अनुक्रमणिका
- १. हिन्दू राष्ट्र : मूलभूत विचार
- २. हिन्दू राष्ट्र-स्थापना की सूक्ष्म और स्थूल स्तर की प्रक्रिया को जान लें !
- ३. हिन्दू राष्ट्र की अपरिहार्यता !
- ४. ‘हिन्दू राष्ट्र’ शब्द का विरोध करने वालों से ये प्रश्न करें !
- ५. हिन्दू राष्ट्र की स्थापना करना, ही भारत की सर्व समस्याओं का उपाय है तथा यह उपाय मतपेटी से अथवा राजनेताओं की सहायता से नहीं, तो संतों के आशीर्वाद से साध्य होगा !
- ५ अ. अधिकांश राजनेताओं के साथ रहना अच्छा प्रतीत नहीं होेता; किंतु संतों का सहवास अच्छा प्रतीत होता है
- ५ आ. राजनेताओं तथा जनप्रतिनिधियों के मन में हिन्दू राष्ट्र की स्थापना हो, ऐसा विचार भी नहीं आता तथा संत ही उस संदर्भ में सक्रिय रहते हैं
- ५ इ. हिन्दू राष्ट्र की स्थापना करने के लिए राजनेता तथा जनप्रतिनिधि नहीं, तो संत ही सक्षम हैं
- ६. ‘हिन्दू राष्ट्र’ और ‘रामराज्य’ के विषय में विवेचन
१. हिन्दू राष्ट्र : मूलभूत विचार
१ अ. व्याख्या तथा समानार्थी शब्द
अ. हिन्दू राष्ट्र का अर्थ है, विश्वकल्याण हेतु कार्यरत सात्त्विक लोगों का राष्ट्र !
मेरुतंत्र नामक धर्मग्रंथ में लिखा है “हीनं दूषयति इति हिन्दुः।” अर्थात जो हीन अथवा कनिष्ठ रज और तम गुणों का दूषयति अर्थात नाश करता है, वह हिन्दू है । दूसरे शब्दों में जो रज-तमात्मक हीन गुणों का तथा उनसे होने वाले कायिक, वाचिक और मानसिक स्तर के नीच कर्मों का परित्याग करता है; अर्थात सात्त्विक आचरण करता है, वह हिन्दू है । ऐसा सत्त्वगुणी व्यक्ति मैं और मेरा, इस संकीर्ण विचार को त्यागकर, विश्वकल्याण का व्यापक विचार करता है। इतिहास में इसके अनेक उदाहरण हैं ।
१. हमारे पूर्वज ऋषि-मुनियों ने उद्घोष किया था, ‘कृण्वन्तो विश्वम् आर्यम्’ । (ऋग्वेद, मंडल ९, सूक्त ६३, ऋचा ५) अर्थात, संपूर्ण विश्व को आर्य (सुसंस्कृत) बनाएंगे !
२. उपनिषदों की शिक्षा के अनुसार अयं बन्धुरयं नेतिगणना लघुचेतसाम् । उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम् ॥ (महोपनिषद्, अध्याय ४, श्लोक ७१) अर्थात यह मेरा है और यह मेरा नहीं है ऐसा विचार क्षुद्र बुद्धि के लोग ही करते हैं । उदार चरित्र के (मन के) लोगों के लिए तो संपूर्ण पृथ्वी ही अपने परिवार समान है। अतः विश्वकल्याण हेतु कार्यरत सत्त्वगुणी लोगों (शासकों का तथा जनता का) राष्ट्र, यह हिन्दू राष्ट्र शब्द की सबसे उचित व्याख्या है ।
सनातन धर्म ही नीतिशास्त्र और सत्त्वगुण का मूलाधार है । इसलिए राष्ट्र के जीवन में सत्त्वगुण और नैतिकता (सत्य, सदाचार, परोपकार, इंद्रियनिग्रह इत्यादि) का संवर्धन करने के लिए संविधान में सनातन (हिन्दू) धर्माधिष्ठित राज्यप्रणाली लिखना तथा उसके अनुसार राष्ट्र की रचना होना अपेक्षित है ।
२. हिन्दू राष्ट्र-स्थापना की सूक्ष्म और स्थूल स्तर की प्रक्रिया को जान लें !
