वाराणसी सेवाकेंद्र के प्रांगण में उगा हुआ विशेषतापूर्ण अमरूद का पेड !

वाराणसी सेवाकेंद्र के प्रांगण में अमरूद का एक पेड है । इस अमरूद के पेड की विशेषता यह है कि उसके कई स्थानों में एक ही स्थान पर ४ से ५ अमरूद आते हैं और एक ही शाखा की एक ही पंक्ति में कई अमरूद आते हैं । इस पेड का तना मध्यम आकार का है । इस पेड की ओर देखने पर आनंद और उत्साह प्रतीत होता है ।

सनातन के ज्ञानप्राप्तकर्ता साधकों को होनेवाले विविध प्रकार के कष्ट एवं उन्हें मिलनेवाले ज्ञान की विशेषताएं !

विष्णुस्वरूप परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी के धर्मसंस्थापना के कार्य को ज्ञानशक्ति का समर्थन मिलने के लिए ईश्वर सनातन संस्था की ओर ज्ञानशक्ति प्रवाहित कर रहा है । इस प्रवाह में ज्ञानशक्ति से ओतप्रोत चैतन्यदायी सूक्ष्म विचार ब्रह्मांड की रिक्ती से पृथ्वी की दिशा में प्रक्षेपित हो रहे हैं ।

भोलापन, प्रीति और उत्कट राष्ट्र तथा धर्म प्रेम से युक्त फोंडा, गोवा के सनातन के संत पू. लक्ष्मणजी गोरेजी के सम्मान समारोह के प्रमुख सूत्र

६ दिसंबर २०२१ के दिन भोलापन, प्रीति और उत्कट राष्ट्र तथा धर्म प्रेम से युक्त फोंडा, गोवा के सनातन के ८० वर्षीय साधक श्री. लक्ष्मण गोरे सनातन के ११४ वें व्यष्टि संतपद पर विराजमान हुए । श्रीसत्शक्ति (श्रीमती) बिंदा सिंगबाळजी ने पू. गोरेजी के संतत्व के विषय में परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी का संदेश पढकर सुनाया ।

रामनाथी (गोवा) सनातन आश्रम के ध्यानमंदिर में अनेक देवी-देवता होने का विश्लेश्ण

सनातन के आश्रम में २५० से अधिक साधक साधना कर रहे हैं । जितने व्यक्ति, उतनी प्रकृति, उतने साधनामार्ग इस साधना के अन्य एक मूलभूत तत्त्व के अनुसार आश्रम में साधना कर रहे अनेक साधकों में से प्रत्येक के उपास्यदेवता अलग-अलग हो सकते हैं ।

बुद्धिप्रमाणवाद से विश्वबुद्धि द्वारा ज्ञानप्राप्ति के चरण

जिज्ञासुवृत्ति बुद्धि की सात्त्विकता की प्रक्रिया करवाने के लिए महत्त्वपूर्ण है । इसलिए मनुष्य जिज्ञासु के चरण पर होते हुए धर्म अथवा अध्यात्म का ज्ञान प्रथम बुद्धि से जानकर उस अनुसार कृति करते जाने से उसकी बुद्धि सात्त्विक होकर वह प्रथम साधक, तदुपरांत शिष्य और अंत में संत अथवा गुरु इस स्तर तक पहुंच सकता है

कर्करोग जैसी दुःसाध्य बीमारी में भी गुरुदेवजी के प्रति दृढ श्रद्धा के कारण आनंदित रहकर बीमारी का सामना करनेवाले पू. डॉ. नंदकिशोर वेदजी !

‘१०.११.२०१९ को अधिक मात्रा में सेवा व शारीरिक परिश्रम होने के कारण मेरी कमर में पीडा होने लगी । मैंने इस संदर्भ में डॉक्टर से संपर्क किया; परंतु उनके ध्यान में कुछ नहीं आ रहा था अथवा वे मेरी इस बीमारी का अनुमान लगाने में रुचि नहीं ले रहे थे । वे प्रत्येक बार औषधियां दे रहे थे । अधिक मात्रा में पीडाहारी औषधियां लेने से मुझे पेट का भी बहुत कष्ट होने लगा ।

साधकसंख्या अल्प होते हुए भी भावपूर्वक एवं लगन से गुरुकार्य करनेवाले अयोध्या के पू. डॉ. नंदकिशोर वेद !

डॉ. नंदकिशोर वेद से हमारा लगभग १७ वर्षाें से निकट का संबंध था । हम सभी प्रेम से उन्हें ‘नंदकिशोर काका’ कहते थे । मैं उत्तर भारत में सेवा हेतु आया, तब से अयोध्या केंद्र का दायित्व उन्हीं के पास था ।

कठिन प्रसंग में भी कृतज्ञभाव में रहनेवाले और परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी के प्रति अपार भाव रखनेवाले कल्याण (ठाणे) के स्व. माधव साठे (आयु ७५ वर्ष) संतपद पर विराजमान !

कल्याण यहां के श्री. माधव साठे वर्ष १९९८ से सनातन के मार्गदर्शन में साधना कर रहे थे । परात्पर गुरु डॉक्टरजी पर उनकी अपार श्रद्धा थी । साधना की तीव्र लगन के कारण उन्होंने मन लगाकर व्यष्टि और समष्टि साधना की । वर्ष २०१२ में उनका आध्यात्मिक स्तर ६० प्रतिशत घोषित किया गया था ।

साधना की तीव्र लगन और ईश्वर पर दृढ श्रद्धा रख असाध्य रोग में भी भावपूर्ण साधना कर ‘सनातन के १०७ वें (समष्टि) संतपद’ पर आरूढ हुए अयोध्या के पू. डॉ. नंदकिशोर वेदजी (आयु ६८ वर्ष) !

सनातन आश्रम में निवास करनेवाले डॉ. नंदकिशोर वेदजी (आयु ६८ वर्ष) का दीर्घकालीन रोग के कारण ११ मई २०२१ की संध्या को निधन हुआ । वे मूलत: अयोध्या (उत्तर प्रदेश) निवासी थे । २२ मई २०२१ को डॉ. नंदकिशोर वेद को देहत्याग किए १२ दिन पूर्ण हुए । इस दिन साधना की तीव्र लगन और ईश्वर पर दृढ श्रद्धा रख, असाध्य रोग में भी भावपूर्ण साधना कर वे सनातन के १०७ वें (समष्टि) संतपद पर आसीन हुए ।

अखिल मानवजाति पर निरपेक्ष प्रेम (प्रीति) करनेवाले परात्‍पर गुरु डॉ. आठवलेजी !

‘एसएसआरएफ’ के जालस्‍थल पर मृत व्‍यक्‍ति का अंतिमसंस्‍कार करने के संदर्भ में उस पर अग्‍निसंस्‍कार करने के लाभ और दफन करने से होनेवाली हानि के संबंध में जानकारी देनेवाला लेख प्रकाशित किया गया है ।