शनि ग्रह की ‘साडेसाती’ अर्थात आध्यात्मिक जीवन को गति देनेवाली पर्वणी !

‘शनि ग्रह की ‘साडेसाती’ कहते ही सामान्यतः हमें भय लगता है । ‘मेरा बुरा समय आरंभ होगा, संकटों की श्रृंखला आरंभ होगी’, इत्यादि विचार मन में आते हैं; परंतु साडेसाती सर्वथा अनिष्ट नहीं होती । इस लेख द्वारा ‘साडेसाती क्या है और  साडेसाती के होते हुए हमें क्या लाभ हो सकता है’, इस विषय में समझ लेंगे ।

ज्योतिषशास्त्रानुसार भविष्य बताने की पद्धति एवं प्रारब्ध पर मात करने हेतु साधना एवं क्रियमाणकर्म का महत्त्व

गत जन्मों की साधना के कारण व्यक्ति को जन्म से ही ज्योतिष विद्या का ज्ञान होता है । ज्योतिषशास्त्र से संक्षिप्त परिचय होने पर भी   व्यक्ति को उसकी सभी बारीकियों का अपनेआप बोध होने लगता है ।

गुरु ग्रह अस्तंगत (डूबते) समय कौनसे कार्य करें ?

‘प्रत्येक वर्ष सूर्य के सान्निध्य के कारण मंगल, बुध, गुरु, शुक्र एवं शनि ग्रह अस्तंगत होते हैं । उसमें धर्मशास्त्र ने एवं मुहूर्त शास्त्रकारों ने गुरु एवं शुक्र की अस्तंगत कालावधि को विशेष महत्त्व दिया है ।

कुंडली का रवि-मंगल युति योग

रवि एवं मंगल, इन दो ग्रहों में अंशात्मक युति योग, केंद्र योग अथवा प्रतियोग हों, तो ऐसे व्यक्ति अपने क्षेत्र में साहसी एवं पराक्रमी होते हैं । रवि एवं मंगल इन ग्रहों में युति योग भिन्न-भिन्न राशि से एवं स्थान से विविध फल देते हैं ।

इच्छित कार्य शुभ मुहूर्त पर करने का महत्त्व

‘भारत में प्राचीन काल से महत्त्वपूर्ण कार्य को शुभ मुहूर्त पर करने की परंपरा है । अपने दैनंदिन जीवन में मुहूर्तों से संबंध समय-समय पर आता है । मुहूर्त इस विषय की प्राथमिक जानकारी इस लेख द्वारा समझ लेंगे ।

व्यक्ति की मृत्यु के समय बनाई गई कुंडली पर (मृत्युकुंडलीपर) उसे ‘मृत्युत्तर (मृत्यु के पश्चात) गति कैसे मिलेगी ?’, यह समझ में आना एवं उसके अच्छे-बुरे कर्मों का बोध होना

‘जीव का जन्म एवं मृत्यु प्रारब्धानुसार होते हैं । जन्मकुंडली से जीव को इस जन्म में भोगे जानेवाले प्रारब्ध की तीव्रता एवं प्रारब्ध के स्वरूप का बोध होता है । जीव की मृत्यु के समय बनाई गई कुंडली द्वारा ‘जीव को मृत्यु के पश्चात कैसी गति मिलेगी ?’, यह समझ में आ सकता है । इसे ‘मृत्युकुंडली’ कह सकते हैं । मृत्युकुंडली से व्यक्ति द्वारा उसके अपने जीवन में किए गए अच्छे-बुरे कर्मों का भी बोध होता है ।

तिथि का महत्त्व एवं व्यक्ति की जन्मतिथि निश्चित करने की पद्धति

भारतीय कालमापन पद्धति में ‘तिथि’का महत्त्व है; परंतु वर्तमान के ‘ग्रेगोरीयन’ (युरोपीय) कालगणना के कारण भारत में तिथि का उपयोग व्यवहार में न होकर केवल धार्मिक कार्यों के लिए होता है । प्रस्तुत लेख द्वारा तिथि का महत्त्व एवं व्यक्ति की जन्मतिथि निश्चित करने की पद्धति समझ लेंगे ।

जन्मपत्रिका बनाने का महत्त्व समझकर लें !

‘हिन्दू समाज में शिशु का जन्म होने पर ज्योतिष से शिशु की जन्मपत्रिका बनवा ली जाती है । अनेक लोगों को उत्सुकता होगी कि इस पत्रिका में क्या जानकारी होती है । इस लेख द्वारा ‘जन्मपत्रिका क्या है और पत्रिका में कौन-सी जानकारी अंतर्भूत होती है’, इस विषय में समझकर लेंगे ।

मंगलदोष – धारणा एवं गलतधारणाएं

विवाह निश्चित करते समय वधु-वर की जन्मकुंडलियों में मंगलदोष का विचार किया जाता है । अनेक बार व्यक्ति का विवाह केवल ‘मंगलदोष है’ इसलिए सहजता से मिलान नहीं होता । मंगलदोष के विषय में समाज में गलतधारणा दिखाई देती है, यद्यपि उसकी मात्रा अल्प हो रही है । मंगलदोष संबंधी धारणा एवं गलतधारणा, इस लेख द्वारा समझकर लेंगे ।

विवाह निश्‍चित करते समय वधु-वर की जन्मकुंडली मिलाने का महत्त्व

वधु-वर की जन्मकुंडलियां मिलाने का महत्त्व, इसके साथ ही  वैवाहिक जीवन आनंदमय होने के लिए क्या करना चाहिए, इस विषय में प्रस्तुत लेख !