२ अ. भारत में हिन्दू राष्ट्र स्थापित होने के आध्यात्मिक कारण
स्थूल में होने वाली घटनाओं के शारीरिक, मानसिक तथा आध्यात्मिक कारण होते हैं। उस विषय में बुद्धिजीवी बुद्धि के बल पर ही प्रमाण जुटाते हैं; इसलिए स्थूल कारणों का ही विचार कर पाते हैं। जबकि इनमें से आध्यात्मिक कारण बुद्धि से नहीं समझे जा सकते क्योंकि वह बुद्धि के परे होते हैं। इसके विपरीत अध्यात्म में उन्नत साधक विश्वमन और विश्वबुद्धि के विचार ग्रहण कर सकते हैं। इसी को सूक्ष्म-स्तरीय ज्ञान कहते हैं।
२ अ १. कालमहिमा
किसी भी कार्य के लिए उचित समय आवश्यक होता है । सन्तों को पता रहता है कि किस कार्य के लिए कौन-सा समय उपयुक्त है । अभी ऐसी कोई स्थूल घटना नहीं हो रही, जिससे अनुमान लगाया जा सके कि भारत में हिन्दू राष्ट्र की स्थापना होगी । परंतु काल की पदचाप सुनने वाले संत जान गए हैं कि हिन्दू राष्ट्र की स्थापना होगी ! निम्नांकित सूत्रों से सभी को काल का महत्त्व ध्यान में आएगा ।
अ. शिशुपाल के सौ अपराध पूर्ण होने पर ही भगवान श्रीकृष्ण ने उसका वध किया ।
आ. क्रांतिकारी कालमहिमा को समझे बिना, भावनावश कार्य करते हैं। इसलिए अधिकतर लोगों की असफल मृत्यु होती है। राष्ट्रकार्य के लिए प्राण न्योछावर करने के कारण, उनकी व्यष्टि साधना हो जाती है; परन्तु इससे समाज को कोई विशेष लाभ नहीं होता। इसके विपरीत क्रांतिकारी अरविंद घोष ने पहले साधना कर प्रगति की, इसलिए उन्हें सूक्ष्म ज्ञान था कि भारत वर्ष १९४७ में स्वतंत्र होगा । इसलिए उन्होंने क्रांति का विचार मन से निकाल दिया और वे साधना कर महर्षि बने। उन्होंने साधना के क्षेत्र में लाखों लोगों का मार्गदर्शन किया और इस माध्यम से राष्ट्र के प्रति एक व्यापक और अविस्मरणीय योगदान दिया ।
३. हिन्दू राष्ट्र की अपरिहार्यता !
भारत में शीघ्र ही हिन्दू राष्ट्र स्थापित होगा । काल की पदचाप (आहट) पहले ही सुन लेनेवाले संतों ने, हिन्दू राष्ट्र रूपी उज्ज्वल भविष्य देख लिया है । अब उस दिशा में प्रयत्न करना, हमारी साधना है । हिन्दू राष्ट्र की स्थापना के विषय में अनेक लोगों के मन में उत्सुकता है । ईश्वर से प्रार्थना है कि इस लेख को पढकर भविष्य में भारतभूमि में रामराज्य का अनुभव करानेवाले हिन्दू राष्ट्र की स्थापना हेतु हिन्दू समाज को अथक प्रयास करने की प्रेरणा मिले !
४. ‘हिन्दू राष्ट्र’ शब्द का विरोध करने वालों से ये प्रश्न करें !
अ. ‘हिन्दू राष्ट्र’ स्थापित कर सर्व जाति-पंथों का परम कल्याण साधा जा सकता है, यह छत्रपति शिवाजी महाराज ने सिद्ध कर दिखाया है । अतः यदि ऐसा परिवर्तन हिन्दू राष्ट्र की स्थापना के कारण होता होगा, तो उसमें कोई आपत्तिजनक बात नहीं है ।
आ. पोप जॉन पॉल (द्वितीय) १९९९ में भारत की यात्रा पर आए थे तब उन्होंने कहा था कि ‘संपूर्ण भारत को ईसाई बनाना है ।’ इस वक्तव्य को आज तक किसी ने असंवैधानिक क्यों नहीं माना ?
इ. अत्यंत विकसित और लोकतान्त्रिक देश होने पर भी इंग्लैण्ड एक ‘ईसाई राष्ट्र’ हो सकता है; तब ८० प्रतिशत हिन्दू जनसंख्या वाला भारत ‘हिन्दू राष्ट्र’ क्यों नहीं बन सकता ?
