देश के अनेक राज्यों में अचानक मर रहे हैं पक्षी !

इटली की राजधानी रोम में ईसाई नववर्ष के अवसर पर की गई आतिषबाजी के कारण सड़कों पर सहस्त्रों (हजारों) पक्षियों के मरने के चार दिन ही बाद, भारत के कुछ राज्यों में भी अचानक पक्षियों के मरने की सूचना मिली है।

वर्ष २०२१ में भी कोरोना रहेगा ! – मनोवैज्ञानिक, निकोलस ओजुला, की भविष्यवाणी

२०१८ में कोरोना की भविष्यवाणी करने वाले ३५ वर्षीय मनोवैज्ञानिक, निकोलस ओजुला, ने भविष्यवाणी की है कि कोरोना का प्रभाव २०२१ में जारी रहेगा ।

भावी महाभीषण संकटकाल की दृष्टि से आयुर्वेदीय और होमियोपैथी औषधियां, साथ ही योगासन और प्राणायाम के महत्त्व पर ध्यान दें !

आजकल कई लोग मधुमेह, रक्तचाप, हृदयरोग, तीव्र आम्लपित्त (हाइपर एसिडिटी), घुटनों के दर्द जैसे कई विकारों पर वर्षों से एलोपैथी औषधियों का सेवन कर रहे हैं ।

संकटकाल के घेरे में

कोरोना का संकट आनेपर संकटकालीन स्थिति उत्पन्न होने की चर्चा आरंभ हो गई । एक सूक्ष्म विषाणु ने देखते ही देखते संपूर्ण विश्व का परिवहन (यातायात) ठप्प कर दिया ।

कोरोना संकट के पश्‍चात तीसरा विश्‍वयुद्ध आरंभ होने के ९ प्रबल संकेत !

आजकल पूरे विश्;व में कोरोना का प्रकोप है । विश्व का प्रत्येक देश किसी भी स्थिति में कोरोना से मुक्ति पाने हेतु संघर्ष कर रहा है । अमेरिका और यूरोप में कोरोना के कारण उत्पात मचा है । ये दोनों अपनी दुर्दशा के लिए चीन को ही उत्तरदायी प्रमाणित कर रहे हैं ।

महाप्रलय समान भीषण आपत्कालीन परिस्थिति का सामना करने के लिए साधना कर आत्मबल बढाएं !

आंधी-तूफान, भूस्खलन, भूकंप, महाप्रलय, तीसरा महायुद्ध ऐसी आपत्कालीन परिस्थिति किसी भी क्षण आ सकती है । ऐसी स्थिति में ‘योग्य कृति क्या करनी चाहिए ?’ इसका ज्ञान न होने से सर्वसामान्य व्यक्ति घबरा सकता है और उसका मनोबल भी कम हो जाता है ।

‘कोरोना’ जैसे महासंकट और साधना

आज हम सभी जण ‘कोरोना’ नामक एक महासंकट का सामना कर रहे हैं । गत सदी में पोलिओ, प्लेग, मलेरिया जैसी भयंकर महामारी के कारण लाखों लोगों की मृत्यु हुई थी, ऐसा हमने केवल सुना था ।

आपत्काल का अर्थ एवं स्वरूप

द्वितीय महायुद्ध के समय जर्मनी और ब्रिटन में युद्ध हुआ था । ब्रिटन में पहले ४ दिनों में ही १३ लाख लोगों को स्थलांतर करना पडा था । युद्धकाल में वे प्रकाशबंदी भी आरंभ हो गई ।

युद्ध की तैयारी, प्रत्यक्ष युद्ध तथा नागरिक

‘युद्धस्य कथा रम्या ।’, ऐसा कहा जाता है; परंतु जब प्रत्यक्ष युद्ध होता है और जब वह असीमित कालावधि तक जारी रहता है, तब वह रम्य न रहकर बहुत ही पीडादायी बन जाता है ।

युगों के अनुसार साधना न करनेवाले, युद्ध, त्रिगुण एवं प्राकृतिक आपदाओं की मात्रा !

युगों के अनुसार व्यष्टि एवं समष्टि स्तरों के त्रिगुणों की मात्रा में परिवर्तन होता गया । इनमें प्रदत्त व्यष्टि एवं समष्टि, इन दोनों स्तरों का परिणाम मनुष्य पर होकर उसके विचार एवं कृत्य में परिवर्तन हुआ ।