भावना के स्तरपर किसी भी प्रकार का असंवैधानिक कृत्य करने की सनातन संस्था की सीख नहीं है !

परात्पर गुरु डॉ आठवलेजी

१. अध्यात्म में कर्मफलसिद्धांत को महत्त्वपूर्ण माना गया है । कर्म का फल अटल होता है । किए गए कर्मों का फल पाप-पुण्य के रूप में भोगना पडता है । भावना के आवेश में आकर किए गए हिंसक कृत्य का फल भी भोगना पडता है । इसलिए सनातन संस्था की विचारधारा में कहींपर भी भावनिक कृत्यों के लिए स्थान नहीं है ।

२. हिन्दू राष्ट्र की स्थापना होने ही वाली है; किंतु वह क्षात्रधर्म के नामपर किए गए भावनिक प्रयासों के कारण नहीं, अपितु कालमहिमा के अनुसार होगी । प्रभु श्रीरामजी को १४ वर्ष वनवास के पश्‍चात, तो पांडवों को ११ वर्षों का वनवास और १ वर्ष का अज्ञातवास पूर्ण किए जाने के पश्‍चात ही राज्य की प्राप्ति हुई । इसी प्रकार कालमहिमा के अनुसार वर्ष २०२३ में जब हिन्दुओं का अनिष्ट काल समाप्त हो जाएगा, तब निश्‍चितरूप से हिन्दू राष्ट्र की स्थापना होनेवाली है !

३. गुरुकृपायोग के अनुसार साधना करनेवालों की दृष्टि से धर्म एवं अधर्म के मध्य का संघर्ष स्थूल से नहीं, अपितु सूक्ष्म से जीतना महत्त्वपूर्ण होता है । सूक्ष्म की विजय प्राप्त करने हेतु पहले स्वयं को जीतना अर्थात काम, क्रोधादि षड्विकारोंपर विजय प्राप्त करना और मनपर नियंत्रण प्राप्त करना आवश्यक है !

उक्त सभी सूत्रों को ध्यान में लेकर भावनिक कृत्यों से दूर रहकर साधकों को स्वयं की साधना की ओर ध्यान केंद्रित करना तथा स्वभावदोषों के निर्मूलन को प्रधानता देनी चाहिए । ‘भावनिक कृत्यों के द्वारा स्वयं का कर्मफल न बढें’, इसकी ओर ध्यान देना’ और ‘कालमहिमा के अनुसारी हिन्दू राष्ट्र की स्थापना होने ही वाली है’, इसके प्रति श्रद्धा रखकर समष्टि कार्य करना अपेक्षित है ।’

– परात्पर गुरु डॉ. जयंत आठवलेजी, संस्थापक, सनातन संस्था