ई. पाकिस्तान और बांग्लादेश के संविधान में ‘इस्लामिक रिपब्लिक’ लिखा है; तब भारत के संविधान में, ‘हिन्दू गणराज्य’ शब्द क्यों नहीं लिखा जा सकता? जब इस्लामी राष्ट्रों में हिन्दू रह सकते हैं; तो ‘हिन्दू राष्ट्र में मुसलमान और ईसाई नहीं रह सकते’, ऐसा कभी हो सकता है क्या ?
उ. स्वाधीनता के समय भारत में रहने वाले तत्कालीन मुसलमानों ने अपने लिए धर्म पर आधारित पाकिस्तान नामक इस्लामी राष्ट्र मांगा था । उसके अनुसार शेष भारत हिन्दुओं का ‘हिन्दू राष्ट्र’ ही होना चाहिए था । हिन्दुओं द्वारा हिन्दू राष्ट्र की स्वाभाविक मांग, अपराध कैसे हो सकती है?
ऊ. कल यदि ‘आइएसआइएस’ के आतंकवादी भारत पर आक्रमण कर इसे ‘इस्लामिक राष्ट्र’ घोषित कर दें, तो हिन्दू कहां जाएंगे ? संसार में हिन्दुओं का एक भी देश नहीं है !’
५. हिन्दू राष्ट्र की स्थापना करना, ही भारत की सर्व समस्याओं का उपाय है तथा यह उपाय मतपेटी से अथवा राजनेताओं की सहायता से नहीं, तो संतों के आशीर्वाद से साध्य होगा !
‘विश्व में जनतंत्र का सबसे अधिक पाखंडीपन भारत में दिखाई दे रहा है। इस बात के लिए अधिक मात्रा में राजनीतिक दल उत्तरदायी हैं। अतः संपूर्ण भारत में समय-समय पर होने वाले चुनाव में यदि कोई भी चुनकर आया, तो भी भारत की परिस्थिति में कुछ परिवर्तन होगा इसकी अपेक्षा करना अत्यंत अनुचित तथा घातक है । इस पर एकमात्र उपाय यही है कि, संतों के नेतृत्व में सात्विक लोगों को संगठित होकर हिन्दू राष्ट्र की स्थापना करना !
५ अ. अधिकांश राजनेताओं के साथ रहना अच्छा प्रतीत नहीं होेता; किंतु संतों का सहवास अच्छा प्रतीत होता है
सनातन के आश्रम में अधिकांश समय संत आते हैं । संत आश्रम में आने के पश्चात अथवा कहीं भी बाहर उनसे भेंट होने के पश्चात साधकों का भाव जागृत होना, चैतन्य, आनंद अथवा शांति का अनुभव आना, इस प्रकार की अनुभूतियां आती हैं। अतः संत सहवास लगातार प्राप्त हो, संत सेवा करने की संधि प्राप्त हो,’ ऐसी लगन निर्माण होती है ।
इस के विपरीत अनेक राजनेताओं तथा जनप्रतिनिधियों में होने वाले अहं के कारण उनका सहवास अच्छा नहीं प्रतीत होता। यदि लोगों को उनका अहं सहन नहीं होता, तो क्या ईश्वर को सहन होगा ? इसलिए राजनेता और जनप्रतिनिधि उनके अंदर होने वाले अहंकार के कारण ईश्वर से दूर होते हैं। ईश्वर जिन्हें दूर रखते हैं, क्या ऐसे लोगों को हिन्दू राष्ट्र की स्थापना करने के लिए ईश्वर की सहायता प्राप्त हो सकती है ?
