हिन्दू राष्ट्र की स्थापना हेतु महर्षिजी की आज्ञानुसार रामनाथी, गोवा के सनातन आश्रम में ९वीं बार गणहोम संपन्न
महर्षिजी की आज्ञानुसार १९ अप्रैल २०१७ को ९वीं बार गणहोम किया गया ।
महर्षिजी की आज्ञानुसार १९ अप्रैल २०१७ को ९वीं बार गणहोम किया गया ।
प.पू. डॉक्टरजी ने अन्नपूर्णाकक्ष को सुव्यवस्थित करने के लिए अथक प्रयास किया । आरंभ के दिनों में छोटी-छोटी बातों से अन्नपूर्णाकक्ष की बडी योजनाआें तक उन्होंने व्यक्तिगत रूप से ध्यान दिया और रसोईघर को अन्नपूर्णा-कक्ष बनाया ।
इस चित्रमें भगवान श्रीकृष्णद्वारा धारण किए उपरनेका एक छोर बालभावयुक्त साधिकाद्वारा हठपूर्वक नीचे भूमितक खींचना और इसीसे श्रीकृष्णसे उसकी निकटता स्पष्ट होती है ।
किसी भी कार्य के लिए उचित समय आवश्यक होता है । सन्तों को पता रहता है कि किस कार्य के लिए कौन-सा समय उपयुक्त है । अभी ऐसी कोई स्थूल घटना नहीं हो रही, जिससे अनुमान लगाया जा सके कि भारत में हिन्दू राष्ट्र की स्थापना होगी । परंतु काल की पदचाप सुननेवाले संत जान गए हैं कि हिन्दू राष्ट्र की स्थापना होगी ! निम्नांकित सूत्रों से सभी को काल का महत्त्व ध्यान में आएगा ।
‘गणेशचतुर्थीके दिन भगवान श्रीकृष्ण मुझे सिखा रहे हैं कि श्री गणेशजीकी पूजा भावपूर्णरीतिसे कैंसे करनी चाहिए ।
परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी के मार्गदर्शन के कारण साधकों पर जीवन का प्रत्येक कृत्य कलात्मक रूप से तथा सत्यम् शिवम् सुंदरम् करने का संस्कार हो गया है ।
‘कला की शिक्षा लेते समय मुझे जो सिखने को नहीं मिली, ऐसी सूक्ष्मताएं (बारीकीयां) परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी ने मुझे साधना में आने पर सिखायी । ‘कला से संबंधित सेवा साधना ही है’, यह भी उन्होंने हमारे मन पर प्रतिबिंबित किया ।
अंतर्राष्ट्रीय ख्याति के सम्मोहन उपचार विशेषज्ञ परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी ने २४ मार्च १९९९ को सनातन संस्था की स्थापना की । उन्होंने शीघ्र ईश्वरप्राप्ति के लिए गुरुकृपायोग बताया ।
साधनापथपर मार्गक्रमण करते समय साधककी साधना एक स्तरतक बढनेपर उसका ईश्वरके प्रति भाव जागृत होता है । ईश्वरकी ओर देखनेका दृष्टिकोण साधकके भावानुरूप भिन्न होता है, उदा. अर्जुनका भगवान श्रीकृष्णके प्रति सख्यभाव, हनुमानजीका दास्यभाव आदि ।
प्रभु श्रीराम, १४ वर्ष का वनवास समाप्त कर और रावण को पराजित कर, चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को अयोध्या लौटे थे । तब अयोध्यावासियों ने नगर को तोरण-पताकाआें से सजाकर उनका आनंदपूर्वक स्वागत किया था ।
