संसार की सर्वश्रेष्ठ पदवी !
‘संसार के अनेक विषयों में अनेक पदवियां हैं। ‘डॉक्टरेट’ जैसी अनेक उच्च स्तर की पदवियां हैं; परंतु उनसे भी सर्वश्रेष्ठ पदवी है, ‘सच्चे गुरु’ का ‘सच्चा शिष्य’ !’ – सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. जयंत आठवले
‘संसार के अनेक विषयों में अनेक पदवियां हैं। ‘डॉक्टरेट’ जैसी अनेक उच्च स्तर की पदवियां हैं; परंतु उनसे भी सर्वश्रेष्ठ पदवी है, ‘सच्चे गुरु’ का ‘सच्चा शिष्य’ !’ – सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. जयंत आठवले
‘पूर्वकाल में समाज में निहित सात्त्विकता, सामंजस्य, प्रेमभाव इत्यादि गुणों के कारण समाजव्यवस्था भलीभांति बनी रहे, इसके लिए कुछ करना नहीं पडता था । आज समाज में वे घटक निर्माण होने हेतु धर्मशिक्षा ही नहीं दी जाती। इस कारण कानून की सहायता लेकर समाजव्यवस्था भलीभांति बनाए रखने के दयनीय प्रयास किए जाते हैं।’ – सच्चिदानंद … Read more
‘अनेक पति-पत्नी जीवन भर लडते-झगडते रहते हैं और आगे बुढापे में उन्हें समझ में आता है कि ‘ कष्ट का उपाय केवल साधना करना ही है ।’ उस समय ‘जीवनभर साधना क्यों नहीं की’ इसका पश्चाताप करने के अतिरिक्त उनके पास कोई विकल्प नहीं होता ।’ – सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. जयंत आठवले,
‘हमने ईश्वरप्राप्ति के लिए प्रयास किए, तो ईश्वर का ध्यान हमारी ओर आकर्षित होता है और हमारे द्वारा किए जा रहे धर्मकार्य के लिए ईश्वर की कृपा एवं आशीर्वाद प्राप्त होते हैं ।’ – सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. जयंत आठवले
‘पृथ्वी के कानून और जमा-खर्च आदि सब व्यर्थ हैं । अंत में प्रत्येक को ईश्वरीय कानून एवं जमा-खर्च इत्यादि का सामना करना पडता है ।’ – सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवले
‘प्रत्येक चूक से कुछ सीख पाएं, तो चूक के कारण दुख नहीं होता। सीखने का आनंद मिलता है।’ – सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. जयंत आठवले,
‘क्रियमाण कर्म का पूरा उपयोग कर पराकाष्ठा के प्रयास करें; परंतु फल प्रारब्ध पर अथवा ईश्वर पर छोडें!’ – सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवले
‘वृद्ध होने पर ही वृद्धावस्था का अनुभव होता है तथा तब लगता है कि वृद्धावस्था देनेवाला पुनर्जन्म न मिले; परंतु तब तक साधना कर पुनर्जन्म टालने का समय बीत चुका होता है । ऐसा न हो, इसलिए युवावस्था से ही साधना करें ।’ -सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. जयंत आठवले
‘स्थूल का, अर्थात देह तथा वस्तुओं द्वारा किए तात्कालिक प्रदूषण की तुलना में सूक्ष्म स्तर का, अर्थात मन एवं बुद्धि से किया प्रदूषण अनेक गुना लम्बे समय के लिए हानिकारक होता है, इस ओर ध्यान रखें !’ – सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. जयंत आठवले
‘ज्ञानयोग के अनुसार साधना करने पर वह प्रमुख रूप से बुद्धि से होती है । कर्मयोग के अनुसार साधना करने पर, वह शरीर और बुद्धि से होती है; जबकि भक्तियोग के अनुसार साधना करने पर, वह मन, बुद्धि और शरीर से होती है।’ – सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. जयंत आठवले