थी । तात्पर्य यह कि विवाह के उपरांत स्त्री का उपनाम बदलने का उद्देश्य उसे बंधन में जकडने का नहीं, अपितु उसे आध्यात्मिकदृष्टि से उन्नत करने का है । इसलिए विवाहित स्त्री द्वारा मायके का उपनाम लगाने का अर्थ है अन्यों में विलीन होने का आध्यात्मिक अवसर गंवाना !
– सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. जयंत बाळाजी आठवले (२७.९.२०१४)
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गर्भाधान (ऋतुशान्ति) संस्कार (प्रथम संस्कार)
नामकरण
तीसरा संस्कार : सीमंतोन्नयन