गर्भाधान (ऋतुशान्ति) संस्कार (प्रथम संस्कार)
इस संस्कार में विशिष्ट मंत्र एवं होमहवन से देह की शुद्धि कर, अध्यात्मशास्त्रीय दृष्टिकोण एवं आरोग्य की दृष्टि से समागम करना चाहिए, यह मंत्रों द्वारा सिखाया जाता है ।
इस संस्कार में विशिष्ट मंत्र एवं होमहवन से देह की शुद्धि कर, अध्यात्मशास्त्रीय दृष्टिकोण एवं आरोग्य की दृष्टि से समागम करना चाहिए, यह मंत्रों द्वारा सिखाया जाता है ।
जिसप्रकार बच्चे का लिंग गर्भाशय में ही निश्चित होता है, उस प्रकार बच्चे का नाम भी पूर्वनिश्चित ही होता है । शब्द, स्पर्श, रूप, रस एवं गंध, ये घटक एकत्रित रहते हैं; इसीलिए बच्चे का जो रूप है उसके अनुसार उसका नाम भी होता है ।
सीमंतोन्नयन शब्द सीमंत (मांग की रेखा) एवं उन्नयन (केश ऊपर से पीछे की ओर करना), इन दो शब्दों से बना है । सीमंतोन्नयन अर्थात पत्नी के सिर के केश ऊपर से पीछे की ओर कर मांग निकालना ।
जातकर्म विधि के उद्देश्य हैं – उदकप्राशनादि से गर्भसंबंधी दोषों का निवारण हो एवं पुत्रमुख देखने से पुत्र का पिता ऋणत्रयी से (पितृऋण, ऋषिऋण, देवऋण से) तथा समाजऋण से मुक्त हो ।
चूडा अर्थात पुरुष की शिखा (चोटी) । यह शिखा सिर पर सहस्रारचक्र के स्थान पर रखी जाती है । इस स्थान पर स्थित केश छोडकर शेष केश कटवाने की क्रिया को चौलकर्म अथवा चूडाकर्म कहते हैं ।
उपनयन का अर्थ है, गायत्री मंत्र सीखने हेतु गुरु के (शिक्षक के) पास ले जाना । नयन शब्द का अर्थ आंख भी है । उपनयन अर्थात अंतःचक्षु । जिस विधि से अंतःचक्षु खुलने लगते हैं अथवा खुलने में सहायता होती है, उसे उपनयन कहते हैं ।
इस विधि में पलाश के छडी पर ‘सुश्रव’ यह मंत्र पाठ करते हुए ब्रह्मचारी को (बटु) (ब्रह्मवृक्ष की) डाली के चारों ओर सर्व जल छोडते हुए उसकी तीन बार परिक्रमा करनी पडती है ।
ग्यारहवें संस्कार से लेकर चौदहवां संस्कार, इन चार व्रतों को चतुर्वेदव्रत कहते हैं । ये व्रत ब्रह्मचर्याश्रम में आचार्य करवाते हैं ।
समावर्तन संस्कार के समय आगे दी गई बातें मंत्रपूर्वक करते हैं – वस्त्रधारण, काजलधारण, कुंडलधारण, पुष्पमालाधारण, पादत्राणधारण, छत्रधारण, दंडधारण, स्वर्णमणिधारण । अब पुत्र गृहस्थाश्रम में लौटनेवाला है, अतः उसे इस विधि द्वारा गृहस्थाश्रम में रहना सिखाया जाता है ।
गणेशभक्तो, गणेश चतुर्थी के काल में आपने श्री गणेश की भक्तिभाव एवं धर्मशास्त्रानुसार सेवा की । अब उनका धर्म शास्त्रानुसार विसर्जन करने के स्थान पर प्रसिद्धि के लिए पर्यावरण रक्षा का ढोंग करनेवाले नास्तिकों के हाथ में मूर्ति सौंपनेवाले हो क्या ? धर्मद्रोहियों के आवाहन की बलि चढ, विसर्जन न करने के महापाप से बचें ।