५ आ. राजनेताओं तथा जनप्रतिनिधियों के मन में हिन्दू राष्ट्र की स्थापना हो, ऐसा विचार भी नहीं आता तथा संत ही उस संदर्भ में सक्रिय रहते हैं
रज-तम प्रधान राजनेताओं के मन में हिन्दू राष्ट्र की स्थापना हो, ऐसा विचार भी मन में नहीं आता; क्योंकि उनके मन में अपना स्वयं का राज्य होने की इच्छा रहती है । सत्त्वप्रधान संतों के मन में ‘हिन्दू राष्ट्र की स्थापना हो’, ऐसे विचार आते हैं । संत सर्वस्व का त्याग करते हैं । ‘सर्व ईश्वर का ही है’, ऐसा उनका भाव रहता है; इसलिए उनके द्वारा हिन्दू राष्ट्र की स्थापना होने हेतु उनको इश्वर की मदद मिलेगी। संत अपने स्तर के अनुसार स्थल में सहायता, धार्मिक विधि, संकल्प, आशीर्वाद तथा अस्तित्व, इस प्रकार के पृथक माध्यमों द्वारा सहायता करते हैं । अब जैसे-जैसे आपातकाल निकट आ रहा है, वैसे-वैसे सनातन संस्था को सहायता करने वालों की संख्या भी बढ रही है।
५ इ. हिन्दू राष्ट्र की स्थापना करने के लिए राजनेता तथा जनप्रतिनिधि नहीं, तो संत ही सक्षम हैं
स्थूल की कोई भी बात घटने से पूर्व वह सूक्ष्म में घटती है । इस नियमानुसार स्थूल में हिन्दू राष्ट्र की स्थापना होने से पूर्व प्रथम वह सूक्ष्म में होनी चाहिए । अनिष्ट शक्तियों के विरुद्ध की यह सूक्ष्म लडाई संत ही लड सकते हैं, राजनेता तथा जनप्रतिनिधि नहीं ! अतएव हिन्दू राष्ट्र की स्थापना करने के लिए राजनेता तथा जनप्रतिनिधि नहीं, तो संत ही सक्षम हैं ।’

६. ‘हिन्दू राष्ट्र’ और ‘रामराज्य’ के विषय में विवेचन
‘हिन्दू राष्ट्र’ हिन्दुओं के लिए कल्याणकारी है। परंतु हिंदुओं का वास्तविक कल्याण ‘हिन्दू राष्ट्र’ के ‘रामराज्य’ में रूपांतरित होने में है ! कुछ राष्ट्रप्रेमी एवं धर्मप्रेमी बंधु ‘हिन्दू राष्ट्र’ को एक सीमित दृष्टिकोण से देखते हैं, तो कुछ ‘हिन्दू राष्ट्र’ और ‘रामराज्य’ को समान अर्थ वाला मानते हैं। इस पृष्ठभूमि में सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी (गुरुदेव) ने ‘हिन्दू राष्ट्र’ और ‘रामराज्य’ के विषय में आध्यात्मिक स्तर पर किया हुआ विवेचन राष्ट्रप्रेमी एवं धर्मप्रेमी लोगों को उचित दृष्टिकोण प्रदान करेगा।
६ अ. हिन्दू राष्ट्र – हिन्दुओं के हित को प्राथमिकता देने वाली राज्यव्यवस्था !
‘भारत हिन्दू बहुल होते हुए भी आज धर्मांधों द्वारा हिन्दुओं एवं हिन्दुओं के त्योहारों पर किए जाने वाले आक्रमण, सरकार द्वारा अधिग्रहित मंदिरों की निधि से गैर-हिन्दुओं को दी जाने वाली सहायता, शासन स्तर पर विद्यालयों में धर्मशिक्षा न दिए जाने के कारण नैतिक अधःपतन की ओर बढती हिन्दुओं की भावी पीढी आदि अनेक समस्याएं हिन्दुओं के सामने हैं। इन समस्याओं में परिवर्तन लाने के लिए हिन्दुओं के हित को प्राथमिकता देने वाली तथा धर्म के अनुकूल राज्यव्यवस्था आवश्यक है। यह ‘हिन्दू राष्ट्र’ है।’
६ आ. रामराज्य- सात्त्विक राज्यकर्ताओं और सात्त्विक प्रजा का राष्ट्र !
