श्री गणेश मूर्ति का विसर्जन बहते पानी में करें !

गणेशभक्तो, गणेश चतुर्थी के काल में आपने श्री गणेश की भक्तिभाव एवं धर्मशास्त्रानुसार सेवा की । अब उनका धर्म शास्त्रानुसार विसर्जन करने के स्थान पर प्रसिद्धि के लिए पर्यावरण रक्षा का ढोंग करनेवाले नास्तिकों के हाथ में मूर्ति सौंपनेवाले हो क्या ? धर्मद्रोहियों के आवाहन की बलि चढ, विसर्जन न करने के महापाप से बचें । श्री गणेश मूर्ति धर्म शास्त्रानुसार शाडू मिट्टी से बनाने पर पर्यावरण की रक्षा भी होगी और धर्माचरण करने से श्री गणेश की कृपा भी होगी ।

 

गणेश मूर्ति बहते पानी में क्यों विसर्जित करें ?

अध्यात्मशास्त्रानुसार गणेश चतुर्थी के काल में की गई शास्त्रोक्त पूजा विधियों के कारण मूर्ति में श्री गणपति का चैतन्य अधिक मात्रा में आकर्षित होता है । मूर्ति पानी में विसर्जित करने से यह चैतन्य पानी के माधयम से दूर-दूर तक फैलता है । पानी का वाष्पीकरण होने से यह चैतन्य वातावरण में भी दूर-दूर तक पहुंचता है ।

 

सूखाग्रस्त क्षेत्र में मूर्ति विसर्जन के विकल्प

अनेक स्थानों पर वर्षा न होने से नदी अथवा जल प्रवाह सूख जाते हैं । इससे श्री गणेशमूर्ति का विसर्जन धर्मशास्त्रानुसार बहते पानी में करने में बाधा निर्माण होने की संभावना है । संकटकाल में धार्मिक कृत्य अध्यात्म के तत्त्वों के अनुसार करना धर्मशास्त्र सम्मत होते हैं । इसके अनुसार अकाल (सूखा) की स्थिति में श्री गणेशमूर्ति के विसर्जन के लिए निम्न विकल्प अपनाएं !

१. छोटी मूर्ति की स्थापना करें

अ. प्रति वर्ष बडी मूर्ति लाने की परंपरा है, तब भी अकाल की स्थिति में विसर्जन के लिए जो सरल-सुलभ हो, ऐसी छोटी (६-७ इंच ऊंची) मूर्ति की पूजा करें ।

आ. उत्तरपूजा के उपरांत यह मूर्ति घर के बाहर तुलसी वृंदावन के निकट अथवा आंगन में तथा शहरों में सदनिका में निवास करनेवाले, अपने-अपने घरों में बर्तन में पानी भरकर उसमें विसर्जित करें ।

इ. मूर्ति पानी में पूर्णत: घुल जाने के उपरांत वह पानी और मिट्टी पैरों के नीचे न आए, इस ढंग से अश्मंतक (कचनार), बरगद, पीपल समान सात्त्विक वृक्षों को डाल दें ।

२. बडी मूर्ति कालांतर में विसर्जित करना !

बडी मूर्ति का पर्याय स्वीकार करने पर उस मूर्ति की उत्तरपूजा होने पर वह घर में ही सात्त्विक स्थान पर (उदा. पूजाघर के निकट) रखें । इस मूर्ति की पूजा करने की आवश्यकता नहीं है । धूल न चढें, इसलिए वह अच्छादन (कवर) से ढक कर रखें । बहता पानी उपलब्ध होने पर वह मूर्ति बहते पानी में विसर्जित करें । उपरोक्त प्रकार का विसर्जन केवल अनावृष्टि (कम वर्षा) जैसे काल के लिए आपत धर्म स्वरूप शास्त्र सम्मत है ।

– श्री. दामोदर वझे गुरुजी, संचालक, सनातन साधक-पुरोहित पाठशाला, गोवा.

 

श्री गणेशमूर्ति का विसर्जन कृत्रिम जलाशय में न करें ?