हमारी अपेक्षा केवल इतनी नहीं है कि संवैधानिक अथवा व्यवस्था में परिवर्तन करके भारत को ‘हिन्दू राष्ट्र’ के रूप में जाना जाए; अपितु हम भारत में रामराज्य जैसी लोककल्याणकारी आदर्श राज्यव्यवस्था भी चाहते हैं। सात्त्विक लोगों का (सात्त्विक राज्यकर्ताओं और सात्त्विक प्रजा का) राष्ट्र ही वास्तविक अर्थ में ‘रामराज्य’ है। रामराज्य के राजा साक्षात भगवान श्रीराम थे और प्रजा भी सात्त्विक थी। सात्त्विक बनने के लिए नियमित रूप से साधना करना आवश्यक है।
आदर्श राज्य की बात आते ही आज भी हमारे सामने रामराज्य का ही आदर्श आता है। रामराज्य में प्रभु श्रीराम के प्रति श्रद्धा होने के कारण ही सभी अधिकारी, मंत्री आदि सुशासन कर पाते थे। हमें भी ‘हिन्दू राष्ट्र’ का इसी प्रकार के सात्त्विक एवं आदर्श ‘रामराज्य’ में रूपांतरण करना है।
६ इ. ‘हिन्दू राष्ट्र’ का ‘रामराज्य’ में रूपांतरण होने की प्रक्रिया
आने वाला समय पूरे विश्व में युद्ध, महामारी, बाढ, भूकंप आदि आपदाओं का समय होगा। आपातकाल समाप्त होने के पश्चात भारत में ‘हिन्दू राष्ट्र’ की स्थापना होगी।
आपातकाल के पश्चात स्थापित होने वाले हिन्दू राष्ट्र में अधिकांश हिन्दुओं की हिन्दू धर्म के प्रति केवल भावनात्मक स्तर की आस्था होगी। वे साधना करने वाले नहीं होंगे। ऐसे मानसिक स्तर वाले हिन्दू राष्ट्र का ‘रामराज्य’ में रूपांतरण होने में लगभग ८० वर्ष का समय लगेगा। इस अवधि में नई पीढियां साधना करके सात्त्विक बनेंगी। इसके पश्चात रामराज्य आएगा। यह प्रक्रिया वर्तमान में ‘हिन्दू राष्ट्र’ की स्थापना करने की प्रक्रिया की तुलना में ५० प्रतिशत सरल होगी। वर्तमान में केवल पाव से आधा प्रतिशत लोग ही साधना करते हैं। रामराज्य की स्थापना के लिए कम-से-कम ५० प्रतिशत लोगों का साधना करना आवश्यक है; क्योंकि ‘रामराज्य’ अर्थात ‘सात्त्विक लोगों का राज्य’ !
यह स्थापित होने वाला राज्य ‘कलियुग का रामराज्य’ होगा। उस पर कलि का प्रभाव होना स्वाभाविक है। इस रामराज्य के काल में राज्यकर्ता और प्रजा दोनों ही श्रीराम के समान पूर्णतः सात्त्विक नहीं होंगे। इसलिए इसे पूर्णतः आदर्श रामराज्य बनाने के लिए सभी को आदर्श साधना करना आवश्यक है।
‘त्रेतायुग के रामराज्य को यदि पूर्णिमा का चंद्रमा माना जाए, तो अब आने वाला रामराज्य केवल शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा के चंद्रमा के समान होगा !’
– सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी (१२.४.२०२६)

६ ई. ‘हिन्दू राष्ट्र’ का ‘रामराज्य’ में रूपांतरण करना ही ध्येय होना चाहिए
‘जैसा कि ऊपर बताया गया है, वर्तमान में हिन्दुओं में साधना करने वालों का प्रमाण अत्यल्प है। इसलिए उनके द्वारा स्थापित होने वाला राष्ट्र ‘हिन्दू राष्ट्र’ होगा। इसी कारण ग्रंथ में अधिकतर ‘हिन्दू राष्ट्र’ शब्द का प्रयोग किया गया है। परंतु सभी हिन्दुओं ने साधना को समझकर उसे आचरण में लाते हुए ‘हिन्दू राष्ट्र’ का ‘रामराज्य’ में रूपांतरण करना, यही गुरुदेव को अपेक्षित है। गुरुदेव के मार्गदर्शन में ‘हिन्दू राष्ट्र’ के व्यापक अर्थ को ध्यान में रखते हुए धर्मसेवकों को रामराज्य की निर्मिति में सहभागी होना चाहिए।’
– (पू.) संदीप आलशी
संदर्भ : सनातन का ग्रंथ ‘हिन्दू राष्ट्र की स्थापना की दिशा’
यह ग्रंथ ऑनलाइन भी उपलब्ध !
संपर्क : ‘सनातन शॉप’ जालस्थल की लिंक : https://sanatanshop.com/

अंतर्सामाजिक तनाव को किसप्रकार कम किया जा सकता है ?
भावना के स्तरपर किसी भी प्रकार का असंवैधानिक कृत्य करने की सनातन संस्था की सीख...
दुष्प्रवृत्तियों का सामना कैसे करें ?