प्रदूषण रहित गणेश मूर्ति विसर्जन के नाम पर कुछ महापालिकाएं अनेक स्थानों पर कृत्रिम जलाशय बनाती हैं । ऐसे कृत्रिम जलाशयों में गणेश मूर्ति का विसर्जन करना अनुचित है; क्योंकि –

१. शास्त्र के अनुसार प्राणप्रतिष्ठा की हुई मूर्ति को बहते पानी में विसर्जित करना चाहिए । बहते पानी में मूर्ति का विसर्जन करने से पूजा के कारण मूर्ति में आया चैतन्य, पानी द्वारा दूर-दूर तक पहुंचता है । कृत्रिम जलाशय का पानी, बहता जल प्रवाह न होने से श्रद्धालु उसके आध्यात्मिक लाभ से वंचित रह जाते हैं ।

२. कृत्रिम जलाशय में श्री गणेश मूर्ति का विसर्जन करने के उपरांत नगरपालिका के कर्मचारी गणेशमूर्ति पानी में घुलने से पूर्व ही उसे बाहर निकाल लेते हैं । ऐसा करना धर्मशास्त्र विरोधी है ।

३. कृत्रिम जलाशय में विसर्जित की गई मूर्तियों को नगरपालिका कर्मचारी कचरे की गाडी से ले जाते हैं । वे मूर्ति को कचरे समान फेंकते हैं । अनेक बार यह मूर्ति खदान के गंदे पानी में फेंकते हैं ।

४. गणेश मूतिर्यों के विसर्जन के उपरांत पालिका कृत्रिम जलाशय को समाप्त करने से पूर्व उस गणेश तत्त्व से प्रभारित हुए पानी को गटर में छोड देती है । यह श्री गणेश का अनादर है ।

 

‘इको फ्रेंडली’ गणेश मूर्तियों के भुलावे से सावधान !

अभी ‘इको फ्रेंडली’ कहकर कागद की लुगदी से श्री गणेश मूर्ति बनाई जाती है । यह अशास्त्रीय है, साथ ही पर्यावरण हेतु हानिकारक है; क्योंकि कागद की लुगदी पानी की प्राणवायु अवशोषित करती है और उससे जीव सृष्टि के लिए हानिकारक ‘मिथेन’ वायु की निर्मिति होती है । धर्मशास्त्रानुसार मिट्टी की मूर्ति बनाना, यही खरा पर्यावरण प्रेम है ।

 

मूर्ति का बहते पानी में विसर्जन करें; क्योंकि

मूर्ति दान करने के लिए वह कोई खिलौना अथवा सजावट की वस्तु नहीं ।

मूर्ति दान लेनेवाले धर्मद्रोहियों द्वारा उसका अनादर किया जाता है ।

विसर्जन से मूर्ति का चैतन्य पानी द्वारा आकाश तक फैलता है ।

 

श्री गणेश चतुर्थी के काल में पूजन की मूर्ति
धर्मशास्त्रानुसार बनवाने के संदर्भ में कुछ कठिनाईयां और उसके उत्तर

१. धर्मशास्त्रानुसार क्रय की जानेवाली शाडू मिट्टी की मूर्ति महंगी लगना !

प्रत्येक परिवार द्वारा गणेशोत्सव पर होनेवाले कुल व्यय में से (उदा. आधुनिक सजावट, परिवार हेतु कपडों की खरीद आदि पर) मूर्ति क्रय हेतु होनेवाला व्यय अत्यल्प होता है । श्री गणेश की पूजा करने का उद्देश्य परिवार को मूर्ति से गणेश तत्त्व का लाभ प्रदान करना है । प्लास्टर ऑफ पेरिस की मूर्ति से वह लाभ मिलना संभव नहीं है । गणेश भक्तों, मूर्ति के मूल्य का प्रश्‍न हो, तो छोटी मूर्ति लें; परंतु तुलनात्मक दृष्टि से सस्ती है, इसलिए प्लास्टर ऑफ पेरिस की मूर्ति लेकर धर्मशास्त्र विरोधी आचरण न करें ।

२. कुछ घरों में बच्चों के शौक के लिए प्रतिवर्ष अलग-अलग अशास्त्रीय मूर्ति रखी जाती है । क्या बच्चों के शौक की पूर्ति करना अनुचित है, ऐसा प्रश्‍न अविभावकों (माता-पिता) का होता है !

मूर्ति कोई खिलौना नहीं है कि उसमें प्रति वर्ष विविधता होनी चाहिए । भक्तिभाव बढाना, ईश्‍वरीय चैतन्य ग्रहण करना आदि के लिए श्री गणेश की मूर्ति घर लाकर पूजनी होती है । धर्मशास्त्र से कभी भी समझौता न करें । इसके विपरीत इस निमित्त बच्चों का प्रबोधन करें और उन्हें धर्म शिक्षा दें ।

गणेश भक्तो, अपने सगे-संबंधियों, गणेशोत्सव मंडल आदि का शास्त्रानुसार गणेश मूर्ति रखने के विषय में प्रबोधन करें ! ऐसा करने से श्री गणेश की आप पर कृपा होगी !